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Sawan Somwar: महाकालेश्वर की तरह रायपुर में भी है महाकाल धाम!, 12 ज्योतिर्लिंगों से जुड़ी है धार्मिक मान्यता
Mon, 24 Aug 2026 10:24 AM IST
Lalit Kumar Singh
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
Published by: Lalit Kumar Singh
Updated Mon, 24 Aug 2026 10:24 AM IST
Sawan Somwar 2026: मध्य प्रदेश के उज्जैन के महाकालेश्वर धाम की तरह ही छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से सटे अमलेश्वर में श्रीमहाकाल धाम है। वेद- पुराणों के अनुसार इस धाम की पौराणिकता 12 ज्योतिर्लिंगों से जुड़ी है। इसी वजह से इसे महाकाल धाम कहते हैं। दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर से मुड़कर खारून नदी स्वयंभू महाकाल धाम को और भी पवित्र-पावन बना देती है।
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महाकाल धाम अमलेश्वर रायपुर
- फोटो : Amar Ujala Digital
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विस्तार
Sawan Somwar 2026: मध्य प्रदेश के उज्जैन के महाकालेश्वर धाम की तरह ही छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से सटे अमलेश्वर में श्रीमहाकाल धाम है। वेद- पुराणों के अनुसार इस धाम की पौराणिकता 12 ज्योतिर्लिंगों से जुड़ी है। इसी वजह से इसे महाकाल धाम कहते हैं। दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर से मुड़कर खारून नदी स्वयंभू महाकाल धाम को और भी पवित्र-पावन बना देती है। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। बड़ी संख्या में कांवड़ियां यहां आते हैं और खारून नदी के तट पर डूबकी लगाते हैं फिर महाकाल का दर्शन करते हैं। श्री महाकाल धाम में नियमित रूप से अलग-अलग रूपों में भगवान का श्रृंगार होता है। इसमें भगवान महाकाल के बाल रूप से लेकर अर्धनारीश्वर तक के रूपों का श्रृंगार किया जाता है। सुबह-शाम भगवान की जागरण आरती, भोग आरती फिर शयन आरती होती है।
महाकाल धाम अमलेश्वर में यजमानों के सभी प्रकार के कार्मिक अनुष्ठान विद्वानों के निर्देश में कराए जाते हैं। यहां पलाश विधि से नारायण नागबली, कालसर्प जैसे तमाम धार्मिक अनुष्ठान और पूजा अर्चना की जाती है। साथ ही विवाह में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिये कुंवारे युवाओं ने अर्क विवाह और कन्याओं ने कुंभ विवाह भी करवाया है। महाकाल धाम में करीब 20 साल से ये पूजा अनवरत जारी है। सैकड़ों की संख्या में पहुंचने वाले भक्त यहां देव दर्शन और पवित्र स्नान के बाद पूजा-पाठ कराते हैं।
जानें ऐतिहासिक महत्व
श्री महाकाल धाम अमलेश्वर की पौराणिकता भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों से जुड़ी है। महाकाल धाम में स्थापित शिवलिंग स्वयंभू हैं। यहां खारून नदी के बहने का आकार 'अ'के रूप में हैं। माना जाता है कि इस वजह से इस क्षेत्र का नाम अमलेश्वर पड़ा। करीब 100 साल पहले यहां घना जंगल था। यहां लोग जाने से भी डरते थे। इस इलाके में चूने की भट्ठियों पर काम करने वाले मजदूर ज्यादातर जंगल में रहा करते थे। जंगल में रहने वाले मजदूरों ने यहां अमलेश्वर लिंग की पूजा शुरू की। कालांतर में चूने की भट्ठियां बंद हो गई और वहां काम करने वाले मजदूर भी चले गए। इसके बाद यहां स्थित शिवलिंग मिट्टी में दब गया। साल 2004 में छत्तीसगढ़ के दानवीर दाऊ कल्याण सिंह के अग्रज अशोक अग्रवाल को सपने में आदेश मिला कि अमलेश्वर के एक खेत में खारुन नदी के किनारे शिवलिंग मिट्टी में दबा हुआ है। इसे निकालकर इसकी विधिवत पूजा कराई जाए। अशोक अग्रवाल के मार्गदर्शन में शिवलिंग की खोज की गई तो नदी के तट पर एक खेत में नीम के पास शिवलिंग प्रकट हुआ।
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यहां जानें, क्यों कहा गया महाकाल धाम
इस धाम के सर्वराकार पंडित प्रियाशरण त्रिपाठी के अनुसार, साल 2004 में यहां पर नीम के पेड़ के पास स्वयंभू शिवलिंग मिला। तीन जुलाई और सावन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि के बाद शिवलिंग की एक टेंट में पूजा की जाने लगी और जनवरी 2024 में इस भव्य-दिव्य दरबार को श्री महाकाल धाम अमलेश्वर का नाम दे दिया गया। धाम में करीब 20 वर्षों से पूजा अनवरत चल रही है। इसी साल जनवरी में महाकाल धाम का जीर्णोंद्धार शुरू हुआ। इस मंगल तीर्थ में श्रद्धालु न केवल पूजा करते हैं बल्कि पूजन के बाद विधिवत रूद्राभिषेक एवं महाप्रसादी का आनंद भी लेते हैं।
इस वजह से कहा गया अमलेश्वर
सिक्किम के संत कनकधारी स्वामी स्वदेशानंद ने अमलेश्वर का अर्थ बताते हुए लिखा है की मलम इति अमलम यानी पाप रहित परमात्मा ही अमलेश्वर है। यह पुराणों में भी उल्लेखित है। एक बार विंध्य पर्वत ने पार्थिव शिवलिंग के साथ भगवान शिव की 6 महीने तक कठिन उपासना की। प्रसन्न होकर भगवान शिव ने बिध्य को वर दिया। इस तपस्या में ऋषि-मुनि भी आए थे। उनकी प्रार्थना पर शिव ने अपने ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दो भाग किए। एक का नाम ओमकारेश्वर और दूसरे का नाम अमलेश्वर पड़ा। पुराणों में भी अमलेश्वर का स्पष्ट उल्लेख है।
गर्भगृह में स्थापित है इन देवी-देवताओं की प्रतिमा
मंदिर के गर्भगृह में गणेश भगवान,कैलाश अधिपति शंकर और महामाया चतृभुजी दुर्गा विराजित हैं। धाम के द्वार पर नंदी महाराज और सामने ही अमलेश्वर क्षेत्र अधिपति भगवान शनि की अद्भूत विग्रह है, जो रूद्राक्ष जैसे वृक्ष की छाया में इस धाम को और भी मनमोहक और पुनीत बनाते हैं।
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महाकाल धाम अमलेश्वर में यजमानों के सभी प्रकार के कार्मिक अनुष्ठान विद्वानों के निर्देश में कराए जाते हैं। यहां पलाश विधि से नारायण नागबली, कालसर्प जैसे तमाम धार्मिक अनुष्ठान और पूजा अर्चना की जाती है। साथ ही विवाह में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिये कुंवारे युवाओं ने अर्क विवाह और कन्याओं ने कुंभ विवाह भी करवाया है। महाकाल धाम में करीब 20 साल से ये पूजा अनवरत जारी है। सैकड़ों की संख्या में पहुंचने वाले भक्त यहां देव दर्शन और पवित्र स्नान के बाद पूजा-पाठ कराते हैं।
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जानें ऐतिहासिक महत्व
श्री महाकाल धाम अमलेश्वर की पौराणिकता भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों से जुड़ी है। महाकाल धाम में स्थापित शिवलिंग स्वयंभू हैं। यहां खारून नदी के बहने का आकार 'अ'के रूप में हैं। माना जाता है कि इस वजह से इस क्षेत्र का नाम अमलेश्वर पड़ा। करीब 100 साल पहले यहां घना जंगल था। यहां लोग जाने से भी डरते थे। इस इलाके में चूने की भट्ठियों पर काम करने वाले मजदूर ज्यादातर जंगल में रहा करते थे। जंगल में रहने वाले मजदूरों ने यहां अमलेश्वर लिंग की पूजा शुरू की। कालांतर में चूने की भट्ठियां बंद हो गई और वहां काम करने वाले मजदूर भी चले गए। इसके बाद यहां स्थित शिवलिंग मिट्टी में दब गया। साल 2004 में छत्तीसगढ़ के दानवीर दाऊ कल्याण सिंह के अग्रज अशोक अग्रवाल को सपने में आदेश मिला कि अमलेश्वर के एक खेत में खारुन नदी के किनारे शिवलिंग मिट्टी में दबा हुआ है। इसे निकालकर इसकी विधिवत पूजा कराई जाए। अशोक अग्रवाल के मार्गदर्शन में शिवलिंग की खोज की गई तो नदी के तट पर एक खेत में नीम के पास शिवलिंग प्रकट हुआ।
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यहां जानें, क्यों कहा गया महाकाल धाम
इस धाम के सर्वराकार पंडित प्रियाशरण त्रिपाठी के अनुसार, साल 2004 में यहां पर नीम के पेड़ के पास स्वयंभू शिवलिंग मिला। तीन जुलाई और सावन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि के बाद शिवलिंग की एक टेंट में पूजा की जाने लगी और जनवरी 2024 में इस भव्य-दिव्य दरबार को श्री महाकाल धाम अमलेश्वर का नाम दे दिया गया। धाम में करीब 20 वर्षों से पूजा अनवरत चल रही है। इसी साल जनवरी में महाकाल धाम का जीर्णोंद्धार शुरू हुआ। इस मंगल तीर्थ में श्रद्धालु न केवल पूजा करते हैं बल्कि पूजन के बाद विधिवत रूद्राभिषेक एवं महाप्रसादी का आनंद भी लेते हैं।
इस वजह से कहा गया अमलेश्वर
सिक्किम के संत कनकधारी स्वामी स्वदेशानंद ने अमलेश्वर का अर्थ बताते हुए लिखा है की मलम इति अमलम यानी पाप रहित परमात्मा ही अमलेश्वर है। यह पुराणों में भी उल्लेखित है। एक बार विंध्य पर्वत ने पार्थिव शिवलिंग के साथ भगवान शिव की 6 महीने तक कठिन उपासना की। प्रसन्न होकर भगवान शिव ने बिध्य को वर दिया। इस तपस्या में ऋषि-मुनि भी आए थे। उनकी प्रार्थना पर शिव ने अपने ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दो भाग किए। एक का नाम ओमकारेश्वर और दूसरे का नाम अमलेश्वर पड़ा। पुराणों में भी अमलेश्वर का स्पष्ट उल्लेख है।
गर्भगृह में स्थापित है इन देवी-देवताओं की प्रतिमा
मंदिर के गर्भगृह में गणेश भगवान,कैलाश अधिपति शंकर और महामाया चतृभुजी दुर्गा विराजित हैं। धाम के द्वार पर नंदी महाराज और सामने ही अमलेश्वर क्षेत्र अधिपति भगवान शनि की अद्भूत विग्रह है, जो रूद्राक्ष जैसे वृक्ष की छाया में इस धाम को और भी मनमोहक और पुनीत बनाते हैं।