{"_id":"6ad5bbc3c837a910460d146a","slug":"village-in-chhattisgarh-where-ravana-is-not-burnt-on-dussehra-2026-10-19","type":"story","status":"publish","title_hn":"छत्तीसगढ़ के इन क्षेत्रों में दशहरे पर नहीं होता रावण दहन: 16वीं सदी से चल रही परंपरा,निकलती है राजा की सवारी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
छत्तीसगढ़ के इन क्षेत्रों में दशहरे पर नहीं होता रावण दहन: 16वीं सदी से चल रही परंपरा,निकलती है राजा की सवारी
Mon, 19 Oct 2026 12:12 PM IST
Lalit Kumar Singh
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
Published by: Lalit Kumar Singh
Updated Mon, 19 Oct 2026 12:12 PM IST
दशहरा आते ही पूरे देश-प्रदेश में जगह-जगह रावण दहन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले का एक गांव ऐसा है जहां सदियों पुरानी परंपरा आज भी जीवंत है। यहां दशहरे के दिन रावण का दहन नहीं होता, बल्कि राजा की सवारी निकाली जाती है।
विज्ञापन
ग्रॉफिक्स: अमर उजाला डिजिटल
- फोटो : Amar Ujala Digital
विस्तार
दशहरा आते ही पूरे देश-प्रदेश में जगह-जगह रावण दहन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले का एक गांव ऐसा है, जहां सदियों पुरानी परंपरा आज भी जीवंत है। यहां दशहरे के दिन रावण का दहन नहीं होता, बल्कि राजा की सवारी निकाली जाती है। इस अनोखी परंपरा को देखने और इसमें शामिल होने के लिए 44 गांवों के लोग एकत्रित होते हैं।
मुंगेली मुख्यालय से लगभग 10 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत कंतेली में 16वीं सदी से यह परंपरा चली आ रही है। यहां दशहरे के दिन कंतेली जमींदारी परिवार की ओर से राजा की सवारी निकाली जाती है। राजमहल से निकलने वाली यह सवारी कुल देवी मंदिर तक जाती है, जहां राजा मां महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली की पूजा-अर्चना कर क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
विज्ञापन
छत्तीसगढ़ का पहला ऐसा गांव
कंतेली गांव को छत्तीसगढ़ का पहला ऐसा गांव माना जाता है, जहां दशहरे पर रावण दहन नहीं होता। यहां का दशहरा केरल की उस परंपरा से मिलता-जुलता है, जहां राजा बली पाताललोक से बाहर आकर अपनी प्रजा का हालचाल लेते हैं। कंतेली में भी राजा और प्रजा के बीच इसी तरह का संवाद दशकों से कायम है।
44 गांवों की सहभागिता
इस परंपरा में आसपास के 44 गांवों के लोग शामिल होते हैं। जुलूस में नाच-गाना और धार्मिक आयोजन होते हैं। कुल देवी की पूजा के बाद राजमहल में सभा लगती है, जहां ग्रामीण राजा को सोनपत्ती अर्पित कर आशीर्वाद लेते हैं। यह अनोखी परंपरा लोगों में उत्साह और एकजुटता का प्रतीक मानी जाती है।
इतिहास की झलक
कंतेली जमींदारी के प्रथम पुत्र गजराज सिंह ने कुल देवी मंदिर का निर्माण कराया था। स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले 1944 में राजा पोखराज सिंह द्वितीय के निधन के बाद राजमाता पिनांक कुमारी देवी ने यशवंत कुमार सिंह को दत्तक पुत्र बनाया और तब से मंदिर और परंपराओं की जिम्मेदारी उन्हीं के संरक्षण में रही। बाद में मां महामाया समिति का गठन हुआ, जो नवरात्रि और दशहरे के आयोजन संभालती रही।
दशहरे के दूसरे दिन रावण का वध
जहां सभी जगह विजयदशमी पर रावण का दहन किया जाता है। वहीं छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के एक गांव में दशहरे के दूसरे दिन रावण का वध किया जाता है। इतना ही नहीं यहां अलग तरीके से यहां रावण का दहन किया जाता है। रावण के पुतले को तालाब के बीचो-बीच एक नाव के सहारे लेकर जाया जाता है। फिर बड़े ही हाईटैक तरीके से उसे जलाया जाता है। इस परंपरा को लोग वर्षों से मानते आ रहे हैं। यहां ग्रामीण 30 फीट का रावण बनाते हैं। इसे बकायदा पानी में डूबने से बचाने के लिये 12 लकड़ी की पटिया में आठ ड्रम को बांधकर तैयार किया जाता है। इसे बनाने में करीब एक हफ्ते का समय लगता है। रावण के पुतले को इसे के सहारे तालाब के बीचो-बीच लेकर गांव वाले जाते हैं। फिर इसे रिमोट कंट्रोल से जलाया जाता है। इस अनोखी प्रथा के कारण आस-पास के गावों में लेजवारा गांव की खूब चर्चा होती है।
लेजवारा की अनोखी परंपरा
लेजवारा गांव के ग्रामीण एक बेहन अनोखी परंपरा को तकरीबन 27 साल से मानते आ रहे हैं। लोगों का कहना है कि तालाब में डूबने गांव वालों की मौत हो जाया करती थी। इसके बाद से तालाब के बीच में रावण दहन के परंपरा की शुरुआत की गई। लोगों का मानना है कि तलाब के बीच में रावण दहन करने से अब किसी की अकाल मौत नहीं होती। लेजवारा गांव के लोगों की मानें, तो रावण दहन पहले पत्थर से बने जगह पर पुतला बनाकर किया जाता था, लेकिन गांव के तालाब में डूबने से दशहरे के आस-पास महीनों में दो से तीन ग्रामीणों की मौत हो जाती थी। इससे उभरने के लिए ग्रामीणों ने तालाब में रावण दहन का उपाय अपनाया। कलेक्टर एसपी सहित तहसीलदार ने इस रूढ़िवादी परंपरा को बंद करने की समझाइश लोगों को दी थी, लेकिन सभी ने इस परंपरा को बंद करने से मना कर दिया।
कांकेर में होती है रावण की पूजा
कांकेर जिले में रावण की पूजा की जाती है। यहां के लोग दशहरा के दिन रावण के पुतले का दहन नहीं करते हैं। दशानन के ज्ञान और उसका स्मरण करते हैं।
यहां जानिये दशहरे पर अलग तरह की परंपरा-
पानी के बीच में दशानन का दहन
मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले में रावण वध अनोखे तरीके से किया जाता है। चिरमिरी के कोरिया कॉलरी में पिछले 47 वर्षों से पोखड़ी डैम में रावण का दहन किया जाता है। यहां डैम के बीचों बीच रावण के पुतले को स्थापित किया जाता है। रावण को पानी में नांव के सहारे ले जाया जाता है,उसके बाद उसे पानी के बीच बने टापूनुमा जगह पर स्थापित किया जाता है। यहां रावण दहन पानी के बीच में किया जाता है। यही वजह है कि चिरमिरी के कोरिया कॉलरी में रावण का दहन अनोखा होता है। रावण का पुतला बनाने में लगभग एक महीने का समय लगता है। दशहरा समिति द्वारा पहले रावण का पुतला बनाया जाता है, जिसे ड्रम के नाव में रखकर डैम के बीचों-बीच स्थित एक चट्टान पर ले जाकर रखा जाता है।
75 दिनों का बस्तर दशहरा, नहीं जलता रावण का पुतला
छत्तीसगढ़ का बस्तर दशहरा भारत के सबसे अनोखे उत्सवों में से एक है। यहां यह पर्व लगभग 75 दिनों तक चलने वाली परंपराओं, धार्मिक अनुष्ठानों और आदिवासी संस्कृति से जुड़ा है। इस उत्सव का मुख्य केंद्र भगवान राम और रावण का युद्ध नहीं, बल्कि मां दंतेश्वरी और स्थानीय देवी-देवताओं की आराधना है। यहां रावण का पुतला जलाने की परंपरा नहीं है। पारंपरिक रथ यात्रा, स्थानीय देवी-देवताओं का आगमन और सामुदायिक अनुष्ठान इस उत्सव की खास पहचान हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
मुंगेली मुख्यालय से लगभग 10 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत कंतेली में 16वीं सदी से यह परंपरा चली आ रही है। यहां दशहरे के दिन कंतेली जमींदारी परिवार की ओर से राजा की सवारी निकाली जाती है। राजमहल से निकलने वाली यह सवारी कुल देवी मंदिर तक जाती है, जहां राजा मां महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली की पूजा-अर्चना कर क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
विज्ञापन
छत्तीसगढ़ का पहला ऐसा गांव
कंतेली गांव को छत्तीसगढ़ का पहला ऐसा गांव माना जाता है, जहां दशहरे पर रावण दहन नहीं होता। यहां का दशहरा केरल की उस परंपरा से मिलता-जुलता है, जहां राजा बली पाताललोक से बाहर आकर अपनी प्रजा का हालचाल लेते हैं। कंतेली में भी राजा और प्रजा के बीच इसी तरह का संवाद दशकों से कायम है।
44 गांवों की सहभागिता
इस परंपरा में आसपास के 44 गांवों के लोग शामिल होते हैं। जुलूस में नाच-गाना और धार्मिक आयोजन होते हैं। कुल देवी की पूजा के बाद राजमहल में सभा लगती है, जहां ग्रामीण राजा को सोनपत्ती अर्पित कर आशीर्वाद लेते हैं। यह अनोखी परंपरा लोगों में उत्साह और एकजुटता का प्रतीक मानी जाती है।
इतिहास की झलक
कंतेली जमींदारी के प्रथम पुत्र गजराज सिंह ने कुल देवी मंदिर का निर्माण कराया था। स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले 1944 में राजा पोखराज सिंह द्वितीय के निधन के बाद राजमाता पिनांक कुमारी देवी ने यशवंत कुमार सिंह को दत्तक पुत्र बनाया और तब से मंदिर और परंपराओं की जिम्मेदारी उन्हीं के संरक्षण में रही। बाद में मां महामाया समिति का गठन हुआ, जो नवरात्रि और दशहरे के आयोजन संभालती रही।
दशहरे के दूसरे दिन रावण का वध
जहां सभी जगह विजयदशमी पर रावण का दहन किया जाता है। वहीं छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के एक गांव में दशहरे के दूसरे दिन रावण का वध किया जाता है। इतना ही नहीं यहां अलग तरीके से यहां रावण का दहन किया जाता है। रावण के पुतले को तालाब के बीचो-बीच एक नाव के सहारे लेकर जाया जाता है। फिर बड़े ही हाईटैक तरीके से उसे जलाया जाता है। इस परंपरा को लोग वर्षों से मानते आ रहे हैं। यहां ग्रामीण 30 फीट का रावण बनाते हैं। इसे बकायदा पानी में डूबने से बचाने के लिये 12 लकड़ी की पटिया में आठ ड्रम को बांधकर तैयार किया जाता है। इसे बनाने में करीब एक हफ्ते का समय लगता है। रावण के पुतले को इसे के सहारे तालाब के बीचो-बीच लेकर गांव वाले जाते हैं। फिर इसे रिमोट कंट्रोल से जलाया जाता है। इस अनोखी प्रथा के कारण आस-पास के गावों में लेजवारा गांव की खूब चर्चा होती है।
लेजवारा की अनोखी परंपरा
लेजवारा गांव के ग्रामीण एक बेहन अनोखी परंपरा को तकरीबन 27 साल से मानते आ रहे हैं। लोगों का कहना है कि तालाब में डूबने गांव वालों की मौत हो जाया करती थी। इसके बाद से तालाब के बीच में रावण दहन के परंपरा की शुरुआत की गई। लोगों का मानना है कि तलाब के बीच में रावण दहन करने से अब किसी की अकाल मौत नहीं होती। लेजवारा गांव के लोगों की मानें, तो रावण दहन पहले पत्थर से बने जगह पर पुतला बनाकर किया जाता था, लेकिन गांव के तालाब में डूबने से दशहरे के आस-पास महीनों में दो से तीन ग्रामीणों की मौत हो जाती थी। इससे उभरने के लिए ग्रामीणों ने तालाब में रावण दहन का उपाय अपनाया। कलेक्टर एसपी सहित तहसीलदार ने इस रूढ़िवादी परंपरा को बंद करने की समझाइश लोगों को दी थी, लेकिन सभी ने इस परंपरा को बंद करने से मना कर दिया।
कांकेर में होती है रावण की पूजा
कांकेर जिले में रावण की पूजा की जाती है। यहां के लोग दशहरा के दिन रावण के पुतले का दहन नहीं करते हैं। दशानन के ज्ञान और उसका स्मरण करते हैं।
यहां जानिये दशहरे पर अलग तरह की परंपरा-
पानी के बीच में दशानन का दहन
मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले में रावण वध अनोखे तरीके से किया जाता है। चिरमिरी के कोरिया कॉलरी में पिछले 47 वर्षों से पोखड़ी डैम में रावण का दहन किया जाता है। यहां डैम के बीचों बीच रावण के पुतले को स्थापित किया जाता है। रावण को पानी में नांव के सहारे ले जाया जाता है,उसके बाद उसे पानी के बीच बने टापूनुमा जगह पर स्थापित किया जाता है। यहां रावण दहन पानी के बीच में किया जाता है। यही वजह है कि चिरमिरी के कोरिया कॉलरी में रावण का दहन अनोखा होता है। रावण का पुतला बनाने में लगभग एक महीने का समय लगता है। दशहरा समिति द्वारा पहले रावण का पुतला बनाया जाता है, जिसे ड्रम के नाव में रखकर डैम के बीचों-बीच स्थित एक चट्टान पर ले जाकर रखा जाता है।
75 दिनों का बस्तर दशहरा, नहीं जलता रावण का पुतला
छत्तीसगढ़ का बस्तर दशहरा भारत के सबसे अनोखे उत्सवों में से एक है। यहां यह पर्व लगभग 75 दिनों तक चलने वाली परंपराओं, धार्मिक अनुष्ठानों और आदिवासी संस्कृति से जुड़ा है। इस उत्सव का मुख्य केंद्र भगवान राम और रावण का युद्ध नहीं, बल्कि मां दंतेश्वरी और स्थानीय देवी-देवताओं की आराधना है। यहां रावण का पुतला जलाने की परंपरा नहीं है। पारंपरिक रथ यात्रा, स्थानीय देवी-देवताओं का आगमन और सामुदायिक अनुष्ठान इस उत्सव की खास पहचान हैं।