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आर्थिक दबाव की रणनीति: ईरान ही नहीं, साथ देने वालों तक पहुंचेगी आंच
Fri, 21 Aug 2026 07:45 AM IST
Pavan
अमर उजाला
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Published by: Pavan
Updated Fri, 21 Aug 2026 07:45 AM IST
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ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अब तक की सबसे कड़ी आर्थिक कार्रवाई का एलान करते हुए इसे ‘इकनॉमिक डी-डे’ नाम दिया है। अमेरिका का लक्ष्य ईरानी तेल तस्करी और वित्तीय नेटवर्क पर शिकंजा कसना है। हालांकि, चीन-रूस जैसे देशों के सहयोग से ईरान प्रतिबंधों से बचता रहा है। व्यापक आर्थिक टकराव से वैश्विक तेल बाजार और पश्चिम एशिया की अस्थिरता बढ़ने का खतरा है।
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अमेरिका-ईरान
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विस्तार
ईरान के खिलाफ अमेरिका और इस्राइल की सैन्य कार्रवाई शुरू होने के करीब छह महीने बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अपने अभियान को अब जिस भाषा और स्वर में आगे बढ़ाया है, वह पश्चिम एशिया के मौजूदा संकट को एक नए और अधिक व्यापक आर्थिक मोर्चे की ओर ले जाने का संकेत देता है। दरअसल, ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अब तक की सबसे कठोर आर्थिक कार्रवाई करने का एलान किया है, जिसे उन्होंने इकनॉमिक डी-डे नाम दिया है।इसके तहत ट्रंप ने उन देशों को चेतावनी दी है, जो किसी भी रूप में ईरान के साथ सहयोग कर रहे हैं। साफ है कि अमेरिका अब केवल ईरान पर प्रतिबंध लगाकर संतुष्ट नहीं है, बल्कि वह यह भी सुनिश्चित करना चाहता है कि दुनिया के दूसरे देश भी तेहरान के साथ अपने आर्थिक रिश्तों पर पुनर्विचार करें। ट्रंप की रणनीति ईरान के इर्द-गिर्द पनपी अवैध तेल-अर्थव्यवस्था पर शिकंजा कसने पर केंद्रित है, जिसमें ईरानी तेल की तस्करी और तीसरे देशों के जरिये धन के अवैध हस्तांतरण से जुड़े नेटवर्कों की कमर तोड़ना शामिल है।
जाहिर है कि इससे ईरान के तेल कारोबार और उसके वित्तीय लेनदेन पर असर पड़ सकता है। यह भी ध्यान रखना होगा कि ईरान पहले भी वर्षों तक अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करता रहा है। इसके बावजूद, उसने अपनी आर्थिक गतिविधियों के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाशे हैं। चीन, रूस व कुछ अन्य देशों के साथ उसके संबंध उदाहरण हैं कि व्यापक प्रतिबंधों के बाद भी किसी देश को पूरी तरह से वैश्विक आर्थिक व्यवस्था से काट देना आसान नहीं है।
ट्रंप प्रशासन की चुनौती यहीं से शुरू होती है। अगर अमेरिका अब उन देशों को भी निशाना बनाता है, जो ईरान के साथ व्यापार कर रहे हैं, तो यह टकराव केवल अमेरिका और ईरान के बीच नहीं रहेगा। तेल बाजार में किसी भी बड़ी अस्थिरता का असर वैश्विक व्यापार, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था पर भी पड़ेगा। ईरान के परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय गतिविधियों और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को लेकर अमेरिका और उसके सहयोगियों की आशंकाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
लेकिन पश्चिम एशियाई संकट का स्थायी समाधान केवल आर्थिक घेराबंदी से संभव नहीं है। दबाव का उद्देश्य यदि बातचीत की मेज तक पहुंचना है, तो वह समझ में आता है, पर यदि दबाव ही अंतिम नीति बन जाए, तो उसके परिणाम अप्रत्याशित भी हो सकते हैं। पश्चिम एशिया पहले ही युद्ध व अस्थिरता से जूझ रहा है; ऐसे में एक व्यापक आर्थिक टकराव स्थिति को और जटिल ही करेगा।