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उत्तराखंड: पहाड़ के झरने सुरक्षित न मैदान का पेयजल है पीने लायक, चार विशेषज्ञों के शोध में हुआ खुलासा

Sat, 29 Aug 2026 12:17 PM IST
Renu Saklani अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून
अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून Published by: Renu Saklani Updated Sat, 29 Aug 2026 12:17 PM IST
सार
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पहाड़ी झरने भी अब प्रदूषण से अछूते नहीं हैं और मैदानी इलाकों का भूजल भी बढ़ती कठोरता के कारण चिंता बढ़ा रहा है। चार विशेषज्ञों के संयुक्त शोध में उत्तराखंड के कई जिलों में पेयजल की गुणवत्ता पर सवाल उठे हैं, जो जल संकट के साथ स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर संकेत है।

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Uttarakhand Water Quality Crisis Hill Springs Face Biological Pollution Groundwater Hardness Rises in Plains
झरना। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पहाड़ के झरनों का पानी अब प्रचुर मिनरल्स वाला नहीं रहा तो मैदानी जिलों में भी पानी की कठोरता का स्तर तेजी से बढ़ रहा है। बस्तियों के आसपास जैविक संक्रमण का खतरा मंडरा रहा है। वैज्ञानिक शोध पत्रिका डिस्कवर जियो साइंस में जुलाई में प्रकाशित हुए डॉ.परमजीत सिंह, डॉ.नितिन कुमार, डॉ.तेजराल और डॉ.सुरजीत मोंडल के संयुक्त शोध से यह खुलासा हुआ है।

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शोध के अनुसार, देवभूमि में प्रचुर जल संपदा होने के बावजूद पर्वतीय और ग्रामीण अंचलों में भीषण पेयजल संकट और घटती जल गुणवत्ता एक विकराल रूप लेती जा रही है। उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है कि राज्य के कई प्रमुख जिलों में भूजल भारतीय मानक ब्यूरो और विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों पर खरा नहीं उतर रहा है।

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यहां का पानी कैसे पीएं

ऊधमसिंह नगर (महुआखेड़ागंज, काशीपुर) : भूजल में टीडीएस 603 एमजी/लीटर दर्ज किया गया, जो स्वीकार्य सीमा (500 एमजी/लीटर) से अधिक है।

हरिद्वार (रोशनाबाद सिडकुल) : यहां टीडीएस 599 एमजी/लीटर और कुल कठोरता 380 एमजी/लीटर पाई गई।

हरिद्वार (सराय, ज्वालापुर) : यहां पानी की कुल कठोरता 408 एमजी/लीटर तक पहुंच गई है, जो बीआईएस की सामान्य सीमा (200 एमजी/लीटर) से दोगुनी से भी अधिक है।

देहरादून (रिस्पना व बिंदाल नदियां) : शहरी क्षेत्रों से गुजरने वाली इन नदियों में कठोरता 404 एमजी/लीटर और टीडीएस 427 एमजी/लीटर तक दर्ज किया गया है।


पहाड़ी झरनों में अब कोलीफॉर्म बैक्टीरिया

पर्वतीय इलाकों की ग्रामीण आबादी मुख्य रूप से प्राकृतिक झरनों (धारा और नौला) के पानी पर निर्भर करती है। चट्टानों से रिसने के कारण इस पानी में कैल्शियम, मैग्नीशियम और पोटैशियम जैसे खनिज प्रचुर मात्रा में होते हैं लेकिन अनियोजित शहरीकरण, अनियंत्रित पर्यटन और अपर्याप्त स्वच्छता के कारण अब इन झरनों में कोलीफॉर्म बैक्टीरिया का खतरा मंडराने लगा है। ग्रामीण क्षेत्रों के कई स्रोतों के पानी में सूक्ष्मजीवों की उपस्थिति पाई गई है, जो सीधे तौर पर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

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भूगर्भीय कारणों से भी बदल रहा जायका

शोध में यह स्पष्ट किया गया है कि टीडीएस, कुल कठोरता और क्लोराइड के बीच मजबूत सकारात्मक संबंध है। इसका मुख्य कारण हिमालयी चट्टानों का खनिज-समृद्ध होना और लंबी रॉक-वॉटर इंटरैक्शन प्रक्रिया है। हालांकि नाइट्रेट और फ्लोराइड का स्तर अधिकांश स्थानों पर सुरक्षित है लेकिन शहरी नालों और सीवेज के कारण नदियों में घुली हुई ऑक्सीजन का स्तर चिंताजनक रूप से गिर रहा है। गंगोत्री से निकलने वाली भागीरथी और बदरीनाथ के पास अलकनंदा का उद्गम जल बेहद शुद्ध है (जहाँ टीडीएस मात्र 26 से 56 एमजी/लीटर है), लेकिन जैसे-जैसे ये नदियां बस्तियों और शहरी क्षेत्रों (जैसे देहरादून और लक्सर की बांण गंगा नदी जहां टीडीएस 594 एमजी/लीटर है) को पार करती हैं, इनकी गुणवत्ता में भारी गिरावट दर्ज की जाती है।
 

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