ठग सुकेश चंद्रशेखर दोषी करार: सुप्रीम कोर्ट का जज बनकर किया था फोन, धमकी दी', आज तीस हजारी अदालत सुनाएगी सजा
तीस हजारी कोर्ट ने ठग सुकेश चंद्रशेखर को एक न्यायिक अधिकारी पर दबाव बनाने और सुप्रीम कोर्ट के जज बनकर फोन करने के मामले में दोषी ठहराया है। कोर्ट ने माना कि सुकेश ने खुद को पहले सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जज का निजी सचिव और बाद में जज के रूप में पेश किया।
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तीस हजारी कोर्ट ने ठग सुकेश चंद्रशेखर को एक न्यायिक अधिकारी पर दबाव बनाने और सुप्रीम कोर्ट के जज बनकर फोन करने के मामले में दोषी ठहराया है। कोर्ट ने माना कि सुकेश ने खुद को पहले सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जज के निजी सचिव और बाद में जज के रूप में पेश किया और न्यायिक अधिकारी से उसे जल्द जमानत देने का दबाव बनाया। जमानत नहीं देने पर अधिकारी को पेशेवर नुकसान की धमकी भी दी गई।
अदालत ने सुकेश चंद्रशेखर को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 170 के तहत सरकारी अधिकारी का रूप धारण करने, धारा 189 के तहत सरकारी कर्मचारी को नुकसान पहुंचाने की धमकी देने और धारा 507 के तहत गुमनाम तरीके से आपराधिक धमकी देने का दोषी ठहराया है। सजा की अवधि को लेकर दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने 27 अगस्त यानी आज सजा सुनाने की तारीख तय की है।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट हर्षिता मिश्रा की अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यह मामला सामान्य धोखाधड़ी या किसी व्यक्ति की पहचान बदलकर पेश होने का नहीं है। यह न्याय व्यवस्था की स्वतंत्रता और न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता को प्रभावित करने की कोशिश का गंभीर मामला है।
कोर्ट के अनुसार, फोन करने वाले ने पहले खुद को सुप्रीम कोर्ट के एक तत्कालीन जज का निजी सचिव बताया। इसके बाद उसने खुद को वही जज बताते हुए न्यायिक अधिकारी पर सुकेश को जल्द से जल्द जमानत देने का दबाव बनाया। न्यायाधीश ने कहा कि कथित तौर पर सुप्रीम कोर्ट के जज की पहचान का इस्तेमाल इसलिए किया गया ताकि फोन करने वाले की बात को सर्वोच्च न्यायिक अधिकार का रूप दिया जा सके। जमानत नहीं देने पर न्यायिक अधिकारी को उनके करियर पर बुरा असर पड़ने की धमकी भी दी गई।
क्या है मामला पूरा मामला?
मामला साल 2017 के एक भ्रष्टाचार केस से जुड़ा है। आरोप है कि उस मामले में पुलिस हिरासत में रहने के दौरान सुकेश ने उसकी निगरानी कर रहे एक पुलिसकर्मी का मोबाइल फोन हासिल कर लिया। इसी फोन से उसने उस न्यायिक अधिकारी के सरकारी लैंडलाइन और मोबाइल नंबर पर संपर्क किया, जो उसके खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार मामले की सुनवाई कर रही थीं।
न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की गंभीर कोशिश
न्यायाधीश ने अपने फैसले में कहा कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी प्रभावशाली या साधन संपन्न क्यों न हो, किसी जज को निजी फोन पर किसी मामले में अपनी इच्छा के मुताबिक फैसला देने का आदेश नहीं दे सकता। न्यायिक फैसले अदालत में कानून और सबूतों के आधार पर होते हैं, न कि गुप्त फोन कॉल या दबाव के आधार पर।
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में न्यायिक अधिकारी की गवाही भरोसेमंद है। अधिकारी ने फोन आने के बाद सुप्रीम कोर्ट से संपर्क कर बातचीत की पुष्टि करने की कोशिश की और इसके बाद शिकायत दर्ज कराई। अदालत ने कहा कि इसे शिकायत दर्ज करने में देरी नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिकारी की गवाही लगातार एक जैसी रही और अन्य उपलब्ध रिकॉर्ड से भी उसकी पुष्टि होती है। बचाव पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि अधिकारी ने सुकेश को फंसाने के लिए झूठी कहानी बनाई थी।
हालांकि, कोर्ट ने मामले की पुलिस जांच पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि जांच उम्मीद के मुताबिक नहीं हुई और पुलिस ने कई महत्वपूर्ण सबूत जुटाने में लापरवाही बरती। कोर्ट के मुताबिक, पुलिस ने समय पर कई अहम गवाहों के बयान दर्ज नहीं किए। न्यायिक अधिकारी के स्टाफ, सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री के संबंधित अधिकारियों और अन्य अहम लोगों से भी समय पर पूछताछ नहीं की गई। इसके अलावा न्यायिक अधिकारी के मोबाइल और सरकारी लैंडलाइन का कॉल डिटेल रिकॉर्ड भी हासिल नहीं किया गया। अदालत ने कहा कि संबंधित कार्यालय की सीसीटीवी फुटेज भी सुरक्षित नहीं की गई और फोन व सिम कार्ड बरामद करने की कोशिश नहीं की गई। जिस पुलिसकर्मी की निगरानी में सुकेश था, उसके फोन के गायब होने की परिस्थितियों की भी पर्याप्त जांच नहीं की गई।