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क्वांटम भौतिकी की क्वीन: 16 की उम्र में स्नातक तो 24 में पूरी कर ली PHD, कौन है भारतीय मूल की नलिनी अनंतरामन?

Sat, 07 Mar 2026 07:43 AM IST
Shubham Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: Shubham Kumar Updated Sat, 07 Mar 2026 07:43 AM IST
सार
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भारतीय पिता और फ्रांसीसी मां की बेटी हैं। 16 की उम्र में स्नातक बनीं, तो 24 की उम्र में पीएचडी पूरी की। पियानो बजाने व किताबें पढ़ने की शौकीन हैं। तमिल भाषा सीखने की ख्वाहिश रखने वाली नलिनी अनंतरामन क्वांटम भौतिकी की अबूझ पहेलियों को सुलझाकर दुनिया भर में सुर्खियां बटोर रही हैं।

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Queen of Quantum Physics Graduated at 16 and completed her PhD at 24 Who is Indian-origin Nalini Anantharaman
नलिनी अनंतरामन - फोटो : Amar Ujala Graphics

विस्तार

1988 की बात है। फ्रांस के शहर ऑरलियन्स के एक स्कूल में गणित की क्लास चल रही थी। शिक्षक ने एक बेहद ही पेचीदा सवाल ब्लैकबोर्ड पर लिखा और बच्चों से कहा कि जो भी इसे हल करेगा, उसे आज होमवर्क नहीं दिया जाएगा। यह सुनते ही जहां कई छात्र सूत्र खोजने के लिए किताबों के पन्ने पलटने लगे, तो वहीं कुछ अपना सिर खुजलाते हुए लंबी-लंबी गणनाएं करने लगे, पर सही जवाब कोई न दे सका। कक्षा में पीछे एक कोने में 12 साल की बच्ची नलिनी भी बैठी थी। वह बस सवाल की उस आकृति को गौर से देख रही थी। उसने पेन तक नहीं उठाया और कुछ ही क्षणों में उस सवाल का बिल्कुल सटीक जवाब दे दिया। पूरी कक्षा में सन्नाटा छा गया।

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हालांकि, उसे सराहने के बजाय, शिक्षक ने इसे महज उसका तुक्का समझा और हल्की-सी डांट भी लगाई। पर, जब नलिनी ने ब्लैकबोर्ड पर पूरी समस्या का समाधान बेहद आसान तरीके से किया, तो यह देख शिक्षक अवाक रह गए। आगे चलकर वही नलिनी दुनिया की प्रमुख गणितज्ञों में शामिल हुईं और आज पूरा वैज्ञानिक समुदाय उन्हें नलिनी अनंतरामन के नाम से जानता है। नलिनी इन दिनों क्वांटम कैओस और स्पेक्ट्रल ज्यामितीय के क्षेत्र में अपने असाधारण शोध और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली नई पहचान के कारण सुर्खियां बटोर रही हैं। दरअसल, क्वांटम कैओस भौतिकी का वह सिद्धांत है, जो क्वांटम की दुनिया में कणों की जटिल और बेहद पेचीदा अनियमित गतियों को समझने में मदद करता है।
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गणितज्ञ परिवार में जन्म
नलिनी का जन्म 26 फरवरी, 1976 को एक गणितज्ञ परिवार में हुआ था। उनके पिता एस अनंतरामन भारतीय मूल के गणितज्ञ थे, जबकि मां क्लेयर अनंतरामन-डेलारोश फ्रांसीसी गणित की प्रोफेसर। नलिनी ने अपनी शुरुआती शिक्षा फ्रांस के ऑरलियन्स से ही हासिल की। इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने पेरिस के मशहूर इकोले नॉर्मले सुपीरियर कॉलेज में दाखिला लिया और 16 साल की उम्र में ही स्नातक बन गईं। 2000 में 'यूनिवर्सिटी पियरे एंड मैरी क्यूरी' से फ्रांस्वा लेड्रैपियर के मार्गदर्शन में नलिनी ने महज 24 साल की उम्र में पीएचडी पूरी की। 2009 में वह पेरिस-सूड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बनीं। वर्तमान में वह स्ट्रासबर्ग विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं। उन्हें 'हेनरी पोंकारे प्राइज', 'इंफोसिस प्राइज' और 'नेमर्स प्राइज' जैसे दुनिया के प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। नलिनी शादीशुदा हैं और उनके दो बच्चे भी हैं।
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एक गणितज्ञ के घर में जन्म लेने के कारण गणित नलिनी के खून में था। संख्याओं से खेलना उन्हें बचपन से ही आता था, बावजूद इसके, नलिनी को उतना ही प्यार पियानो से भी था। संगीत उनका जुनून था। शुरुआत में वह एक पेशेवर पियानो वादक (पियानिस्ट) बनने का सपना देखती थीं। स्कूल के दिनों में उन्होंने कभी भी गणित प्रतियोगिताओं में भाग नहीं लिया। यहां तक कि उन्हें मालूम ही नहीं था कि ऐसी प्रतियोगिताएं होती भी हैं। हालांकि, स्नातक के दौरान गणित, भौतिकी और प्रकृति के रहस्यों के बारे में उनकी जिज्ञासा बढ़ने लगी, जिसने उन्हें क्वांटम की जटिल अवधारणाओं को सुलझाने के लिए प्रेरित किया। बचपन में नलिनी जीवविज्ञान से भी काफी प्रभावित थीं। वह लाइलाज बीमारियों की भी खोज करना चाहती थीं।

बचपन से किताबें पढ़ने का शौक
नलिनी को बचपन से किताबें पढ़ने का शौक है। इसे वह किसी भी दर्द की दवा मानती हैं। वह अक्सर अपना खाली समय लाइब्रेरी में बिताती हैं और विभिन्न विषयों की किताबें पढ़ती हैं। इसके अलावा, वह वेस्टर्न शास्त्रीय संगीत की भी शौकीन हैं। वह 19वीं सदी के जर्मन संगीतकारों, विशेषकर लुडविग वान बीथोवेन को सुनना पसंद करती हैं। उन्हें ब्राह्म्स, शूबर्ट और शुमान जैसे महान संगीतकारों को सुनना भी अच्छा लगता है। इसके अलावा, मिट्टी से मूर्तियां बनाना भी उनका एक खास शौक है।


नलिनी अनंतरामन के पिता की मातृभाषा तमिल है, ऐसे में तमिल भाषा न सीख पाने का उन्हें मलाल है। उनकी ख्वाहिश है कि वह इस भाषा को सीखें और इसकी जड़ों को समझें। सेमिनार और शोध चर्चाओं में नलिनी नए विचारों पर बहस करना पसंद करती हैं। यदि अचानक कोई नया विचार उनके मन में आता है, तो वह उसे कहीं भी लिख लेती हैं, चाहे वह नैपकिन हो या मेट्रो का टिकट। 2018 में उन्हें इंटरनेशनल कांग्रेस ऑफ मैथमेटिशियन में बतौर मुख्य वक्ता आमंत्रित किया गया था। दुनिया के इस सबसे प्रतिष्ठित गणितीय सम्मेलन में मुख्य व्याख्यान देना किसी भी गणितज्ञ के लिए बहुत बड़ा सम्मान होता है।

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