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फाल्गुनी पाठक: नौ साल की उम्र में पहला गाना, 25 रुपये मेहनताना… फिर ऐसे बदली 'गरबा क्वीन' की किस्मत
Wed, 14 Oct 2026 08:30 AM IST
राजश्री वर्मा
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
Published by: राजश्री वर्मा
Updated Wed, 14 Oct 2026 08:30 AM IST
Garba Queen Falguni Pathak: फाल्गुनी पाठक म्यूजिक इंडस्ट्री का एक जाना-माना नाम हैं। उन्होंने अपने गानों से लोगों के दिलों में जगह बनाई। आइए अब उनकी निजी जिंदगी के बारे में जानते हैं कि कैसे उन्होंने यह मुकाम हासिल किया।
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फाल्गुनी पाठक
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
'मैंने पायल है छनकाई', 'याद पिया की आने लगी' और 'चूड़ी जो खनके' जैसे गानों से लोगों के दिलों में जगह बनाने वाली फाल्गुनी पाठक सिर्फ एक गायिका नहीं, बल्कि नवरात्रि और गरबा की पहचान बन चुकी हैं। जैसे ही नवरात्रि का त्योहार आता है और डांडिया का जिक्र होता है, तो लोगों के जहन में जो गाने सबसे पहले आते हैं वह फाल्गुनी पाठक के ही होते हैं। हालांकि, इस मुकाम तक पहुंचने का उनका सफर आसान नहीं था।
बचपन में छत पर गाने से लेकर पहली परफॉर्मेंस के लिए महज 25 रुपये मिलने तक, उन्होंने कई चुनौतियों का सामना किया। परिवार की उम्मीदों से अलग संगीत को अपना जुनून बनाने वाली फाल्गुनी ने अपनी मेहनत, अनोखी आवाज और दमदार लाइव परफॉर्मेंस के दम पर ऐसी पहचान बनाई कि आज उन्हें 'गरबा क्वीन' कहा जाता है। आइए, जानते हैं उनके इस दिलचस्प सफर की कहानी।
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बचपन में छत पर गाने से लेकर पहली परफॉर्मेंस के लिए महज 25 रुपये मिलने तक, उन्होंने कई चुनौतियों का सामना किया। परिवार की उम्मीदों से अलग संगीत को अपना जुनून बनाने वाली फाल्गुनी ने अपनी मेहनत, अनोखी आवाज और दमदार लाइव परफॉर्मेंस के दम पर ऐसी पहचान बनाई कि आज उन्हें 'गरबा क्वीन' कहा जाता है। आइए, जानते हैं उनके इस दिलचस्प सफर की कहानी।
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फाल्गुनी पाठक
- फोटो : इंस्टाग्राम @falgunipathak12
बचपन से ही संगीत से लगाव, लेकिन राह आसान नहीं थी
फाल्गुनी पाठक का जन्म 1971 में मुंबई के खार इलाके में एक गुजराती परिवार में हुआ। वह पांच बेटियों में सबसे छोटी थीं। उनके घर में संगीत का माहौल था और रेडियो पर पुराने हिंदी गाने बजते रहते थे। उनकी एक बहन शास्त्रीय संगीत सीखती थीं। फाल्गुनी भी उनके पास बैठकर गाने सुनती और धीरे-धीरे खुद गाने लगीं।
एक इंटरव्यू में फाल्गुनी ने बताया था कि संगीत की बाकायदा ट्रेनिंग नहीं ली थी। बल्कि, पुराने हिंदी गाने सुन-सुनकर गाना सीखा और धीरे-धीरे अपनी आवाज और गायकी को निखारा। वह घर की छत पर गाती थीं और पड़ोसी उनसे अपनी पसंद के गाने सुनाने की फरमाइश करने लगते थे।
फाल्गुनी पाठक का जन्म 1971 में मुंबई के खार इलाके में एक गुजराती परिवार में हुआ। वह पांच बेटियों में सबसे छोटी थीं। उनके घर में संगीत का माहौल था और रेडियो पर पुराने हिंदी गाने बजते रहते थे। उनकी एक बहन शास्त्रीय संगीत सीखती थीं। फाल्गुनी भी उनके पास बैठकर गाने सुनती और धीरे-धीरे खुद गाने लगीं।
एक इंटरव्यू में फाल्गुनी ने बताया था कि संगीत की बाकायदा ट्रेनिंग नहीं ली थी। बल्कि, पुराने हिंदी गाने सुन-सुनकर गाना सीखा और धीरे-धीरे अपनी आवाज और गायकी को निखारा। वह घर की छत पर गाती थीं और पड़ोसी उनसे अपनी पसंद के गाने सुनाने की फरमाइश करने लगते थे।
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फाल्गुनी पाठक
- फोटो : इंस्टाग्राम @falgunipathak12
फाल्गुनी के माता-पिता की थी यह ख्वाहिश
हालांकि, संगीत सीखने और गाने का उनका शौक परिवार की उम्मीदों से मेल नहीं खाता था। उनके माता-पिता चाहते थे कि बेटी पढ़-लिखकर डॉक्टर या इंजीनियर बने। उस दौर में एक लड़की का कम उम्र में मंच पर गाना और पेशेवर कार्यक्रमों में हिस्सा लेना हर परिवार के लिए सहज बात नहीं थी।
पहले गाने के लिए फाल्गुनी को मिले कितने रुपये?
फाल्गुनी पाठक को पहली बार गाने के लिए पैसे तब मिले, जब वह सिर्फ नौ साल की थीं। स्वतंत्रता दिवस के एक कार्यक्रम में उन्होंने फिल्म कुर्बानी का मशहूर गाना 'लैला मैं लैला' गाया। इस परफॉर्मेंस के लिए उन्हें 25 रुपये मिले, जो उन्होंने अपनी मां को दे दिए। लेकिन उनके गाने से पिता खुश नहीं थे। फाल्गुनी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि इस बात पर उनके पिता नाराज हुए और उन्हें सजा भी मिली। इसके बावजूद, गाने के प्रति उनका प्यार कम नहीं हुआ।
हालांकि, संगीत सीखने और गाने का उनका शौक परिवार की उम्मीदों से मेल नहीं खाता था। उनके माता-पिता चाहते थे कि बेटी पढ़-लिखकर डॉक्टर या इंजीनियर बने। उस दौर में एक लड़की का कम उम्र में मंच पर गाना और पेशेवर कार्यक्रमों में हिस्सा लेना हर परिवार के लिए सहज बात नहीं थी।
पहले गाने के लिए फाल्गुनी को मिले कितने रुपये?
फाल्गुनी पाठक को पहली बार गाने के लिए पैसे तब मिले, जब वह सिर्फ नौ साल की थीं। स्वतंत्रता दिवस के एक कार्यक्रम में उन्होंने फिल्म कुर्बानी का मशहूर गाना 'लैला मैं लैला' गाया। इस परफॉर्मेंस के लिए उन्हें 25 रुपये मिले, जो उन्होंने अपनी मां को दे दिए। लेकिन उनके गाने से पिता खुश नहीं थे। फाल्गुनी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि इस बात पर उनके पिता नाराज हुए और उन्हें सजा भी मिली। इसके बावजूद, गाने के प्रति उनका प्यार कम नहीं हुआ।
फाल्गुनी पाठक
- फोटो : PTI
छोटे मंचों से म्यूजिक ग्रुप तक का सफर
बचपन में छोटे-छोटे कार्यक्रमों में गाने वाली फाल्गुनी पाठक धीरे-धीरे संगीत की दुनिया में आगे बढ़ने लगीं। साल 1989 में उन्होंने 'द बीटरज' नाम के एक डांडिया ग्रुप के साथ काम करना शुरू किया। यहां उन्हें गरबा और डांडिया के गानों को करीब से समझने और मंच पर अपनी गायकी को बेहतर बनाने का मौका मिला।
1990 के दशक में फाल्गुनी की पहचान नवरात्रि के कार्यक्रमों में बढ़ने लगी। उन्होंने महसूस किया कि गरबा और डांडिया के जरिए वह अपनी गायकी को एक अलग पहचान दे सकती हैं। इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए उन्होंने अपना म्यूजिक ग्रुप 'ता थैया' शुरू किया, जिसके साथ वह नवरात्रि के कार्यक्रमों में प्रस्तुति देने लगीं।
बचपन में छोटे-छोटे कार्यक्रमों में गाने वाली फाल्गुनी पाठक धीरे-धीरे संगीत की दुनिया में आगे बढ़ने लगीं। साल 1989 में उन्होंने 'द बीटरज' नाम के एक डांडिया ग्रुप के साथ काम करना शुरू किया। यहां उन्हें गरबा और डांडिया के गानों को करीब से समझने और मंच पर अपनी गायकी को बेहतर बनाने का मौका मिला।
1990 के दशक में फाल्गुनी की पहचान नवरात्रि के कार्यक्रमों में बढ़ने लगी। उन्होंने महसूस किया कि गरबा और डांडिया के जरिए वह अपनी गायकी को एक अलग पहचान दे सकती हैं। इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए उन्होंने अपना म्यूजिक ग्रुप 'ता थैया' शुरू किया, जिसके साथ वह नवरात्रि के कार्यक्रमों में प्रस्तुति देने लगीं।
फाल्गुनी पाठक
- फोटो : इंस्टाग्राम@falgunipathak12
अपना ग्रुप शुरू करना उनके करियर का एक अहम कदम था। अब वह सिर्फ एक गायिका नहीं थीं, बल्कि उन्हें अपने कार्यक्रमों की तैयारी, संगीतकारों के साथ तालमेल और दर्शकों की पसंद का भी ध्यान रखना पड़ता था। लगातार मंच पर गाने और लोगों से जुड़ने के अनुभव ने उन्हें एक लोकप्रिय लाइव परफॉर्मर बना दिया।
फाल्गुनी की खासियत यह थी कि उन्होंने गरबा और डांडिया के पारंपरिक संगीत को नए अंदाज में पेश किया। उन्होंने गुजराती लोकधुनों के साथ आधुनिक संगीत का मेल बैठाया, जिससे युवाओं के बीच भी उनके गाने लोकप्रिय होने लगे। धीरे-धीरे उनके कार्यक्रमों में लोगों की भीड़ बढ़ने लगी और नवरात्रि के साथ उनका नाम जुड़ता चला गया।
फाल्गुनी की खासियत यह थी कि उन्होंने गरबा और डांडिया के पारंपरिक संगीत को नए अंदाज में पेश किया। उन्होंने गुजराती लोकधुनों के साथ आधुनिक संगीत का मेल बैठाया, जिससे युवाओं के बीच भी उनके गाने लोकप्रिय होने लगे। धीरे-धीरे उनके कार्यक्रमों में लोगों की भीड़ बढ़ने लगी और नवरात्रि के साथ उनका नाम जुड़ता चला गया।
फाल्गुनी पाठक
- फोटो : अमर उजाला
इस गाने ने बदल दी पहचान
नवरात्रि के कार्यक्रमों से फाल्गुनी पाठक को पहचान मिल रही थी, लेकिन 1990 के दशक के आखिर में उनके गानों ने उन्हें देशभर के लोगों के बीच लोकप्रिय बना दिया। साल 1998 में उनका गाना 'याद पिया की आने लगी' रिलीज हुआ।
इसकी धुन और संगीत वीडियो लोगों को खूब पसंद आया। इस गाने ने फाल्गुनी को उन लोगों के बीच भी पहचान दिलाई, जिनका गरबा या डांडिया से कोई खास जुड़ाव नहीं था। इसके बाद 'मैंने पायल है छनकाई' और 'मेरी चुनर उड़ उड़ जाए' जैसे गानों ने उनकी लोकप्रियता को और बढ़ाया।
उनके गानों में प्यार, इंतजार और जवानी की भावनाएं थीं, जिन्हें लोग आसानी से समझ पाते थे। वहीं, उनके संगीत वीडियो में उनका अलग अंदाज और पहनावा भी दर्शकों को आकर्षित करता था। उस दौर में हिंदी फिल्मों के गानों के अलावा निजी म्यूजिक एल्बम भी लोगों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे थे।
फाल्गुनी पाठक ने इसी दौर में अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी आवाज और गानों का अंदाज ऐसा था कि लोग उन्हें सुनते ही पहचानने लगे।
नवरात्रि के कार्यक्रमों से फाल्गुनी पाठक को पहचान मिल रही थी, लेकिन 1990 के दशक के आखिर में उनके गानों ने उन्हें देशभर के लोगों के बीच लोकप्रिय बना दिया। साल 1998 में उनका गाना 'याद पिया की आने लगी' रिलीज हुआ।
इसकी धुन और संगीत वीडियो लोगों को खूब पसंद आया। इस गाने ने फाल्गुनी को उन लोगों के बीच भी पहचान दिलाई, जिनका गरबा या डांडिया से कोई खास जुड़ाव नहीं था। इसके बाद 'मैंने पायल है छनकाई' और 'मेरी चुनर उड़ उड़ जाए' जैसे गानों ने उनकी लोकप्रियता को और बढ़ाया।
उनके गानों में प्यार, इंतजार और जवानी की भावनाएं थीं, जिन्हें लोग आसानी से समझ पाते थे। वहीं, उनके संगीत वीडियो में उनका अलग अंदाज और पहनावा भी दर्शकों को आकर्षित करता था। उस दौर में हिंदी फिल्मों के गानों के अलावा निजी म्यूजिक एल्बम भी लोगों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे थे।
फाल्गुनी पाठक ने इसी दौर में अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी आवाज और गानों का अंदाज ऐसा था कि लोग उन्हें सुनते ही पहचानने लगे।
फाल्गुनी पाठक
- फोटो : इंस्टाग्राम @falgunipathak12
कैसे गरबा क्वीन बनीं फाल्गुनी?
फाल्गुनी पाठक की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण उनके लाइव शो रहे हैं। जहां कई गायक अपने हिट गानों के लिए पहचाने जाते हैं, वहीं फाल्गुनी ने मंच पर अपनी अलग पहचान बनाई। उनके कार्यक्रमों में लोग सिर्फ गाने सुनने नहीं, बल्कि गरबा और डांडिया खेलने के लिए भी पहुंचते हैं।
उनके शो में संगीतकारों की टीम, ढोल की थाप, गुजराती लोकधुनें और दर्शकों के साथ उनका जुड़ाव एक अलग माहौल बनाता है। जब हजारों लोग एक साथ उनके गानों पर गरबा करते हैं, तो पूरा कार्यक्रम उत्सव में बदल जाता है। यही वजह है कि उनके प्रशंसक हर साल नवरात्रि में उनके कार्यक्रमों का इंतजार करते हैं।
धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता मुंबई से निकलकर गुजरात और देश के दूसरे शहरों तक पहुंची। विदेशों में रहने वाले भारतीयों के बीच भी उनके गरबा और डांडिया कार्यक्रम पसंद किए जाने लगे। उनके गानों ने लोगों को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़े रहने का एक मौका दिया।
फाल्गुनी पाठक की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण उनके लाइव शो रहे हैं। जहां कई गायक अपने हिट गानों के लिए पहचाने जाते हैं, वहीं फाल्गुनी ने मंच पर अपनी अलग पहचान बनाई। उनके कार्यक्रमों में लोग सिर्फ गाने सुनने नहीं, बल्कि गरबा और डांडिया खेलने के लिए भी पहुंचते हैं।
उनके शो में संगीतकारों की टीम, ढोल की थाप, गुजराती लोकधुनें और दर्शकों के साथ उनका जुड़ाव एक अलग माहौल बनाता है। जब हजारों लोग एक साथ उनके गानों पर गरबा करते हैं, तो पूरा कार्यक्रम उत्सव में बदल जाता है। यही वजह है कि उनके प्रशंसक हर साल नवरात्रि में उनके कार्यक्रमों का इंतजार करते हैं।
धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता मुंबई से निकलकर गुजरात और देश के दूसरे शहरों तक पहुंची। विदेशों में रहने वाले भारतीयों के बीच भी उनके गरबा और डांडिया कार्यक्रम पसंद किए जाने लगे। उनके गानों ने लोगों को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़े रहने का एक मौका दिया।
फाल्गुनी पाठक
- फोटो : इंस्टाग्राम @falgunipathak12
कैसे गरबा से चमका फाल्गुनी का करियर?
हर साल नवरात्र के दौरान कई शहरों में गरबा आयोजित किया जाता है। इस दौरान फाल्गुनी कॉन्सर्ट और स्टेज शोज के जरिए कमाई करती हैं। उनके शोज के महंग-महंगे टिकट बिकते हैं और इसके लिए वह जो फीस लेती हैं, वहीं उनकी कमाई का बड़ा जरिया है।
बता दें कि इस साल भी मुंबई के जियो वर्ल्ड कन्वेंशन सेंटर में 11 से 19 अक्तूबर तक गरबा उत्सव होगा। यहां फाल्गुनी परफाॅर्म करेंगी। 'वेस्ट एवेन्यू रियल्टी नवरात्रि उत्सव 2026' के नाम के होने वाले इस इवेंट में टिकट की कीमतें 2000 रुपये से 2.04 लाख रुपये तक हैं।
निजी जिंदगी को निजी रखती हैं फाल्गुनी
फाल्गुनी पाठक की सार्वजनिक छवि जितनी फेमस रही, उन्होंने अपनी निजी जिंदगी को उतना ही लाइमलाइट से दूर रखा। वह उन कलाकारों में शामिल रहीं, जिन्होंने अपने काम को बोलने दिया। वहीं, निजी रिश्तों और घरेलू जीवन को लगातार सार्वजनिक चर्चा का विषय नहीं बनाया।
एक बातचीत में उन्होंने अपने बारे में कहा था कि वह नवरात्रि के समय ही ज्यादा सुर्खियों में रहती हैं, जबकि साल के दूसरे हिस्सों में भी कार्यक्रम करती हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि उन्हें प्रचार पसंद है, लेकिन अपने कार्यक्रमों के दौरान। उनकी शादी और निजी रिश्तों को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। 2012 में एक इंटरव्यू में उन्होंने खुद को सिंगल बताया था और कहा था कि वह अपनी जिंदगी से खुश हैं।
हर साल नवरात्र के दौरान कई शहरों में गरबा आयोजित किया जाता है। इस दौरान फाल्गुनी कॉन्सर्ट और स्टेज शोज के जरिए कमाई करती हैं। उनके शोज के महंग-महंगे टिकट बिकते हैं और इसके लिए वह जो फीस लेती हैं, वहीं उनकी कमाई का बड़ा जरिया है।
बता दें कि इस साल भी मुंबई के जियो वर्ल्ड कन्वेंशन सेंटर में 11 से 19 अक्तूबर तक गरबा उत्सव होगा। यहां फाल्गुनी परफाॅर्म करेंगी। 'वेस्ट एवेन्यू रियल्टी नवरात्रि उत्सव 2026' के नाम के होने वाले इस इवेंट में टिकट की कीमतें 2000 रुपये से 2.04 लाख रुपये तक हैं।
निजी जिंदगी को निजी रखती हैं फाल्गुनी
फाल्गुनी पाठक की सार्वजनिक छवि जितनी फेमस रही, उन्होंने अपनी निजी जिंदगी को उतना ही लाइमलाइट से दूर रखा। वह उन कलाकारों में शामिल रहीं, जिन्होंने अपने काम को बोलने दिया। वहीं, निजी रिश्तों और घरेलू जीवन को लगातार सार्वजनिक चर्चा का विषय नहीं बनाया।
एक बातचीत में उन्होंने अपने बारे में कहा था कि वह नवरात्रि के समय ही ज्यादा सुर्खियों में रहती हैं, जबकि साल के दूसरे हिस्सों में भी कार्यक्रम करती हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि उन्हें प्रचार पसंद है, लेकिन अपने कार्यक्रमों के दौरान। उनकी शादी और निजी रिश्तों को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। 2012 में एक इंटरव्यू में उन्होंने खुद को सिंगल बताया था और कहा था कि वह अपनी जिंदगी से खुश हैं।
फाल्गुनी पाठक
- फोटो : अमर उजाला
फाल्गुनी ने बॉलीवुड में क्यों नहीं किया काम
फाल्गुनी पाठक की कहानी का एक दिलचस्प पहलू यह है कि इतने बड़े इंडिपॉप स्टारडम के बावजूद उन्होंने हिंदी फिल्मों में प्लेबैक सिंगिंग को अपना करियर नहीं बनाया। 2013 में उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्होंने बॉलीवुड में करियर बनाने के लिए सीरियस होकर कभी कोशिश नहीं की। उनके मुताबिक, फिल्म इंडस्ट्री में काम करने के लिए काफी भागदौड़ करनी पड़ती है और कम्पटीशन भी बहुत है। उन्हें अपना खुद का संगीत का संसार ज्यादा अच्छा लगता था।
2024 में पीटीआई से बातचीत में भी उन्होंने इसी सोच को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि वह फिल्मों में काम करने से इनकार नहीं करतीं, लेकिन लाइव मंच पर उन्हें ज्यादा खुशी और संतुष्टि मिलती है। उनके लिए स्टूडियो में घंटों काम करने और फिल्म इंडस्ट्री की भागदौड़ की तुलना में दर्शकों के सामने गाना अधिक स्वाभाविक है।
उनका लोकप्रिय गाना 'याद पिया की आने लगी' 1999 में रिलीज हुई फिल्म 'प्यार कोई खेल नहीं' में शामिल किया गया था, जिसमें सनी देओल और महिमा चौधरी मुख्य भूमिकाओं में थे। इसके अलावा, फाल्गुनी का नाम 'दीवानापन' और 'ना तुम जानो ना हम' जैसी फिल्मों के संगीत संबंधी क्रेडिट्स में भी मिलता है।
फाल्गुनी पाठक की कहानी का एक दिलचस्प पहलू यह है कि इतने बड़े इंडिपॉप स्टारडम के बावजूद उन्होंने हिंदी फिल्मों में प्लेबैक सिंगिंग को अपना करियर नहीं बनाया। 2013 में उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्होंने बॉलीवुड में करियर बनाने के लिए सीरियस होकर कभी कोशिश नहीं की। उनके मुताबिक, फिल्म इंडस्ट्री में काम करने के लिए काफी भागदौड़ करनी पड़ती है और कम्पटीशन भी बहुत है। उन्हें अपना खुद का संगीत का संसार ज्यादा अच्छा लगता था।
2024 में पीटीआई से बातचीत में भी उन्होंने इसी सोच को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि वह फिल्मों में काम करने से इनकार नहीं करतीं, लेकिन लाइव मंच पर उन्हें ज्यादा खुशी और संतुष्टि मिलती है। उनके लिए स्टूडियो में घंटों काम करने और फिल्म इंडस्ट्री की भागदौड़ की तुलना में दर्शकों के सामने गाना अधिक स्वाभाविक है।
उनका लोकप्रिय गाना 'याद पिया की आने लगी' 1999 में रिलीज हुई फिल्म 'प्यार कोई खेल नहीं' में शामिल किया गया था, जिसमें सनी देओल और महिमा चौधरी मुख्य भूमिकाओं में थे। इसके अलावा, फाल्गुनी का नाम 'दीवानापन' और 'ना तुम जानो ना हम' जैसी फिल्मों के संगीत संबंधी क्रेडिट्स में भी मिलता है।
फाल्गुनी पाठक
- फोटो : इंस्टाग्राम
बदलते दौर में भी क्यों कायम है उनका जादू?
समय के साथ संगीत सुनने का अंदाज बदल गया है। एक दौर था, जब लोग कैसेट और म्यूजिक चैनलों पर अपने पसंदीदा गाने सुनते थे। आज वही संगीत मोबाइल और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आसानी से उपलब्ध है। हर साल नए गायक आते हैं और नए गाने लोकप्रिय होते हैं, लेकिन फाल्गुनी पाठक के गानों का जादू आज भी बरकरार है। नवरात्रि आते ही उनके पुराने गाने फिर से सुनाई देने लगते हैं और गरबा के मैदानों में रौनक बढ़ जाती है।
इस लोकप्रियता की वजह सिर्फ उनके गानों से जुड़ी पुरानी यादें नहीं हैं। उनके गीत लोगों की जिंदगी और त्योहारों का हिस्सा बन चुके हैं। किसी को उनके गाने बचपन की याद दिलाते हैं, तो किसी के लिए वे दोस्तों और परिवार के साथ गरबा खेलने की खुशी से जुड़े हैं। यही वजह है कि आज भी युवा पीढ़ी उनके गानों पर उतने ही उत्साह से नाचती है, जितना पहले की पीढ़ियां नाचा करती थीं।
फाल्गुनी की खासियत यह भी है कि उन्होंने बदलते समय के साथ अपने मंचीय कार्यक्रमों को बेहतर बनाने की कोशिश जारी रखी। एक इंटरव्यू में उन्होंने अपने दर्शकों के प्यार और मंच पर मिलने वाली खुशी के बारे में बात की थी।
समय के साथ संगीत सुनने का अंदाज बदल गया है। एक दौर था, जब लोग कैसेट और म्यूजिक चैनलों पर अपने पसंदीदा गाने सुनते थे। आज वही संगीत मोबाइल और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आसानी से उपलब्ध है। हर साल नए गायक आते हैं और नए गाने लोकप्रिय होते हैं, लेकिन फाल्गुनी पाठक के गानों का जादू आज भी बरकरार है। नवरात्रि आते ही उनके पुराने गाने फिर से सुनाई देने लगते हैं और गरबा के मैदानों में रौनक बढ़ जाती है।
इस लोकप्रियता की वजह सिर्फ उनके गानों से जुड़ी पुरानी यादें नहीं हैं। उनके गीत लोगों की जिंदगी और त्योहारों का हिस्सा बन चुके हैं। किसी को उनके गाने बचपन की याद दिलाते हैं, तो किसी के लिए वे दोस्तों और परिवार के साथ गरबा खेलने की खुशी से जुड़े हैं। यही वजह है कि आज भी युवा पीढ़ी उनके गानों पर उतने ही उत्साह से नाचती है, जितना पहले की पीढ़ियां नाचा करती थीं।
फाल्गुनी की खासियत यह भी है कि उन्होंने बदलते समय के साथ अपने मंचीय कार्यक्रमों को बेहतर बनाने की कोशिश जारी रखी। एक इंटरव्यू में उन्होंने अपने दर्शकों के प्यार और मंच पर मिलने वाली खुशी के बारे में बात की थी।