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यादों में नाना पाटेकर: कुछ लोग चले जाते हैं... अपना स्वभाव छोड़ जाते हैं!

देव प्रकाश चौधरी देव प्रकाश चौधरी
Updated Fri, 09 Oct 2026 09:38 AM IST
सार
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Nana Patekar Memories: कलाकारों की मृत्यु के बाद भी उनकी फिल्में बचती हैं। नाना की फिल्में भी बचेंगी। उनके संवाद भी बचेंगे। लेकिन उससे अधिक जो बचेगा, वह है उनका स्वभाव। प्रसिद्धि के बीच भी सामान्य बने रहने का स्वभाव, भीड़ में भी अपने ढंग से खड़े रहने, किसी के काम आने और सच से न मुकरने का स्वभाव।

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Nana Patekar memories life films dialogue social work and personality
नाना पाटेकर - फोटो : X

विस्तार

नाना पाटेकर चले गए। यह कहते हुए भी भीतर का कोई सच कहता है कि नहीं, बात अभी पूरी नहीं हुई है। कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो जब जाते हैं, तो पीछे छोड़ जाते हैं हवा में अपनी आवाज का भारीपन, एक खास तरह का गुस्सा, जो कभी किसी अन्याय के खिलाफ उबला था और वह अचानक फूट पड़ने वाली हंसी, जो किसी बच्चे की निश्छलता जैसी साफ थी।

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वह अभिनेता थे। बहुत बड़े अभिनेता। लेकिन शायद इससे भी पहले वह एक आदमी थे। मायानगरी ने उन्हें पहचान दी। फिल्मों ने उन्हें लाखों लोगों तक पहुंचाया। 'अंकुश', 'प्रहार', 'परिंदा', 'क्रांतिवीर', 'अब तक छप्पन', 'नटसम्राट', 'कोहराम', 'तिरंगा', 'वेलकम' जैसी ढेर सारी फिल्मों में दिखाई देने वाले चेहरे अलग-अलग थे, लेकिन उनके भीतर का आदमी कहीं न कहीं एक ही था। वह आदमी, जो अन्याय देखकर चुप नहीं रह सकता था। मैंने उन्हें हमेशा ऐसे दरवाजे की तरह देखा, जो कभी पूरी तरह बंद नहीं होता और जब खुलता है तो एक झटके के साथ खुलता है। उनकी आवाज में मराठा माटी की वह सोंधी और तीखी गंध थी, जो जब बोलती थी, तो मुंबई की बड़ी-बड़ी इमारतों के बीच एक खाली सड़क की याद दिलाती थी। उनके चेहरे पर एक ही समय में दो मौसम रहते थे-एक तपती हुई धूप, जहां अन्याय का गुस्सा पकता था और दूसरी अचानक बरस जाने वाली बारिश, जो किसी अबोध बच्चे की हंसी की तरह निर्मल थी।

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क्रांतिवीर फिल्म के लिए नाना पाटेकर को फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला। महान अभिनेता दिलीप कुमार जब उन्हें पु - फोटो : X

सिनेमा ने रंगों के रास्ते बुलाया, अभिनय के रंग जोड़े

जनवरी 2006 में उनसे हुई छोटी-सी मुलाकात अब बहुत दूर की चीज लगती है। फिल्म 'अपहरण' रिलीज हो चुकी थी। नाना सामने थे, लेकिन मैं उन्हें अभिनेता की तरह नहीं देख पा रहा था। मेरे लिए उस समय वह सर जेजे इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड आर्ट' के पुराने विद्यार्थी थे। ऐसा आदमी, जिसने कभी रंगों के सामने बैठकर दुनिया को देखा होगा। उन्होंने कहा, मैं चित्रकार पहले हूं, एक्टर बाद में। कभी-कभी आदमी अपने बारे में एक वाक्य कहता है और फिर उसके बारे में बहुत कुछ कहने की जरूरत नहीं रह जाती। नाना ने बताया था कि मुजफ्फर अली की ‘गमन’ के पोस्टर और पब्लिसिटी डिजाइन उन्होंने किए थे। उसी फिल्म में छोटी भूमिका भी मिली थी। सिनेमा ने उन्हें पहले रंगों के रास्ते बुलाया था, फिर अभिनय के रास्ते।नाना की कठोरता के भीतर एक मुलायम जगह थी, जिसे वह बहुत बचाकर रखते थे। किसी जरूरतमंद की मदद करनी हो तो शायद उन्हें यह बताने की भी जरूरत नहीं थी कि उन्होंने किसी की मदद की है। वे ठीक वैसे ही थे, जैसे गांव में कुछ लोग होते हैं। कई बार वे आपसे सहमत नहीं भी होते, लेकिन संकट में सबसे पहले उन्हीं को आप अपने दरवाजे पर पाते हैं। क्या यह वह कारण नहीं है कि जिस आदमी को पूरा देश जानता था, उसे गांव में रहना अच्छा लगता था। शहर ने उन्हें आभामंडल दिया था। गांव ने आदमी बनाए रखा। उनके भीतर मिट्टी थी। मिट्टी की अपनी गंध होती है। कितनी भी दूर चले जाइए, वह गंध साथ रहती है। नाना के साथ भी रही।

नाना चले गए हैं। कुछ कलाकार फिल्में छोड़ जाते हैं, कुछ संवाद, कुछ अपनी छवियां, नाना इससे कुछ अधिक छोड़ गए हैं और वह है-उनका अपना स्वभाव।

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महाराष्ट्र : सूखा ग्रस्त महिला किसानों के बीच नाना। - फोटो : X

असरदार असल जिंदगी...नदी-तालाब बचाए मुसीबत में किसानों के साथ खड़े रहे नाना

पर्दे पर गुस्से व संघर्ष की आवाज बने नाना ने कैमरे से बाहर महाराष्ट्र के किसानों और गांवों के लिए भी लंबी लड़ाई लड़ी। 2015 में अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ नाम फाउंडेशन की शुरुआत की।

सम्मान की लड़ाई : नाना ने नाम की मदद से सूखाग्रस्त इलाकों में नदियों और नालों को गहरा और चौड़ा करने, पुराने जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने, नहरों की मरम्मत और खेत तालाब बनाने जैसे काम किए। भूजल स्तर बढ़ाने के लिए बारिश के पानी का संचय कर जमीन के भीतर पहुंचाया। इससे आसपास के कुओं और सिंचाई व्यवस्था में भी सुधार हुआ।

आत्मनिर्भर बनाने पर जोर : नाना ने किसान को सिर्फ मदद पाने वाला मानने के बजाय उसे फिर आत्मनिर्भर बनाने पर जोर दिया। तत्काल आर्थिक मदद से इतर, पानी की समस्या का स्थायी समाधान तलाशा, खेती को फिर खड़ा किया और किसान परिवारों को आत्मनिर्भर बनाया। 

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पुणे के एग्रीकल्चर कॉलेज में बिना केमिकल वाली खेती पर चर्चा करते नाना पाटेकर। - फोटो : Instagram @thekisancollege

10 साल में 178 नदियों को संवारा, कई राज्यों में फैला रहे जागरूकता 
नाना का नाम फाउंडेशन 2015 से 2025 के बीच महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में 2,246 जलस्रोतों का पुनरुद्धार किया। 178 नदियों को संवारा। 515 नालों और जलधाराओं को गहरा और चौड़ा किया गया। 769 टैंकों के गाद निकाले गए।

संस्था महाराष्ट्र के अलावा असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर में शहीदों के बच्चों के लिए स्कूल बनाने का काम कर रही है। साथ ही, बाढ़ प्रभावितों की मदद में भी जुटी है। मेघालय और असम को भी बाद में इन राज्यों से जोड़ा गया। संस्थान ने बिहार में बाढ़ से प्रभावित गांवों के पुनर्निर्माण में भी योगदान दिया।
 

कहानी उस गांव की, जिसे नाना ने पानी के संकट से उबारा...आज वह टैंकर मुक्त 
महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर से 57 किमी दूर वैजापुर तहसील के धोंडलगांव को नाना ने 2016 में गोद लिया था। नदी विशेषज्ञ आनंद असोलकर बताते हैं कि मीठे नींबू के लिए प्रसिद्ध इस गांव में बारिश खत्म होते ही पानी के टैंकर आने लगते थे। नदी पर बने 12 बैराज गाद से भर गए। पानी रुकना बंद हुआ और किसान एक साल में एक से ज्यादा फसल भी नहीं उगा पाते थे। नाम की मदद से गाद हटी, तो पानी जमा करने की क्षमता बढ़ गई। आज 70% किसान साल में दो फसल, जबकि कुछ तीन फसल भी उगाते हैं। 2016 से गांव टैंकर मुक्त है। 

कोविड में किसानों को 15-15 हजार के चेक 
किसानों की आत्महत्या के बाद उनके परिवारों की हालत को बेहद करीब से देखने वाले नाना ने 2015 में कई परिवारों को 15 हजार के चेक दिए। कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान नाम ने महाराष्ट्र में 11,236 जरूरतमंद परिवारों को राशन-किराना किट बांटे।  15 से 25 हजार रुपये तक की आर्थिक मदद भी दी।
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