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Bhiwani News: बहल व लोहारू में अत्यधिक दोहन से भूजल संकट गहराया
Fri, 21 Aug 2026 01:00 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
Updated Fri, 21 Aug 2026 01:00 AM IST
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भूमिगत जल स्तर नीचे जाने से बंद पड़ा बोरवेल।
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भिवानी। जिले के बहल और लोहारू खंड में भूजल की स्थिति बेहद चिंताजनक हो गई है। सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) की नेशनल एक्विफर मैपिंग एंड मैनेजमेंट प्रोग्राम-2.0 (राष्ट्रीय जलभंडार प्रबंधन परियोजना) के तहत तैयार रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है।
पता चला है कि दोनों खंडों में भूजल(भूमिगत जल) का दोहन उसकी प्राकृतिक क्षमता से कहीं ज्यादा हो रहा है। इससे दोनों खंड ओवर-एक्सप्लॉइटेड श्रेणी में आ गए हैं। एनएक्यूयूआईएम-2.0 के तहत वैज्ञानिकों ने ग्राउंड वाटर लेवल मॉनिटरिंग नेटवर्क को मजबूत किया। आइसोटोपिक स्टडी, जियोफिजिकल जांच, मिट्टी के इनफिल्ट्रेशन टेस्ट और स्टेट डेटा को मिलाकर कमियों को दूर किया।
जिस एरिया में यह स्टडी की गई, वह एरिया करीब 663 वर्ग किलोमीटर में फैला है। वहां सेमी-एरिड क्लाइमेट है और सालाना औसत बारिश सिर्फ 420 मिमी है। जिसमें से ज्यादातर बारिश मानसून में होती है। हाइड्रोजियोलॉजिकल रूप से यहां एल्यूवियम और एओलियन फॉर्मेशन हैं जो हार्ड रॉक पर टिके हैं।
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भूमिगत जलस्तर में हर साल आ रही लगभग एक मीटर गिरावट
रिपोर्ट में सबसे भयावह तथ्य भूमिगत जलस्तर को लेकर है। बताया गया है कि ज्यादातर इलाकों में वाटर लेवल की गहराई 50 मीटर से ज्यादा है। सालाना औसत गिरावट 0.7 से 0.9 मीटर है। बहल खंड में औसत गिरावट -0.91 मीटर और लोहारू में -0.736 मीटर दर्ज की गई। दोनों खंड मिलकर 6600 हेक्टेयर मीटर से ज्यादा का नेट नेगेटिव ग्राउंड वाटर बैलेंस दिखा रहे हैं। यानी जितना पानी रिचार्ज हो रहा है उससे कहीं ज्यादा निकाला जा रहा है। बहल ब्लॉक के लगभग 97 प्रतिशत हिस्से में -1 से 0 मीटर तक की गिरावट है जबकि कुछ हिस्सों में -3 से -2 मीटर की तेज गिरावट देखी गई है जो सबसे ज्यादा दबाव वाले जोन हैं। लोहारू ब्लॉक में अकेले -3392 एचएएम की नेट कमी है। सिर्फ 13 प्रतिशत एरिया में मामूली बढ़ोतरी दिखी है, जो कुल नुकसान की भरपाई नहीं कर पा रही। ग्राउंड वाटर रिसोर्स असेसमेंट के मुताबिक दोनों ब्लॉक में डेवलपमेंट स्टेज 150 प्रतिशत से ज्यादा है।
पानी की गुणवत्ता भी खराब, फ्लोराइड, नाइट्रेट और यूरेनियम
रिपोर्ट में पानी की गुणवत्ता पर भी गंभीर सवाल उठे हैं। 37 ग्राउंड वाटर सेंपल्स की जांच में ज्यादा सैलिनिटी, हार्डनेस, फ्लोराइड, नाइट्रेट और यूरेनियम मिला है। फ्लोराइड का स्तर 2024 में प्री-मानसून में 0.26 से 3.00 एमजी और पोस्ट-मानसून में 0.29 से 3.90 एमजी पाया गया। बीआईएस मानक के अनुसार 1.5 एमजी से ज्यादा फ्लोराइड खतरनाक है। प्री-मानसून में 11 प्रतिशत और पोस्ट-मानसून में 24 प्रतिशत सेंपल इस सीमा से ऊपर मिले। सबसे ज्यादा फ्लोराइड बहल ब्लॉक के कुराल-1 गांव में मिला, जो डेंटल और स्केलेटल फ्लोरोसिस का कारण बन सकता है। रिपोर्ट में फ्लोराइड और कैल्शियम के बीच नेगेटिव कोरिलेशन पाया गया है, जो बताता है कि कैल्साइट प्रेसिपिटेशन के कारण फ्लोराइट डिसॉल्यूशन से फ्लोराइड बढ़ रहा है। सिंचाई के लिए भूजल का अत्यधिक दोहन भी इसका एक कारण है।
कई तरह से पानी को सहेजकर सुधार सकते हैं स्थिति
कई तरह से पानी को सहेजकर हम इस खतरनाक स्थिति से बाहर आ सकते हैं। इसके मुख्य सुझावों में परकोलेशन तालाब, रिचार्ज शाफ्ट और कुएं बनाना, छत पर बारिश का पानी जमा करना, माइक्रो-इरिगेशन को बढ़ावा देना, फसल अलग-अलग तरह की खेती, सिंचाई की बेहतर क्षमता और क्वालिटी पर असर वाले ग्राउंड वाटर के लिए ब्लेंडिंग और ट्रीटमेंट के तरीके अपनाना शामिल है। जिला में भूजल स्तर की स्टडी में लगातार मॉनिटरिंग, कम्युनिटी की भागीदारी और लागू करने वाली एजेंसियों के बीच मिलकर काम करने की अहमियत पर जोर दिया गया है ताकि बहल और लोहारू खंड में लंबे समय तक ग्राउंड वाटर की सुरक्षा पक्की हो सके।
-अशोक बुवानीवाला, अध्यक्ष, अग्रवाल वैश्य समाज हरियाणा।
बहल और लोहारू का भूमिगत जल स्तर खतरनाक ढंग से नीचे गिर रहा है। जिसकी वजह से ये दोनों खंड डेंजर जोन में शामिल हैं। इनमें भूमिगत जल स्तर को ऊपर लाने और सुधार के लिए सिंचाई विभाग इन सूखे इलाकों में तालाब बनवा रहा है, जिसके अंदर नहरी पानी को भंडारित किया जा रहा है। ये पानी सिंचाई में प्रयोग के साथ भूमिगत जल सुधार का भी काम रहा है।
-चंद्रप्रकाश सहायक भूवैज्ञानिक, भूजल सिंचाई विभाग।
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पता चला है कि दोनों खंडों में भूजल(भूमिगत जल) का दोहन उसकी प्राकृतिक क्षमता से कहीं ज्यादा हो रहा है। इससे दोनों खंड ओवर-एक्सप्लॉइटेड श्रेणी में आ गए हैं। एनएक्यूयूआईएम-2.0 के तहत वैज्ञानिकों ने ग्राउंड वाटर लेवल मॉनिटरिंग नेटवर्क को मजबूत किया। आइसोटोपिक स्टडी, जियोफिजिकल जांच, मिट्टी के इनफिल्ट्रेशन टेस्ट और स्टेट डेटा को मिलाकर कमियों को दूर किया।
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जिस एरिया में यह स्टडी की गई, वह एरिया करीब 663 वर्ग किलोमीटर में फैला है। वहां सेमी-एरिड क्लाइमेट है और सालाना औसत बारिश सिर्फ 420 मिमी है। जिसमें से ज्यादातर बारिश मानसून में होती है। हाइड्रोजियोलॉजिकल रूप से यहां एल्यूवियम और एओलियन फॉर्मेशन हैं जो हार्ड रॉक पर टिके हैं।
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भूमिगत जलस्तर में हर साल आ रही लगभग एक मीटर गिरावट
रिपोर्ट में सबसे भयावह तथ्य भूमिगत जलस्तर को लेकर है। बताया गया है कि ज्यादातर इलाकों में वाटर लेवल की गहराई 50 मीटर से ज्यादा है। सालाना औसत गिरावट 0.7 से 0.9 मीटर है। बहल खंड में औसत गिरावट -0.91 मीटर और लोहारू में -0.736 मीटर दर्ज की गई। दोनों खंड मिलकर 6600 हेक्टेयर मीटर से ज्यादा का नेट नेगेटिव ग्राउंड वाटर बैलेंस दिखा रहे हैं। यानी जितना पानी रिचार्ज हो रहा है उससे कहीं ज्यादा निकाला जा रहा है। बहल ब्लॉक के लगभग 97 प्रतिशत हिस्से में -1 से 0 मीटर तक की गिरावट है जबकि कुछ हिस्सों में -3 से -2 मीटर की तेज गिरावट देखी गई है जो सबसे ज्यादा दबाव वाले जोन हैं। लोहारू ब्लॉक में अकेले -3392 एचएएम की नेट कमी है। सिर्फ 13 प्रतिशत एरिया में मामूली बढ़ोतरी दिखी है, जो कुल नुकसान की भरपाई नहीं कर पा रही। ग्राउंड वाटर रिसोर्स असेसमेंट के मुताबिक दोनों ब्लॉक में डेवलपमेंट स्टेज 150 प्रतिशत से ज्यादा है।
पानी की गुणवत्ता भी खराब, फ्लोराइड, नाइट्रेट और यूरेनियम
रिपोर्ट में पानी की गुणवत्ता पर भी गंभीर सवाल उठे हैं। 37 ग्राउंड वाटर सेंपल्स की जांच में ज्यादा सैलिनिटी, हार्डनेस, फ्लोराइड, नाइट्रेट और यूरेनियम मिला है। फ्लोराइड का स्तर 2024 में प्री-मानसून में 0.26 से 3.00 एमजी और पोस्ट-मानसून में 0.29 से 3.90 एमजी पाया गया। बीआईएस मानक के अनुसार 1.5 एमजी से ज्यादा फ्लोराइड खतरनाक है। प्री-मानसून में 11 प्रतिशत और पोस्ट-मानसून में 24 प्रतिशत सेंपल इस सीमा से ऊपर मिले। सबसे ज्यादा फ्लोराइड बहल ब्लॉक के कुराल-1 गांव में मिला, जो डेंटल और स्केलेटल फ्लोरोसिस का कारण बन सकता है। रिपोर्ट में फ्लोराइड और कैल्शियम के बीच नेगेटिव कोरिलेशन पाया गया है, जो बताता है कि कैल्साइट प्रेसिपिटेशन के कारण फ्लोराइट डिसॉल्यूशन से फ्लोराइड बढ़ रहा है। सिंचाई के लिए भूजल का अत्यधिक दोहन भी इसका एक कारण है।
कई तरह से पानी को सहेजकर सुधार सकते हैं स्थिति
कई तरह से पानी को सहेजकर हम इस खतरनाक स्थिति से बाहर आ सकते हैं। इसके मुख्य सुझावों में परकोलेशन तालाब, रिचार्ज शाफ्ट और कुएं बनाना, छत पर बारिश का पानी जमा करना, माइक्रो-इरिगेशन को बढ़ावा देना, फसल अलग-अलग तरह की खेती, सिंचाई की बेहतर क्षमता और क्वालिटी पर असर वाले ग्राउंड वाटर के लिए ब्लेंडिंग और ट्रीटमेंट के तरीके अपनाना शामिल है। जिला में भूजल स्तर की स्टडी में लगातार मॉनिटरिंग, कम्युनिटी की भागीदारी और लागू करने वाली एजेंसियों के बीच मिलकर काम करने की अहमियत पर जोर दिया गया है ताकि बहल और लोहारू खंड में लंबे समय तक ग्राउंड वाटर की सुरक्षा पक्की हो सके।
-अशोक बुवानीवाला, अध्यक्ष, अग्रवाल वैश्य समाज हरियाणा।
बहल और लोहारू का भूमिगत जल स्तर खतरनाक ढंग से नीचे गिर रहा है। जिसकी वजह से ये दोनों खंड डेंजर जोन में शामिल हैं। इनमें भूमिगत जल स्तर को ऊपर लाने और सुधार के लिए सिंचाई विभाग इन सूखे इलाकों में तालाब बनवा रहा है, जिसके अंदर नहरी पानी को भंडारित किया जा रहा है। ये पानी सिंचाई में प्रयोग के साथ भूमिगत जल सुधार का भी काम रहा है।
-चंद्रप्रकाश सहायक भूवैज्ञानिक, भूजल सिंचाई विभाग।