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Panchkula News: जख्म आज भी हरे हैं, सजा होकर फांसी लगती तो ठीक था

Fri, 21 Aug 2026 02:02 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Fri, 21 Aug 2026 02:02 AM IST
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The wounds are still fresh; it would have been better if the punishment had been hanging.
सज्जन कुमार की मौत पर दंगा पीड़ितों की प्रतिक्रिया, फिर उठे 1984 के न्याय से जुड़े सवाल
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अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। 1984 के सिख विरोधी दंगों के दोषी सज्जन कुमार की 80 वर्ष की उम्र में मौत हो गई है। उनकी मौत के साथ ही पंजाब में करीब चार दशक पुराने जख्म फिर से चर्चा में आ गए हैं। दंगा पीड़ितों ने सज्जन कुमार की कुदरती मौत पर असंतोष व्यक्त किया है।
1984-वेलफेयर सोसायटी की महिला विंग की अध्यक्ष गुरदीप कौर ने कहा कि उनके जख्म आज भी हरे हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें संतुष्टि तब मिलती जब सज्जन कुमार को अदालत से सजा मिलती या फांसी होती। गुरदीप कौर के अनुसार, सज्जन कुमार को पूरी जिंदगी जेल में काटनी चाहिए थी।
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शिअद की सांसद हरसिमरत कौर बादल ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि सज्जन कुमार का नाम सिख इतिहास में काले अक्षरों में लिखा गया है। हरसिमरत कौर बादल ने जोर दिया कि उसकी मौत फांसी से होनी चाहिए थी। उन्हें अपने किए की सजा मिलनी चाहिए थी। सज्जन कुमार को तबीयत बिगड़ने के बाद तिहाड़ से दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया था। वहीं उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।
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सज्जन कुमार पर आरोप

31 अक्तूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी। इसके बाद दिल्ली समेत कई जगह सिखों के खिलाफ हिंसा भड़की। सज्जन कुमार पर भीड़ भड़काने और हिंसा में भूमिका निभाने का आरोप था। 2018 में दिल्ली हाईकोर्ट ने उन्हें 5 सिखों की हत्या और राजनगर के गुरुद्वारे को जलाने से जुड़े मामले में दोषी ठहराया। हाईकोर्ट ने उन्हें उम्रकैद की सजा दी।




साल 1984 का महत्व

साल 1984 पंजाब के लिए कई मायनों में अहम था। जून 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ। इसमें अमृतसर स्थित हरिमंदिर साहिब परिसर में सैन्य कार्रवाई की गई। इसके कुछ महीने बाद इंदिरा गांधी की हत्या हुई और सिख विरोधी हिंसा भड़की। सज्जन कुमार जैसे नेताओं पर हुई न्यायिक कार्रवाई को 1984 के व्यापक न्याय से जोड़ा जाता है।
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