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केपीएससी भर्ती मामला: एसआईटी प्रमुख की नियुक्ति पर विवाद, डीजीपी आलोक कुमार बोले- मेरे खिलाफ जांच लंबित नहीं
Wed, 14 Oct 2026 06:43 PM IST
देवेश त्रिपाठी
पीटीआई, बंगलूरू
पीटीआई, बंगलूरू
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Wed, 14 Oct 2026 06:43 PM IST
कर्नाटक के डीजीपी आलोक कुमार ने मुख्य सचिव शालिनी रजनीश को पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट में उनके खिलाफ सीबीआई जांच लंबित होने संबंधी सरकारी दावे को गलत बताया है। उन्होंने कहा कि टेलीफोन टैपिंग मामले में सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट फरवरी 2024 में स्वीकार की जा चुकी है।
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आलोक कुमार ने कर्नाटक सरकार के दावे को बताया तथ्यात्मक रूप से गलत
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
कर्नाटक के डीजीपी (जेल) आलोक कुमार ने कर्नाटक लोक सेवा आयोग (केपीएससी) में कथित अनियमितताओं की जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) के प्रमुख के रूप में उनकी नियुक्ति का राज्य सरकार द्वारा विरोध किए जाने पर आपत्ति जताई है। उन्होंने मुख्य सचिव शालिनी रजनीश को पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट में दिए गए सरकार के बयान में सुधार कराने का आग्रह किया है।
पांच अक्तूबर को लिखे पत्र में कुमार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार की ओर से यह दावा किया गया कि उनके खिलाफ सीबीआई जांच लंबित है, जबकि यह तथ्यात्मक रूप से गलत है। उन्होंने कहा कि इस दावे से उन्हें अनावश्यक रूप से विवाद में घसीटा गया और उनकी पेशेवर ईमानदारी तथा प्रतिष्ठा पर सवाल उठे हैं। पत्र की एक प्रति पीटीआई के पास है।
सुप्रीम कोर्ट ने एक अक्तूबर को कर्नाटक हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी थी, जिसमें आलोक कुमार की अध्यक्षता में एसआईटी गठित की गई थी। मामले में अगली सुनवाई 12 अक्तूबर को निर्धारित की गई थी।
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कपिल सिब्बल के बयान पर जताई आपत्ति
आलोक कुमार ने पत्र में कहा कि राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में जो बातें रखीं, वे आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज तथ्यों के अनुरूप नहीं हैं। सिब्बल ने टेलीफोन टैपिंग के आरोपों से जुड़े मामले में कथित लंबित सीबीआई जांच का हवाला देते हुए कुमार की एसआईटी प्रमुख के रूप में नियुक्ति का विरोध किया था। ये आरोप उस अवधि से संबंधित हैं, जब कुमार बंगलूरू के पुलिस आयुक्त थे।
कुमार के मुताबिक, टेलीफोन टैपिंग मामले में सीबीआई की जांच आधिकारिक रूप से बंद हो चुकी है। एजेंसी ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी, जिसे सीबीआई की विशेष अदालत ने 13 फरवरी 2024 को स्वीकार कर लिया था। उन्होंने अदालत के उस आदेश का भी उल्लेख किया, जिसमें दर्ज है कि शिकायतकर्ता को क्लोजर रिपोर्ट पर कोई आपत्ति नहीं थी।
उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने मई 2023 में उनके पक्ष पर विचार करने के बाद यह फैसला किया था कि उनके खिलाफ विभागीय जांच की आवश्यकता नहीं है। कुमार ने सीबीआई की अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश को चुनौती देते हुए अपना पक्ष रखा था।
कैट ने नोटिस और आरोपपत्र रद्द किए
पत्र के अनुसार, कुमार ने नौ मई 2025 को जारी कारण बताओ नोटिस और आरोपपत्र को केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) में चुनौती दी थी। कैट की बंगलूरू पीठ में विभाजित फैसला आने के बाद अधिकरण के अध्यक्ष ने 14 अक्तूबर 2025 के आदेश में नोटिस और आरोपपत्र रद्द कर दिए थे। साथ ही, इसके अनुरूप लाभ देने का निर्देश दिया था।
राज्य सरकार ने 31 अक्तूबर 2025 को कैट अध्यक्ष के आदेश को कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी। कुमार ने कहा कि हाईकोर्ट ने अधिकरण के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था और मामला अभी लंबित है। उन्होंने पत्र में कहा, "इसलिए आज की तारीख में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष जिस मामले का उल्लेख किया गया, उससे संबंधित कोई सीबीआई जांच, पूछताछ, विभागीय जांच या कार्यवाही मेरे खिलाफ लंबित नहीं है।"
सीबीआई की प्रारंभिक जांच में अपराध नहीं मिला था
कुमार ने कहा कि सीबीआई ने पांच जनवरी 2022 को अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट सौंपी थी। उसमें कोई आपराधिक गतिविधि नहीं पाई गई थी। एजेंसी ने केवल तीन अधिकारियों के खिलाफ राज्य सरकार को उचित कार्रवाई पर विचार करने की सलाह दी थी, जिनमें कुमार भी शामिल थे।
उन्होंने कहा कि टेलीफोन टैपिंग के आरोप सितंबर 2018 से अगस्त 2019 के बीच की अवधि से जुड़े थे, जबकि वह 17 जून से दो अगस्त 2019 तक ही बंगलूरू के पुलिस आयुक्त रहे थे। कुमार के मुताबिक, तत्कालीन मुख्यमंत्री ने उनके स्पष्टीकरण और पक्ष पर विचार करने के बाद उनके खिलाफ जांच या अनुशासनात्मक कार्यवाही की आवश्यकता नहीं मानी थी। उन्होंने कहा कि संबंधित फाइलों और टिप्पणियों की कैट ने भी जांच की थी।
मीडिया में खबर आने पर जताई चिंता
आलोक कुमार ने सुप्रीम कोर्ट में दिए गए बयानों को मीडिया में जगह मिलने पर चिंता जताई। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने एसआईटी प्रमुख नियुक्त किए जाने के लिए हाईकोर्ट का रुख नहीं किया था और न ही इस पद की इच्छा जताई थी। उनके अनुसार, हाईकोर्ट ने 21 सितंबर 2026 के आदेश में उन्हें एसआईटी का प्रमुख नियुक्त किया था।
हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश ने केपीएससी में भर्ती से जुड़ी कथित बड़े पैमाने की अनियमितताओं की जांच के लिए एसआईटी गठित की थी। इसमें पशु चिकित्सकों की नियुक्ति और केपीएससी अध्यक्ष शिवशंकरप्पा एस साहुकार की बेटियों को औद्योगिक अधिकारी नियुक्त किए जाने से जुड़े आरोप भी शामिल हैं।
राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल करना है। ऐसे में कुमार ने मुख्य सचिव से अनुरोध किया कि जवाब दाखिल करने से पहले कानूनी टीम को संबंधित अदालती आदेशों और आधिकारिक रिकॉर्ड की जानकारी दी जाए। उन्होंने यह भी आग्रह किया कि हलफनामे में उनके खिलाफ कोई गलत या अपुष्ट आरोप शामिल न किया जाए और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सही तथ्य रखे जाएं।
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पांच अक्तूबर को लिखे पत्र में कुमार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार की ओर से यह दावा किया गया कि उनके खिलाफ सीबीआई जांच लंबित है, जबकि यह तथ्यात्मक रूप से गलत है। उन्होंने कहा कि इस दावे से उन्हें अनावश्यक रूप से विवाद में घसीटा गया और उनकी पेशेवर ईमानदारी तथा प्रतिष्ठा पर सवाल उठे हैं। पत्र की एक प्रति पीटीआई के पास है।
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सुप्रीम कोर्ट ने एक अक्तूबर को कर्नाटक हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी थी, जिसमें आलोक कुमार की अध्यक्षता में एसआईटी गठित की गई थी। मामले में अगली सुनवाई 12 अक्तूबर को निर्धारित की गई थी।
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कपिल सिब्बल के बयान पर जताई आपत्ति
आलोक कुमार ने पत्र में कहा कि राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में जो बातें रखीं, वे आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज तथ्यों के अनुरूप नहीं हैं। सिब्बल ने टेलीफोन टैपिंग के आरोपों से जुड़े मामले में कथित लंबित सीबीआई जांच का हवाला देते हुए कुमार की एसआईटी प्रमुख के रूप में नियुक्ति का विरोध किया था। ये आरोप उस अवधि से संबंधित हैं, जब कुमार बंगलूरू के पुलिस आयुक्त थे।
कुमार के मुताबिक, टेलीफोन टैपिंग मामले में सीबीआई की जांच आधिकारिक रूप से बंद हो चुकी है। एजेंसी ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी, जिसे सीबीआई की विशेष अदालत ने 13 फरवरी 2024 को स्वीकार कर लिया था। उन्होंने अदालत के उस आदेश का भी उल्लेख किया, जिसमें दर्ज है कि शिकायतकर्ता को क्लोजर रिपोर्ट पर कोई आपत्ति नहीं थी।
उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने मई 2023 में उनके पक्ष पर विचार करने के बाद यह फैसला किया था कि उनके खिलाफ विभागीय जांच की आवश्यकता नहीं है। कुमार ने सीबीआई की अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश को चुनौती देते हुए अपना पक्ष रखा था।
कैट ने नोटिस और आरोपपत्र रद्द किए
पत्र के अनुसार, कुमार ने नौ मई 2025 को जारी कारण बताओ नोटिस और आरोपपत्र को केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) में चुनौती दी थी। कैट की बंगलूरू पीठ में विभाजित फैसला आने के बाद अधिकरण के अध्यक्ष ने 14 अक्तूबर 2025 के आदेश में नोटिस और आरोपपत्र रद्द कर दिए थे। साथ ही, इसके अनुरूप लाभ देने का निर्देश दिया था।
राज्य सरकार ने 31 अक्तूबर 2025 को कैट अध्यक्ष के आदेश को कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी। कुमार ने कहा कि हाईकोर्ट ने अधिकरण के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था और मामला अभी लंबित है। उन्होंने पत्र में कहा, "इसलिए आज की तारीख में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष जिस मामले का उल्लेख किया गया, उससे संबंधित कोई सीबीआई जांच, पूछताछ, विभागीय जांच या कार्यवाही मेरे खिलाफ लंबित नहीं है।"
सीबीआई की प्रारंभिक जांच में अपराध नहीं मिला था
कुमार ने कहा कि सीबीआई ने पांच जनवरी 2022 को अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट सौंपी थी। उसमें कोई आपराधिक गतिविधि नहीं पाई गई थी। एजेंसी ने केवल तीन अधिकारियों के खिलाफ राज्य सरकार को उचित कार्रवाई पर विचार करने की सलाह दी थी, जिनमें कुमार भी शामिल थे।
उन्होंने कहा कि टेलीफोन टैपिंग के आरोप सितंबर 2018 से अगस्त 2019 के बीच की अवधि से जुड़े थे, जबकि वह 17 जून से दो अगस्त 2019 तक ही बंगलूरू के पुलिस आयुक्त रहे थे। कुमार के मुताबिक, तत्कालीन मुख्यमंत्री ने उनके स्पष्टीकरण और पक्ष पर विचार करने के बाद उनके खिलाफ जांच या अनुशासनात्मक कार्यवाही की आवश्यकता नहीं मानी थी। उन्होंने कहा कि संबंधित फाइलों और टिप्पणियों की कैट ने भी जांच की थी।
मीडिया में खबर आने पर जताई चिंता
आलोक कुमार ने सुप्रीम कोर्ट में दिए गए बयानों को मीडिया में जगह मिलने पर चिंता जताई। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने एसआईटी प्रमुख नियुक्त किए जाने के लिए हाईकोर्ट का रुख नहीं किया था और न ही इस पद की इच्छा जताई थी। उनके अनुसार, हाईकोर्ट ने 21 सितंबर 2026 के आदेश में उन्हें एसआईटी का प्रमुख नियुक्त किया था।
हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश ने केपीएससी में भर्ती से जुड़ी कथित बड़े पैमाने की अनियमितताओं की जांच के लिए एसआईटी गठित की थी। इसमें पशु चिकित्सकों की नियुक्ति और केपीएससी अध्यक्ष शिवशंकरप्पा एस साहुकार की बेटियों को औद्योगिक अधिकारी नियुक्त किए जाने से जुड़े आरोप भी शामिल हैं।
राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल करना है। ऐसे में कुमार ने मुख्य सचिव से अनुरोध किया कि जवाब दाखिल करने से पहले कानूनी टीम को संबंधित अदालती आदेशों और आधिकारिक रिकॉर्ड की जानकारी दी जाए। उन्होंने यह भी आग्रह किया कि हलफनामे में उनके खिलाफ कोई गलत या अपुष्ट आरोप शामिल न किया जाए और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सही तथ्य रखे जाएं।