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ब्रेकअप से खुला था पेपर लीक का राज: अब कपड़े के बैग से खुला महाराष्ट्र में फर्जी मार्कशीट रैकेट, तीन गिरफ्तार
महाराष्ट्र में नामी विश्वविद्यालयों की फर्जी डिग्री और सर्टिफिकेट बनाने वाले रैकेट का खुलासा हुआ है। पुलिस ने इस मामले में तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है। यह खुलासा एक बैग से हुआ, जो आरोपी ने पड़ोसी के घर रखा हुआ था।
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महाराष्ट्र में बड़ी धांधली का खुलासा।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
महाराष्ट्र में एक लव स्टोरी के टूटने से परीक्षा पेपर लीक का सनसनीखेज मामला सामने आने के बाद अब फर्जी शैक्षणिक डिग्री और सर्टिफिकेट बेचने वाले गिरोह का भी हैरान करने वाला खुलासा हुआ है। इस बार इस रैकेट का पर्दाफाश किसी खुफिया सूचना या बड़ी पुलिस कार्रवाई से नहीं, बल्कि करीब 8 महीने से पड़ोसी के घर में पड़े कपड़े के एक साधारण बैग से हुआ। बैग खुला तो उसमें देश के नामी विश्वविद्यालयों की संदिग्ध मार्कशीट, डिप्लोमा और माइग्रेशन सर्टिफिकेट मिले। दस्तावेजों की जांच के बाद पुलिस ने इस रैकेट में शामिल तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है। इनमें दो आरोपी शुक्रवार को पकड़े गए।
एक बैग से कैसे खुला फर्जी मार्कशीट-डिग्री का घोटाला?
यह मामला महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के दुर्गापुर थाना क्षेत्र का है। पुलिस के अनुसार, यह गिरोह बिना परीक्षा दिए लोगों को नामी विश्वविद्यालयों की फर्जी डिग्री और अन्य शैक्षणिक प्रमाणपत्र उपलब्ध कराता था। इसके लिए पांच लाख से दस लाख रुपये तक वसूले जाते थे। पुलिस ने इस मामले में कुछ दिन पहले तुकुम इलाके के रहने वाले परिमल बाबूराव गौरकर और वैभव भोलाराम सोनुले के खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी का मामला दर्ज किया था। सोनुले को पुलिस ने शिकायत दर्ज होने के दिन ही गिरफ्तार कर लिया था, जबकि मुख्य आरोपी परिमल गौरकर और उसके साथी अक्षय खोब्रागड़े को शुक्रवार को नागपुर से पकड़ा गया।
पुलिस जांच के मुताबिक, इस पूरे रैकेट का राज उस समय खुला, जब तुकुम स्थित चिंतामणि अपार्टमेंट में रहने वाले वैभव मशिरकर के घर रखा एक कपड़े का बैग संदिग्ध लगा। बताया गया है कि आरोपी परिमल गौरकर ने इसी साल जनवरी में यह बैग अपने पड़ोसी मशिरकर के घर सुरक्षित रखने के लिए दिया था। गौरकर बीच-बीच में बैग से कुछ कागजात निकालने के लिए उनके घर आता था। लेकिन कई महीनों तक जब वह बैग लेने नहीं पहुंचा, तो मशिरकर को शक हुआ। उन्होंने बैग खोलकर देखा तो उनके होश उड़ गए। उसमें देश के कई चर्चित विश्वविद्यालयों के नाम से तैयार की गई संदिग्ध मार्कशीट और दूसरे शैक्षणिक दस्तावेज रखे हुए थे।
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कई प्रमुख विश्वविद्यालयों की फर्जी डिग्री मिलीं
मशिरकर तुरंत इन दस्तावेजों को लेकर दुर्गापुर पुलिस स्टेशन पहुंचे और पुलिस को पूरी जानकारी दी। मशिरकर ने अपने बयान में पुलिस को बताया कि गौरकर पहले भी उनसे दावा कर चुका था कि वह देश के बड़े विश्वविद्यालयों के फर्जी सर्टिफिकेट 5 से 10 लाख रुपये में बनवा सकता है। पुलिस ने जब बैग की तलाशी ली तो उसमें संत गाडगे बाबा अमरावती विश्वविद्यालय, सोलापुर विश्वविद्यालय, श्रीधर विश्वविद्यालय, पिलानी विश्वविद्यालय, गोंडवाना विश्वविद्यालय और छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर के नाम से तैयार किए गए दस्तावेज मिले। इनमें मार्कशीट, डिप्लोमा और माइग्रेशन सर्टिफिकेट शामिल थे।
पुलिस की शुरुआती जांच में इन दस्तावेजों पर लगी मुहरों और अधिकारियों के हस्ताक्षरों को संदिग्ध पाया गया। आरोप है कि गिरोह इन फर्जी दस्तावेजों को इस तरह तैयार करता था कि वे पहली नजर में असली दिखाई दें। इसके बाद इन्हें जरूरतमंद लोगों को मोटी रकम लेकर बेच दिया जाता था। अब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि आरोपियों ने अब तक कितने लोगों को फर्जी डिग्री और प्रमाणपत्र दिए हैं और इनका इस्तेमाल कहां-कहां किया गया।
जांच एजेंसियों को शक है कि फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल सरकारी और निजी नौकरियों में नियुक्ति, कॉलेजों में दाखिले और नौकरी में पदोन्नति हासिल करने के लिए किया गया हो सकता है। पुलिस आरोपियों के बैंक खातों और पिछले वित्तीय लेनदेन की भी जांच कर रही है। इसके जरिए उन एजेंटों और अन्य लोगों तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है, जो इस नेटवर्क में शामिल हो सकते हैं। पुलिस अब यह भी पता लगा रही है कि फर्जी मार्कशीट और डिग्री तैयार करने का काम कहां होता था, दस्तावेजों पर जाली मोहर और हस्ताक्षर कौन करता था और इस रैकेट का नेटवर्क क्या महाराष्ट्र के बाहर तक भी फैला हुआ था?
लड़की के पूर्व प्रेमी के यू-टर्न के बाद व्हिसलब्लोअर ने खोला मोर्चा
महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (MPSC) की क्लास-II ड्रग्स इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा में पेपर लीक का मामला एक वीडियो से शुरू होकर मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच की जांच तक पहुंच गया। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम मोड़ तब आया, जब जिस शख्स ने शुरुआत में पेपर लीक के सबूत व्हिसलब्लोअर के साथ साझा किए थे, वही बाद में अपने आरोपों से मुकर गया। मुख्य गवाह के इस यू-टर्न के बाद भी व्हिसलब्लोअर ऋषिकेश बनगरडे पाटिल पीछे नहीं हटे। जब उन्हें लगा कि मामला दबाया जा रहा है, तो उन्होंने सीधे एनसीपी (एसपी) विधायक रोहित पवार का दरवाजा खटखटाया। बनगरडे ने रोहित पवार को मूल व्हाट्सऐप चैट, कथित तौर पर लीक हुए प्रश्नों और पूरे मामले से जुड़े दस्तावेज सौंपे। इसके बाद रोहित पवार खुद बनगरडे को साथ लेकर मुंबई पुलिस कमिश्नर के पास पहुंचे और मामले की विस्तृत जांच की मांग की।
दरअसल, इस पूरे मामले की शुरुआत जुलाई में हुई। MPSC की ड्रग्स इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा की कट-ऑफ सूची जारी होने के बाद ऋषिकेश बनगरडे पाटिल ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी कर सवाल उठाया कि अभ्यर्थियों को उनके प्राप्तांक बताए बिना चयन प्रक्रिया कैसे पूरी की जा सकती है। इस वीडियो को 69 हजार से ज्यादा बार देखा गया। इसी वीडियो को देखने के बाद गौरव पाटिल नाम के एक व्यक्ति ने बनगरडे से संपर्क किया। दोनों की मुलाकात हुई तो गौरव ने उन्हें अभ्यर्थी और अपनी पूर्व प्रेमिका ऋतुजा पाटिल के साथ हुई अपनी व्हाट्सऐप चैट दिखाई।
इस चैट के आधार पर दावा किया गया कि 22 मार्च को हुई ड्रग्स इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा के करीब 80 प्रतिशत सवाल परीक्षा से दो दिन पहले ही लीक हो गए थे। इसके बाद बनगरडे और गौरव पाटिल ने 23 जुलाई को व्हाट्सऐप चैट और प्रश्नों से जुड़े दस्तावेजों का संकलन तैयार कर MPSC को ईमेल के जरिए भेजा। अगले दिन 24 जुलाई को MPSC के विजिलेंस अधिकारियों ने बनगरडे को बांद्रा ईस्ट स्थित कार्यालय में बुलाया। वहां उन्होंने मामले से जुड़े सबूत अधिकारियों को सौंपे।
प्रेमी ने लिया यू-टर्न
लेकिन इसके दो दिन बाद ही पूरे मामले ने अप्रत्याशित मोड़ ले लिया। 26 जुलाई को गौरव पाटिल ने MPSC को पत्र लिखकर अपने पहले के आरोपों से यू-टर्न ले लिया। उसने दावा किया कि जिन प्रश्नों को पेपर लीक से जोड़कर देखा जा रहा है, वे वास्तव में एक प्रैक्टिस टेस्ट के प्रश्न थे और बनगरडे ने व्हाट्सऐप चैट को गलत समझ लिया। इसके अगले ही दिन MPSC ने गौरव पाटिल के नए बयान को आधार बनाकर प्रेस नोट जारी किया और मामले को बंद करने की दिशा में कदम बढ़ाया।
व्हिसलब्लोअर ने लड़ाई लड़ने का लिया फैसला
यहीं से व्हिसलब्लोअर ऋषिकेश बनगरडे ने अकेले इस लड़ाई को आगे बढ़ाने का फैसला किया। उनका कहना था कि उनके पास मौजूद मूल व्हाट्सऐप चैट और दूसरे दस्तावेज मामले की वास्तविकता सामने लाने के लिए पर्याप्त थे। मुख्य गवाह के पीछे हटने और आयोग के रुख से उन्हें लगा कि पेपर लीक का मामला दबाया जा सकता है। इसके बाद उन्होंने राजनीतिक स्तर पर मामले को उठाने का फैसला किया। मामला आगे बढ़ने के साथ बनगरडे ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे से भी मुलाकात की। छात्र कार्यकर्ताओं के माध्यम से यह मुद्दा कांग्रेस नेता राहुल गांधी तक भी पहुंचा। आखिरकार मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने मामले की जांच अपने हाथ में ली। जांच आगे बढ़ने पर MPSC के अधिकारियों समेत छह आरोपियों को गिरफ्तार किया गया।
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एक बैग से कैसे खुला फर्जी मार्कशीट-डिग्री का घोटाला?
यह मामला महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के दुर्गापुर थाना क्षेत्र का है। पुलिस के अनुसार, यह गिरोह बिना परीक्षा दिए लोगों को नामी विश्वविद्यालयों की फर्जी डिग्री और अन्य शैक्षणिक प्रमाणपत्र उपलब्ध कराता था। इसके लिए पांच लाख से दस लाख रुपये तक वसूले जाते थे। पुलिस ने इस मामले में कुछ दिन पहले तुकुम इलाके के रहने वाले परिमल बाबूराव गौरकर और वैभव भोलाराम सोनुले के खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी का मामला दर्ज किया था। सोनुले को पुलिस ने शिकायत दर्ज होने के दिन ही गिरफ्तार कर लिया था, जबकि मुख्य आरोपी परिमल गौरकर और उसके साथी अक्षय खोब्रागड़े को शुक्रवार को नागपुर से पकड़ा गया।
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पुलिस जांच के मुताबिक, इस पूरे रैकेट का राज उस समय खुला, जब तुकुम स्थित चिंतामणि अपार्टमेंट में रहने वाले वैभव मशिरकर के घर रखा एक कपड़े का बैग संदिग्ध लगा। बताया गया है कि आरोपी परिमल गौरकर ने इसी साल जनवरी में यह बैग अपने पड़ोसी मशिरकर के घर सुरक्षित रखने के लिए दिया था। गौरकर बीच-बीच में बैग से कुछ कागजात निकालने के लिए उनके घर आता था। लेकिन कई महीनों तक जब वह बैग लेने नहीं पहुंचा, तो मशिरकर को शक हुआ। उन्होंने बैग खोलकर देखा तो उनके होश उड़ गए। उसमें देश के कई चर्चित विश्वविद्यालयों के नाम से तैयार की गई संदिग्ध मार्कशीट और दूसरे शैक्षणिक दस्तावेज रखे हुए थे।
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मशिरकर तुरंत इन दस्तावेजों को लेकर दुर्गापुर पुलिस स्टेशन पहुंचे और पुलिस को पूरी जानकारी दी। मशिरकर ने अपने बयान में पुलिस को बताया कि गौरकर पहले भी उनसे दावा कर चुका था कि वह देश के बड़े विश्वविद्यालयों के फर्जी सर्टिफिकेट 5 से 10 लाख रुपये में बनवा सकता है। पुलिस ने जब बैग की तलाशी ली तो उसमें संत गाडगे बाबा अमरावती विश्वविद्यालय, सोलापुर विश्वविद्यालय, श्रीधर विश्वविद्यालय, पिलानी विश्वविद्यालय, गोंडवाना विश्वविद्यालय और छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर के नाम से तैयार किए गए दस्तावेज मिले। इनमें मार्कशीट, डिप्लोमा और माइग्रेशन सर्टिफिकेट शामिल थे।
पुलिस की शुरुआती जांच में इन दस्तावेजों पर लगी मुहरों और अधिकारियों के हस्ताक्षरों को संदिग्ध पाया गया। आरोप है कि गिरोह इन फर्जी दस्तावेजों को इस तरह तैयार करता था कि वे पहली नजर में असली दिखाई दें। इसके बाद इन्हें जरूरतमंद लोगों को मोटी रकम लेकर बेच दिया जाता था। अब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि आरोपियों ने अब तक कितने लोगों को फर्जी डिग्री और प्रमाणपत्र दिए हैं और इनका इस्तेमाल कहां-कहां किया गया।
जांच एजेंसियों को शक है कि फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल सरकारी और निजी नौकरियों में नियुक्ति, कॉलेजों में दाखिले और नौकरी में पदोन्नति हासिल करने के लिए किया गया हो सकता है। पुलिस आरोपियों के बैंक खातों और पिछले वित्तीय लेनदेन की भी जांच कर रही है। इसके जरिए उन एजेंटों और अन्य लोगों तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है, जो इस नेटवर्क में शामिल हो सकते हैं। पुलिस अब यह भी पता लगा रही है कि फर्जी मार्कशीट और डिग्री तैयार करने का काम कहां होता था, दस्तावेजों पर जाली मोहर और हस्ताक्षर कौन करता था और इस रैकेट का नेटवर्क क्या महाराष्ट्र के बाहर तक भी फैला हुआ था?
लड़की के पूर्व प्रेमी के यू-टर्न के बाद व्हिसलब्लोअर ने खोला मोर्चा
महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (MPSC) की क्लास-II ड्रग्स इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा में पेपर लीक का मामला एक वीडियो से शुरू होकर मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच की जांच तक पहुंच गया। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम मोड़ तब आया, जब जिस शख्स ने शुरुआत में पेपर लीक के सबूत व्हिसलब्लोअर के साथ साझा किए थे, वही बाद में अपने आरोपों से मुकर गया। मुख्य गवाह के इस यू-टर्न के बाद भी व्हिसलब्लोअर ऋषिकेश बनगरडे पाटिल पीछे नहीं हटे। जब उन्हें लगा कि मामला दबाया जा रहा है, तो उन्होंने सीधे एनसीपी (एसपी) विधायक रोहित पवार का दरवाजा खटखटाया। बनगरडे ने रोहित पवार को मूल व्हाट्सऐप चैट, कथित तौर पर लीक हुए प्रश्नों और पूरे मामले से जुड़े दस्तावेज सौंपे। इसके बाद रोहित पवार खुद बनगरडे को साथ लेकर मुंबई पुलिस कमिश्नर के पास पहुंचे और मामले की विस्तृत जांच की मांग की।
दरअसल, इस पूरे मामले की शुरुआत जुलाई में हुई। MPSC की ड्रग्स इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा की कट-ऑफ सूची जारी होने के बाद ऋषिकेश बनगरडे पाटिल ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी कर सवाल उठाया कि अभ्यर्थियों को उनके प्राप्तांक बताए बिना चयन प्रक्रिया कैसे पूरी की जा सकती है। इस वीडियो को 69 हजार से ज्यादा बार देखा गया। इसी वीडियो को देखने के बाद गौरव पाटिल नाम के एक व्यक्ति ने बनगरडे से संपर्क किया। दोनों की मुलाकात हुई तो गौरव ने उन्हें अभ्यर्थी और अपनी पूर्व प्रेमिका ऋतुजा पाटिल के साथ हुई अपनी व्हाट्सऐप चैट दिखाई।
इस चैट के आधार पर दावा किया गया कि 22 मार्च को हुई ड्रग्स इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा के करीब 80 प्रतिशत सवाल परीक्षा से दो दिन पहले ही लीक हो गए थे। इसके बाद बनगरडे और गौरव पाटिल ने 23 जुलाई को व्हाट्सऐप चैट और प्रश्नों से जुड़े दस्तावेजों का संकलन तैयार कर MPSC को ईमेल के जरिए भेजा। अगले दिन 24 जुलाई को MPSC के विजिलेंस अधिकारियों ने बनगरडे को बांद्रा ईस्ट स्थित कार्यालय में बुलाया। वहां उन्होंने मामले से जुड़े सबूत अधिकारियों को सौंपे।
प्रेमी ने लिया यू-टर्न
लेकिन इसके दो दिन बाद ही पूरे मामले ने अप्रत्याशित मोड़ ले लिया। 26 जुलाई को गौरव पाटिल ने MPSC को पत्र लिखकर अपने पहले के आरोपों से यू-टर्न ले लिया। उसने दावा किया कि जिन प्रश्नों को पेपर लीक से जोड़कर देखा जा रहा है, वे वास्तव में एक प्रैक्टिस टेस्ट के प्रश्न थे और बनगरडे ने व्हाट्सऐप चैट को गलत समझ लिया। इसके अगले ही दिन MPSC ने गौरव पाटिल के नए बयान को आधार बनाकर प्रेस नोट जारी किया और मामले को बंद करने की दिशा में कदम बढ़ाया।
व्हिसलब्लोअर ने लड़ाई लड़ने का लिया फैसला
यहीं से व्हिसलब्लोअर ऋषिकेश बनगरडे ने अकेले इस लड़ाई को आगे बढ़ाने का फैसला किया। उनका कहना था कि उनके पास मौजूद मूल व्हाट्सऐप चैट और दूसरे दस्तावेज मामले की वास्तविकता सामने लाने के लिए पर्याप्त थे। मुख्य गवाह के पीछे हटने और आयोग के रुख से उन्हें लगा कि पेपर लीक का मामला दबाया जा सकता है। इसके बाद उन्होंने राजनीतिक स्तर पर मामले को उठाने का फैसला किया। मामला आगे बढ़ने के साथ बनगरडे ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे से भी मुलाकात की। छात्र कार्यकर्ताओं के माध्यम से यह मुद्दा कांग्रेस नेता राहुल गांधी तक भी पहुंचा। आखिरकार मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने मामले की जांच अपने हाथ में ली। जांच आगे बढ़ने पर MPSC के अधिकारियों समेत छह आरोपियों को गिरफ्तार किया गया।