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कांग्रेस के चुनाव आयोग पर छह आरोप: फॉर्म-6 से एसआईआर तक उठाए सवाल; हलफनामे को बताया भ्रामक
Tue, 27 Oct 2026 05:31 PM IST
निर्मल कांत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Tue, 27 Oct 2026 05:31 PM IST
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग के हलफनामे को भ्रामक बताते हुए छह मुद्दों पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने फॉर्म-6 में बदलाव, चुनाव आयुक्तों के फैसलों, ईसीआईनेट और एसआईआर में कथित गड़बड़ियों के आरोप लगाए। पढ़िए रिपोर्ट
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जयराम रमेश
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
विस्तार
कांग्रेस ने चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उसने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल आयोग के हलफनामे को भ्रामक, छलपूर्ण और दोहरी नीयत वाला बताया। उन्होंने फॉर्म-6 में बदलाव, मुख्य निर्वाचन आयुक्त के फैसलों और एसआईआर प्रक्रिया पर छह सवाल उठाए।
1. फॉर्म-6 में गैरकानूनी बदलाव
पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने एक्स पोस्ट ने आरोप लगाया कि इस मुद्दे पर निर्वाचन आयोग ने धोखा देने और शब्दों की बाजीगरी करने की कोशिश की है। उन्होंने कहा कि आयोग ने पहले दावा किया था कि फॉर्म-6 के साथ जोड़े गए नए घोषणा-पत्र को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया था। लेकिन बाद में कोर्ट ने खुद इस दावे का खंडन कर दिया।
उन्होंने आगे कहा कि अब चुनाव आयोग दावा कर रहा है कि नया घोषणा-पत्र अलग फॉर्म है और फॉर्म-6 में कोई बदलाव नहीं किया गया। रमेश के मुताबिक, यह भी धोखा है। उन्होंने कहा कि इस अनिवार्य घोषणा-पत्र को भरे बिना ऑनलाइन फॉर्म-6 जमा नहीं किया जा सकता था।
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कांग्रेस महासचिव ने कहा कि चुनाव आयोग लगातार अपना रुख बदल रहा है। 26 सितंबर 2026 को आयोग ने कहा था कि यह घोषणा-पत्र फॉर्म-6 के साथ जोड़ा गया है। अब वह कह रहा है कि यह फॉर्म-6 का हिस्सा नहीं है। रमेश ने आरोप लगाया कि आयोग इस तरह मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के खुले उल्लंघन पर पर्दा नहीं डाल सकता।
2. मुख्य निर्वाचन आयुक्त के एकतरफा फैसले
जयराम रमेश ने कहा कि चुनाव आयोग अब यह दावा करके मुद्दे को दूसरी दिशा में मोड़ने की कोशिश कर रहा है कि एसआईआर से जुड़े प्रमुख आदेशों को तीनों चुनाव आयुक्तों ने औपचारिक मंजूरी दी थी।
उन्होंने आरोप लगाया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त के आदेशों में हो रहे गंभीर उल्लंघनों और गैरकानूनी कार्रवाइयों पर आधिकारिक रिकॉर्ड में आपत्तियां दर्ज कराई थीं। लेकिन इन आपत्तियों को नजरअंदाज कर दिया गया।
रमेश के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों को इन फैसलों की जानकारी तक नहीं दी गई थी। उन्हें इनके बारे में खबरों से पता चला। उन्होंने कहा कि यह सर्वसम्मति से फैसला लेने का मामला नहीं, बल्कि एकतरफा निर्णय लेने का मामला है।
3. ईसीआईनेट के इस्तेमाल पर सवाल
जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि मतदाता सूचियों पर नियंत्रण केंद्रीकृत करने के लिए ईसीआईनेट का इस्तेमाल किया गया। इससे वैधानिक अधिकार रखने वाले मतदाता पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) के फैसलों को दरकिनार किया गया।
ये भी पढ़ें: 'कुछ तो तमाशा होगा, अब मेरी बारी': किताब आने से पहले सोनिया गांधी का बयान, क्या कहा?
उन्होंने कहा कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस मुद्दे को आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज कराया था। रमेश के मुताबिक, लगभग हर उस राज्य से ईआरओ के फैसलों को पलटे जाने के सबूत सामने आए हैं, जहां एसआईआर हुई है। इनमें गोवा, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्य शामिल हैं।
4. चुनाव आयोग के आईटी विभाग की मनमानी
रमेश ने कहा कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कई बार आईटी विभाग के कामकाज को लेकर चिंता जताई थी। उनके अनुसार, विभाग का कामकाज अपारदर्शी है। वह अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम करता है और बिना अनुमति के फैसले लेता है।
उन्होंने बताया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने ईसीआईनेट और आईटी विभाग के कामकाज को लेकर अपनी चिंताओं के बारे में कैबिनेट सचिव को पत्र भी लिखा था।
रमेश के मुताबिक, इसके बाद आईटी विभाग में फैली अव्यवस्था को लेकर कई और खुलासे हुए हैं। लेकिन न तो विभाग के कामकाज में कोई बदलाव हुआ और न ही इन मुद्दों पर कोई कार्रवाई की गई।
5. एसआईआर प्रक्रिया विनाशकारी
कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि एसआईआर प्रक्रिया में कई गैरकानूनी कार्रवाइयां हुई हैं और नियमों का उल्लंघन किया गया है। उन्होंने कहा कि लगभग हर राज्य में बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाने के लिए फॉर्म-7 का दुरुपयोग किया गया है।
6. खुलासों से इनकार नहीं
रमेश ने कहा कि चुनाव आयोग के हलफनामे में मीडिया के बड़े हिस्से में लगातार सामने आ रहे खुलासों की सच्चाई से इनकार नहीं किया गया है। उनके मुताबिक, यह मुख्य निर्वाचन आयुक्त की ओर से की गई गंभीर गड़बड़ियों और कानूनी उल्लंघनों की एक और पुष्टि है। उन्होंने आगे लिखा, झूठ बोलने की शुरुआत करते ही इंसान अपने ही बुने जाल में उलझता चला जाता है। और जब लंबे समय तक यही सिलसिला चलता रहता है, तो आखिरकार उसका झूठ किसी न किसी तरीके से सामने आने लगता है।
कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति न देने का भी आरोप
कांग्रेस ने मंगलवार को यह भी दावा किया कि उसे एक कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति नहीं दी गई। इस कार्यक्रम में विपक्षी गठबंधन इंडिया के दलों ने सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ 'जनता की अदालत में महाभियोग' चलाने की योजना बनाई थी। यह कार्यक्रम यहां एक नवंबर को होने वाली रैली से पहले होना था। कांग्रेस ने सरकार पर आम लोगों की आवाज को 'दबाने' की कोशिश करने का आरोप लगाया। पार्टी ने कहा कि सरकार पहले ही चुनाव व्यवस्था को 'तबाह' कर चुकी है।
कांग्रेस महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल ने दावा किया कि सरकार के नियंत्रण वाले अशोक होटल ने शुरुआत में कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति दी थी। लेकिन बाद में पुलिस के दखल के बाद अनुमति देने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने 25 अक्तूबर से 3 नवंबर तक के लिए रामलीला मैदान बुक किया है। इसलिए कार्यक्रम को इसी जगह पर आयोजित करने का फैसला किया गया है।
वेणुगोपाल ने कहा कि इंडिया ब्लॉक के 21 दलों ने 30 अक्तूबर को एक कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बनाई थी। इसका मकसद एक नवंबर को रामलीला मैदान में होने वाली रैली से पहले सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ 'जनता की अदालत में महाभियोग' चलाना था। यह रैली 'वोट चोरी' के आरोप को लेकर आयोजित की जा रही है।
पुलिस पर क्या आरोप लगाया?
वेणुगोपाल ने कहा, परसों हमारे लोग यहां कार्यक्रम के लिए जरूरी ढांचा तैयार करने आए थे। पुलिस ने उन्हें रोक दिया। हमें नहीं पता कि इसकी वजह क्या है।
वेणुगोपाल दिल्ली कांग्रेस के नेताओं के साथ रामलीला मैदान पहुंचे थे। वे एक नवंबर की रैली की तैयारियों का जायजा लेने आए थे। उन्होंने आरोप लगाया, इसका मतलब है कि यह दिल्ली पुलिस का फैसला नहीं है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह का फैसला है। वे अपने चहेते ज्ञानेश कुमार को बचा रहे हैं।
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1. फॉर्म-6 में गैरकानूनी बदलाव
पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने एक्स पोस्ट ने आरोप लगाया कि इस मुद्दे पर निर्वाचन आयोग ने धोखा देने और शब्दों की बाजीगरी करने की कोशिश की है। उन्होंने कहा कि आयोग ने पहले दावा किया था कि फॉर्म-6 के साथ जोड़े गए नए घोषणा-पत्र को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया था। लेकिन बाद में कोर्ट ने खुद इस दावे का खंडन कर दिया।
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उन्होंने आगे कहा कि अब चुनाव आयोग दावा कर रहा है कि नया घोषणा-पत्र अलग फॉर्म है और फॉर्म-6 में कोई बदलाव नहीं किया गया। रमेश के मुताबिक, यह भी धोखा है। उन्होंने कहा कि इस अनिवार्य घोषणा-पत्र को भरे बिना ऑनलाइन फॉर्म-6 जमा नहीं किया जा सकता था।
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कांग्रेस महासचिव ने कहा कि चुनाव आयोग लगातार अपना रुख बदल रहा है। 26 सितंबर 2026 को आयोग ने कहा था कि यह घोषणा-पत्र फॉर्म-6 के साथ जोड़ा गया है। अब वह कह रहा है कि यह फॉर्म-6 का हिस्सा नहीं है। रमेश ने आरोप लगाया कि आयोग इस तरह मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के खुले उल्लंघन पर पर्दा नहीं डाल सकता।
2. मुख्य निर्वाचन आयुक्त के एकतरफा फैसले
जयराम रमेश ने कहा कि चुनाव आयोग अब यह दावा करके मुद्दे को दूसरी दिशा में मोड़ने की कोशिश कर रहा है कि एसआईआर से जुड़े प्रमुख आदेशों को तीनों चुनाव आयुक्तों ने औपचारिक मंजूरी दी थी।
उन्होंने आरोप लगाया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त के आदेशों में हो रहे गंभीर उल्लंघनों और गैरकानूनी कार्रवाइयों पर आधिकारिक रिकॉर्ड में आपत्तियां दर्ज कराई थीं। लेकिन इन आपत्तियों को नजरअंदाज कर दिया गया।
रमेश के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों को इन फैसलों की जानकारी तक नहीं दी गई थी। उन्हें इनके बारे में खबरों से पता चला। उन्होंने कहा कि यह सर्वसम्मति से फैसला लेने का मामला नहीं, बल्कि एकतरफा निर्णय लेने का मामला है।
3. ईसीआईनेट के इस्तेमाल पर सवाल
जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि मतदाता सूचियों पर नियंत्रण केंद्रीकृत करने के लिए ईसीआईनेट का इस्तेमाल किया गया। इससे वैधानिक अधिकार रखने वाले मतदाता पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) के फैसलों को दरकिनार किया गया।
ये भी पढ़ें: 'कुछ तो तमाशा होगा, अब मेरी बारी': किताब आने से पहले सोनिया गांधी का बयान, क्या कहा?
उन्होंने कहा कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस मुद्दे को आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज कराया था। रमेश के मुताबिक, लगभग हर उस राज्य से ईआरओ के फैसलों को पलटे जाने के सबूत सामने आए हैं, जहां एसआईआर हुई है। इनमें गोवा, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्य शामिल हैं।
4. चुनाव आयोग के आईटी विभाग की मनमानी
रमेश ने कहा कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कई बार आईटी विभाग के कामकाज को लेकर चिंता जताई थी। उनके अनुसार, विभाग का कामकाज अपारदर्शी है। वह अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम करता है और बिना अनुमति के फैसले लेता है।
उन्होंने बताया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने ईसीआईनेट और आईटी विभाग के कामकाज को लेकर अपनी चिंताओं के बारे में कैबिनेट सचिव को पत्र भी लिखा था।
रमेश के मुताबिक, इसके बाद आईटी विभाग में फैली अव्यवस्था को लेकर कई और खुलासे हुए हैं। लेकिन न तो विभाग के कामकाज में कोई बदलाव हुआ और न ही इन मुद्दों पर कोई कार्रवाई की गई।
5. एसआईआर प्रक्रिया विनाशकारी
कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि एसआईआर प्रक्रिया में कई गैरकानूनी कार्रवाइयां हुई हैं और नियमों का उल्लंघन किया गया है। उन्होंने कहा कि लगभग हर राज्य में बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाने के लिए फॉर्म-7 का दुरुपयोग किया गया है।
6. खुलासों से इनकार नहीं
रमेश ने कहा कि चुनाव आयोग के हलफनामे में मीडिया के बड़े हिस्से में लगातार सामने आ रहे खुलासों की सच्चाई से इनकार नहीं किया गया है। उनके मुताबिक, यह मुख्य निर्वाचन आयुक्त की ओर से की गई गंभीर गड़बड़ियों और कानूनी उल्लंघनों की एक और पुष्टि है। उन्होंने आगे लिखा, झूठ बोलने की शुरुआत करते ही इंसान अपने ही बुने जाल में उलझता चला जाता है। और जब लंबे समय तक यही सिलसिला चलता रहता है, तो आखिरकार उसका झूठ किसी न किसी तरीके से सामने आने लगता है।
कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति न देने का भी आरोप
कांग्रेस ने मंगलवार को यह भी दावा किया कि उसे एक कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति नहीं दी गई। इस कार्यक्रम में विपक्षी गठबंधन इंडिया के दलों ने सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ 'जनता की अदालत में महाभियोग' चलाने की योजना बनाई थी। यह कार्यक्रम यहां एक नवंबर को होने वाली रैली से पहले होना था। कांग्रेस ने सरकार पर आम लोगों की आवाज को 'दबाने' की कोशिश करने का आरोप लगाया। पार्टी ने कहा कि सरकार पहले ही चुनाव व्यवस्था को 'तबाह' कर चुकी है।
कांग्रेस महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल ने दावा किया कि सरकार के नियंत्रण वाले अशोक होटल ने शुरुआत में कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति दी थी। लेकिन बाद में पुलिस के दखल के बाद अनुमति देने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने 25 अक्तूबर से 3 नवंबर तक के लिए रामलीला मैदान बुक किया है। इसलिए कार्यक्रम को इसी जगह पर आयोजित करने का फैसला किया गया है।
वेणुगोपाल ने कहा कि इंडिया ब्लॉक के 21 दलों ने 30 अक्तूबर को एक कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बनाई थी। इसका मकसद एक नवंबर को रामलीला मैदान में होने वाली रैली से पहले सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ 'जनता की अदालत में महाभियोग' चलाना था। यह रैली 'वोट चोरी' के आरोप को लेकर आयोजित की जा रही है।
पुलिस पर क्या आरोप लगाया?
वेणुगोपाल ने कहा, परसों हमारे लोग यहां कार्यक्रम के लिए जरूरी ढांचा तैयार करने आए थे। पुलिस ने उन्हें रोक दिया। हमें नहीं पता कि इसकी वजह क्या है।
वेणुगोपाल दिल्ली कांग्रेस के नेताओं के साथ रामलीला मैदान पहुंचे थे। वे एक नवंबर की रैली की तैयारियों का जायजा लेने आए थे। उन्होंने आरोप लगाया, इसका मतलब है कि यह दिल्ली पुलिस का फैसला नहीं है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह का फैसला है। वे अपने चहेते ज्ञानेश कुमार को बचा रहे हैं।