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एक्सप्लेनर: कब-कैसे विरोध की आवाज का केंद्र बना जंतर-मंतर, अब क्यों छिना प्रदर्शन स्थल का दर्जा; क्या रही वजह?

Mon, 12 Oct 2026 06:36 PM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Mon, 12 Oct 2026 06:36 PM IST
सार
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जंतर-मंतर दशकों तक दिल्ली में विरोध की आवाज बना रहा, लेकिन अब इसे निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया गया है। आखिर दशकों तक जंतर-मंतर कैसे आंदोलनों का केंद्र बना और अब प्रदर्शन कहां होंगे? जानिए, इसके इतिहास, बड़े आंदोलनों और प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार से जुड़े जरूरी नियम।

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Explainer: Jantar Mantar denotified as Protest Site; How Did It Become Delhi’s Hub for Dissent?
जंतर-मंतर पर अब नहीं होंगे प्रदर्शन - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने का आदेश जारी कर दिया है। पुलिस की ओर से जारी प्रदर्शन स्थलों नई सूची में अब रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी मैदान को रखा गया है।

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नए फैसले के बीच जानिए जंतर-मंतर विरोध प्रदर्शनों का केंद्र कैसे बना? यहां कौन-कौन से बड़े आंदोलन हुए और प्रदर्शन के सांविधानिक अधिकार से जुड़े नियम क्या हैं? दिल्ली में प्रदर्शन करने से पहले कौन-कौन सी अनुमति लेना जरूरी है?

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जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से क्यों हटाया गया?

दिल्ली पुलिस के आधिकारिक नोटिस के मुताबिक, गृह मंत्रालय ने विरोध प्रदर्शन के लिए वैकल्पिक स्थलों की पहचान करने के लिए एक समिति गठित की थी। समिति की सिफारिशों के आधार पर जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने का फैसला लिया गया। 

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दिल्ली पुलिस के आयुक्त अनुराग कुमार ने कहा है कि तीनों नए स्थलों पर प्रदर्शन आयोजित करने के लिए विस्तृत और संशोधित मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) अलग से जारी की जाएगी। इसमें आयोजन की प्रक्रिया और संबंधित नियमों की जानकारी दी जाएगी।

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब 10 अक्तूबर को सीजेपी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और वोटर लिस्ट में कथित अनियमितताओं के विरोध में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का आह्वान किया गया था। दिल्ली पुलिस ने इस प्रदर्शन को रोकने के लिए व्यापक सुरक्षा इंतजाम किए थे। लगभग 45 मेट्रो स्टेशन, मुख्य रेलवे स्टेशन और मध्य दिल्ली में इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गईं। पुलिस ने कई प्रदर्शनकारियों और नेताओं को हिरासत में लिया।

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प्रदर्शन के नए स्थल - फोटो : Amar Ujala

क्या है जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन का इतिहास?

दिल्ली देश की राजधानी होने के कारण लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों का केंद्र रही है। ब्रिटिश शासन के खिलाफ हड़ताल और सत्याग्रह से लेकर आजादी के बाद किसान आंदोलनों, मंडल आयोग के विरोध और जन-लोकपाल आंदोलन तक यहां कई बड़े प्रदर्शन हुए।

1980 के दशक तक इंडिया गेट के पास बोट क्लब के लॉन में धरने और प्रदर्शन आयोजित किए जाते थे। 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में हजारों किसानों ने दिल्ली के बोट क्लब पर आंदोलन किया। किसानों ने गन्ने की बेहतर कीमत, बिजली-पानी के बिलों में राहत और बकाया भुगतान जैसी मांगें उठाईं। इस बड़े आंदोलन के बाद दिल्ली के इस इलाके में भीड़ और सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ीं। 1993 में बोट क्लब पर प्रदर्शनों पर पाबंदियां लगा दी गईं, जिसके बाद जंतर-मंतर विरोध प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र बन गया। 1993 से हाल के वर्षों तक जंतर-मंतर ही वह प्रमुख स्थान था, जहां प्रदर्शन की अनुमति मिलती थी। 

जंतर-मंतर का निर्माण वर्ष 1731 में जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने कराया था। उस समय मुगल बादशाह मोहम्मद शाह का शासन था। यह भारत में बनाई गई उनकी पांच प्रमुख वेधशालाओं में से एक है। यहां स्थापित सम्राट यंत्र, जय प्रकाश यंत्र, राम यंत्र और मिश्र यंत्र जैसे विशाल उपकरणों की मदद से समय, ग्रहों की स्थिति और खगोलीय घटनाओं का सटीक अध्ययन किया जाता था। समय के साथ दिल्ली का विस्तार हुआ और संसद भवन, केंद्रीय मंत्रालयों व कनॉट प्लेस के नजदीक होने के कारण जंतर-मंतर का महत्व बढ़ने लगा। 

जंतर-मंतर संसद के नजदीक होने की वजह से यह प्रदर्शनकारियों के लिए अहम था। यहां लोगों को अपनी मांगें उठाने से सरकार और मीडिया का ध्यान आकर्षित करने का अवसर मिलता था। हालांकि, सीमित जगह और प्रवेश-निकास के रास्तों के कारण बड़ी भीड़ को संभालना चुनौतीपूर्ण था।

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क्या है इतिहास? - फोटो : Amar Ujala

2017 में एनजीटी ने यहां प्रदर्शन रोकने का निर्देश क्यों दिया?

अक्तूबर 2017 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शनों को रोकने और प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया था। यह मामला स्थानीय निवासियों की शिकायतों के बाद सामने आया था। निवासियों का कहना था कि लगातार धरने-प्रदर्शनों के कारण उन्हें ध्वनि प्रदूषण और गंदगी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

एनजीटी ने अपने आदेश में तीन प्रमुख बातें कहीं। पहली- जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल घोषित करने वाला कोई आधिकारिक कार्यकारी आदेश नहीं था। दूसरा- दिल्ली के मास्टर प्लान में इस क्षेत्र को आवासीय इलाके के रूप में चिह्नित किया गया था। तीसरा- यहां होने वाले प्रदर्शनों से ध्वनि प्रदूषण की समस्या पैदा हो रही थी। ट्रिब्यूनल ने प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर से करीब चार किलोमीटर दूर रामलीला मैदान में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया।

इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। जुलाई 2018 में मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर और बोट क्लब क्षेत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय उन्हें नियमों के तहत नियंत्रित करने पर जोर दिया। अदालत ने पुलिस और संबंधित एजेंसियों को दिशा-निर्देश बनाने को कहा, ताकि प्रदर्शन के अधिकार और स्थानीय निवासियों के अधिकारों के बीच संतुलन बना रहे।

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बड़े प्रदर्शन - फोटो : Amar Ujala

बीते वर्षों में जंतर-मंतर पर कौन-कौन से बड़े प्रदर्शन हुए?

1. अन्ना हजारे का जन लोकपाल आंदोलन (2011)
5 अप्रैल 2011 को सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ और जन-लोकपाल विधेयक की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल शुरू की। आंदोलन को देशभर में समर्थन मिला। प्रशांत भूषण और अरविंद केजरीवाल सहित कई कार्यकर्ता इससे जुड़े थे। आगे चलकर इस आंदोलन से आम आदमी पार्टी के गठन का रास्ता भी बना।

2. तमिलनाडु के किसानों का धरना (2017)
मार्च और अप्रैल 2017 में तमिलनाडु के कर्ज में डूबे किसानों ने जंतर-मंतर पर करीब 40 दिनों तक प्रदर्शन किया। उन्होंने 40 हजार करोड़ रुपये के सूखा राहत पैकेज, कर्ज माफी और कावेरी प्रबंधन बोर्ड के गठन की मांग उठाई। अपनी स्थिति की ओर ध्यान खींचने के लिए किसानों ने खोपड़ियां लेकर और मुंह में मरे हुए चूहे रखकर प्रदर्शन किया।

3. नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन (2019)
19 दिसंबर 2019 को नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध में जंतर-मंतर पर बड़ी संख्या में लोग जुटे। यह प्रदर्शन देश के अलग-अलग हिस्सों में कानून के खिलाफ हुए आंदोलनों का हिस्सा था।

4. पहलवानों का आंदोलन (2023)
2023 में भारतीय कुश्ती महासंघ के तत्कालीन अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ जंतर-मंतर पर धरना दिया गया। ओलंपिक पदक विजेता विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और बजरंग पूनिया सहित कई पहलवानों ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की। पहलवानों ने कई महीनों तक धरना दिया। इस आंदोलन ने देशभर में ध्यान खींचा और महिला खिलाड़ियों की सुरक्षा और खेल संगठनों की जवाबदेही से जुड़े सवाल उठाए।

5. जुलाई 2026 में सीजेपी का प्रदर्शन
जुलाई 2026 में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में नीट-यूजी पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था में गड़बड़ियों के खिलाफ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन हुआ। प्रदर्शनकारियों ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और परीक्षा सुधारों की मांग की।

20 जुलाई को संसद की ओर मार्च के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई। इसके बाद सरकार और सीजेपी प्रतिनिधियों के बीच बातचीत हुई। 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया। 

क्या विरोध प्रदर्शन करना मौलिक अधिकार है?

भारत में विरोध प्रदर्शन करना संविधान से मिला अधिकार है। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। वहीं अनुच्छेद 19(1)(बी) नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से और बिना हथियार के एकत्र होने का अधिकार देता है। इसी आधार पर लोग सरकार के फैसलों के खिलाफ प्रदर्शन या धरना दे सकते हैं।

हालांकि, यह अधिकार पूर्ण नहीं है। अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के अनुसार, अगर सार्वजनिक व्यवस्था, देश की सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता या शांति व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका हो तो सरकार इन अधिकारों पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगा सकती है। यानी संविधान शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति देता है, लेकिन हिंसा, तोड़फोड़ या कानून-व्यवस्था बिगाड़ने की नहीं।

प्रदर्शन के लिए अनुमति क्यों जरूरी होती है?

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 के तहत जिला मजिस्ट्रेट और संबंधित कार्यकारी मजिस्ट्रेट को कुछ विशेष अधिकार दिए गए हैं। प्रदर्शन की अनुमति देने से पहले यह देखा जाता है कि उससे सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका तो नहीं है।

अनुमति मिलने के बाद भी संबंधित अधिकारी सभा पर शर्तें लगा सकते हैं। वे भीड़ जुटने पर अस्थायी रोक लगा सकते हैं और प्रदर्शन के समय, मार्ग और स्वरूप को नियंत्रित कर सकते हैं।

अगर प्रशासन को लगता है कि प्रदर्शन से हिंसा हो सकती है, दंगा भड़क सकता है या सार्वजनिक शांति भंग हो सकती है, तो वह लागू कानूनी प्रावधानों के तहत प्रतिबंध लगा सकता है। हालात बिगड़ने की आशंका से जुड़ी जानकारी होने पर प्रशासन अनुमति देने से भी इनकार कर सकता है।

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प्रदर्शन के नियम - फोटो : Amar Ujala

दिल्ली में प्रदर्शन की अनुमति के क्या नियम हैं?

प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 23 जुलाई 2018 को मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ एवं अन्य मामले में फैसला सुनाया था। अदालत ने माना कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हिस्सा है, लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था, यातायात और सुरक्षा बनाए रखने के लिए इस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। इस मामले में अदालत ने दिल्ली में सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शन के नियमन और इसके लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाने से जुड़े पहलुओं पर विचार किया था।

इसी फैसले के का हवाला देते हुए दिल्ली पुलिस ने 7 अक्तूबर 2026 को जंतर-मंतर पर सभा, धरना या विरोध प्रदर्शन आयोजित करने के लिए सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति अनिवार्य होने की बात कही। 

दिल्ली पुलिस के संबंधित स्टैंडिंग ऑर्डर के अनुसार, प्रदर्शन की अनुमति के लिए प्रस्तावित कार्यक्रम से कम से कम 10 दिन पहले आवेदन नई दिल्ली जिले के पुलिस उपायुक्त (DCP) के पास जमा करना होता है। 

वहीं, सेंट्रल विस्टा के निर्धारित क्षेत्रों में प्रदर्शन पर प्रतिबंध है। इनमें इंडिया गेट, सी-हेक्सागन, मान सिंह रोड, जनपथ, राजपथ और आसपास के लॉन जैसे इलाके शामिल हैं।

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