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निर्यात के नियमों में ढील: कैंसर-डायबिटीज समेत कई बीमारियों की दवाओं को भेजना होगा आसान, कंपनियों को राहत
Fri, 16 Oct 2026 04:07 PM IST
पवन पांडेय
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: पवन पांडेय
Updated Fri, 16 Oct 2026 04:07 PM IST
केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) ने कैंसर, डायबिटीज समेत कई बीमारियों की दवाओं के निर्यात के नियम आसान किए हैं। नई व्यवस्था के तहत पहले से मंजूर कुछ दवाओं को विदेश में अलग ब्रांड नाम से बेचने के लिए नया अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) नहीं लेना होगा। इससे दवा कंपनियों को राहत मिलेगी।
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निर्यात के नियमों में ढील
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
कैंसर, डायबिटीज और दूसरी गंभीर बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कई आधुनिक दवाएं तैयार करने में जैव तकनीक की मदद ली जाती है। ऐसी दवाओं को बनाने की प्रक्रिया में वैज्ञानिक किसी जीव की कोशिकाओं में खास आनुवंशिक निर्देश डालकर उनसे जरूरी प्रोटीन तैयार करवाते हैं। इसी तकनीक से बनने वाली दवाओं को आर-डीएनए दवाएं कहा जाता है। अब ऐसी दवाओं को विदेश भेजने की प्रक्रिया कुछ दवा कंपनियों के लिए आसान हो सकती है।
केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) ने साफ किया है कि अगर किसी दवा को भारत में पहले ही मंजूरी मिल चुकी है और कंपनी उसे विदेश में सिर्फ दूसरे ब्रांड नाम से बेचना चाहती है, तो कुछ शर्तें पूरी होने पर अलग से निर्यात अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) लेने की जरूरत नहीं होगी। इससे कंपनियों को दोबारा कागजी प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ेगा और निर्यात की तैयारी में लगने वाला समय और प्रशासनिक काम कम हो सकता है।
यह भी पढ़ें- सीडीएससीओ ने जारी की गाइडलाइन: खून-पेशाब की जांच करने वाली किटों के नियम होंगे सख्त, कंपनियों पर कसेगा शिकंजा
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कब नहीं लेना होगा अलग एनओसी?
सीडीएससीओ के मुताबिक, यह छूट हर दवा या हर निर्यात पर लागू नहीं होगी। इसका लाभ तभी मिलेगा, जब कंपनी के पास संबंधित दवा के लिए पहले से वैध मंजूरी हो और विदेश भेजे जाने वाले उत्पाद में कोई वास्तविक बदलाव न किया गया हो। दवा की संरचना, गुणवत्ता के मानक, ताकत, इस्तेमाल का तरीका, पैकिंग, निर्माण की जगह और बनाने की प्रक्रिया पहले से मंजूर उत्पाद जैसी ही होनी चाहिए।
ऐसी स्थिति में अगर अंतर सिर्फ विदेश में बेचे जाने वाले ब्रांड नाम का है, तो अलग निर्यात एनओसी की जरूरत नहीं होगी। कंपनी को इसके लिए ऑनलाइन पोर्टल के जरिये राज्य औषधि लाइसेंसिंग प्राधिकरण में आवेदन करना होगा। वहीं, जिन मामलों में ये शर्तें पूरी नहीं होंगी, उनमें पहले की तरह सीडीएससीओ से मात्रा के हिसाब से निर्यात एनओसी लेना जरूरी रहेगा।
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केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) ने साफ किया है कि अगर किसी दवा को भारत में पहले ही मंजूरी मिल चुकी है और कंपनी उसे विदेश में सिर्फ दूसरे ब्रांड नाम से बेचना चाहती है, तो कुछ शर्तें पूरी होने पर अलग से निर्यात अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) लेने की जरूरत नहीं होगी। इससे कंपनियों को दोबारा कागजी प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ेगा और निर्यात की तैयारी में लगने वाला समय और प्रशासनिक काम कम हो सकता है।
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कब नहीं लेना होगा अलग एनओसी?
सीडीएससीओ के मुताबिक, यह छूट हर दवा या हर निर्यात पर लागू नहीं होगी। इसका लाभ तभी मिलेगा, जब कंपनी के पास संबंधित दवा के लिए पहले से वैध मंजूरी हो और विदेश भेजे जाने वाले उत्पाद में कोई वास्तविक बदलाव न किया गया हो। दवा की संरचना, गुणवत्ता के मानक, ताकत, इस्तेमाल का तरीका, पैकिंग, निर्माण की जगह और बनाने की प्रक्रिया पहले से मंजूर उत्पाद जैसी ही होनी चाहिए।
ऐसी स्थिति में अगर अंतर सिर्फ विदेश में बेचे जाने वाले ब्रांड नाम का है, तो अलग निर्यात एनओसी की जरूरत नहीं होगी। कंपनी को इसके लिए ऑनलाइन पोर्टल के जरिये राज्य औषधि लाइसेंसिंग प्राधिकरण में आवेदन करना होगा। वहीं, जिन मामलों में ये शर्तें पूरी नहीं होंगी, उनमें पहले की तरह सीडीएससीओ से मात्रा के हिसाब से निर्यात एनओसी लेना जरूरी रहेगा।