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सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस में मोड़: 22 आरोपियों की रिहाई को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, क्या है पूरा मामला?
Fri, 21 Aug 2026 08:35 PM IST
राकेश कुमार
पीटीआई, नई दिल्ली।
पीटीआई, नई दिल्ली।
Published by: राकेश कुमार
Updated Fri, 21 Aug 2026 08:35 PM IST
करीब दो दशक पुराने सोहराबुद्दीन शेख कथित फर्जी एनकाउंटर मामले में 22 आरोपियों की रिहाई के बाद कानूनी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। हाईकोर्ट के फैसले को अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। सवाल यह है कि क्या सर्वोच्च अदालत इस मामले में फिर से सुनवाई का रास्ता खोलेगी? क्या है पूरा मामला? जानिए...
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सोहराबुद्दीन केस
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर केस में नया कानूनी मोड़ आया है। सोहराबुद्दीन के छोटे भाई नयाबुद्दीन शेख ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें 22 आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखा गया था।
बरी किए गए 22 आरोपियों में गुजरात और राजस्थान पुलिस के 21 जूनियर स्तर के अधिकारी शामिल हैं। एक अन्य आरोपी गुजरात के उस फार्महाउस का मालिक है, जहां सोहराबुद्दीन और उनकी पत्नी कौसर बी को कथित तौर पर गैरकानूनी तरीके से रखा गया था। बॉम्बे हाईकोर्ट ने सात मई को इस मामले में फैसला सुनाया था। उच्च अदालत ने कहा था कि निचली अदालत के फैसले में दखल देने का कोई आधार नहीं है। हाईकोर्ट के अनुसार, अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने में सफल नहीं रहा।
सबूतों की कड़ी में कई कमजोरियां: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि अभियोजन का मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है। इन परिस्थितियों को जोड़ने वाली कड़ी में कई कमजोरियां हैं। उच्च अदालत ने यह भी कहा था कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि सोहराबुद्दीन शेख और उनकी पत्नी कौसर बी का गुजरात और राजस्थान पुलिस ने अपहरण किया था। हाईकोर्ट के अनुसार, कथित फर्जी मुठभेड़ के पीछे कोई मकसद भी साबित नहीं हो सका।
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सोहराबुद्दीन के भाइयों रुबाबुद्दीन और नयाबुद्दीन ने दिसंबर 2018 के विशेष सीबीआई अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। मुंबई की विशेष सीबीआई अदालत ने दिसंबर 2018 में सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। दोनों भाइयों ने अप्रैल 2019 में हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। लेकिन सात मई को हाईकोर्ट ने उनकी अपील खारिज कर दी।
92 गवाहों के मुकरने पर भी हाईकोर्ट ने नहीं माना ट्रायल में गड़बड़ी
हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि केवल इस आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि मुकदमे की सुनवाई ठीक तरीके से नहीं हुई, क्योंकि अभियोजन पक्ष के 92 गवाह अपने पहले के बयान से मुकर गए थे।
विशेष सीबीआई अदालत ने आरोपियों को बरी करते समय कहा था कि अभियोजन पक्ष ऐसा ठोस और भरोसेमंद मामला पेश नहीं कर सका, जिससे तीनों की हत्या के लिए किसी साजिश की बात साबित हो सके।
उच्च अदालत ने यह भी कहा था कि अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि जिन आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चल रहा था, उनकी इस कथित साजिश में कोई भूमिका थी।
इस मामले में जांच करने वाली एजेंसी सीबीआई ने भी पिछले साल हाईकोर्ट को बताया था कि उसने आरोपियों को बरी करने के फैसले को स्वीकार कर लिया है। सीबीआई ने कहा था कि वह इस फैसले के खिलाफ अपील नहीं करेगी।
2005 में सोहराबुद्दीन और कौसर बी की मौत, 2006 में मारे गए तुलसीराम
मामला नवंबर 2005 का है। सोहराबुद्दीन शेख, उनकी पत्नी कौसर बी और उनके सहयोगी तुलसीराम प्रजापति हैदराबाद से महाराष्ट्र के सांगली जा रहे थे। तीनों बस से यात्रा कर रहे थे। आरोप है कि 22 और 23 नवंबर 2005 की रात पुलिस की एक टीम ने तीनों को हिरासत में ले लिया था। जांच एजेंसी के अनुसार, सोहराबुद्दीन और कौसर बी को एक वाहन में ले जाया गया, जबकि तुलसीराम प्रजापति को दूसरे वाहन में रखा गया।
सीबीआई के मुताबिक, 26 नवंबर 2005 को गुजरात और राजस्थान पुलिस की संयुक्त टीम ने अहमदाबाद के पास कथित मुठभेड़ में सोहराबुद्दीन शेख को मार दिया। जांच एजेंसी के अनुसार, तीन दिन बाद कौसर बी की भी हत्या कर दी गई।
यह भी पढ़ें: मुंबई में FDA का छापा: मैकडोनाल्ड्स और रेडियो क्लब पर गिरी गाज, लाइसेंस निलंबित; अब सुरक्षित है बाहर का खाना?
तुलसीराम प्रजापति का क्या मामला?
तुलसीराम प्रजापति को इस मामले का अहम गवाह माना जाता था। वह बाद में उदयपुर की केंद्रीय जेल में बंद थे। 27 दिसंबर 2006 को गुजरात-राजस्थान सीमा पर एक कथित मुठभेड़ में उनकी भी मौत हो गई। यह मामला काफी चर्चित रहा। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इसकी जांच सीबीआई को सौंप दी थी। मामले की सुनवाई भी गुजरात से मुंबई स्थानांतरित कर दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में तुलसीराम प्रजापति के कथित फर्जी मुठभेड़ मामले को भी सोहराबुद्दीन शेख मामले के साथ जोड़ दिया था। सोहराबुद्दीन के भाइयों ने हाईकोर्ट में दलील दी थी कि मुकदमे की सुनवाई में खामियां थीं। उन्होंने ऐसे मामलों का भी जिक्र किया था, जिनमें कुछ गवाहों ने बाद में दावा किया कि विशेष अदालत ने उनकी गवाही सही तरीके से दर्ज नहीं की। अब नयाबुद्दीन शेख ने हाईकोर्ट के सात मई के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। ऐसे में अब इस चर्चित मामले में सर्वोच्च अदालत के अगले कदम पर नजर रहेगी।
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बरी किए गए 22 आरोपियों में गुजरात और राजस्थान पुलिस के 21 जूनियर स्तर के अधिकारी शामिल हैं। एक अन्य आरोपी गुजरात के उस फार्महाउस का मालिक है, जहां सोहराबुद्दीन और उनकी पत्नी कौसर बी को कथित तौर पर गैरकानूनी तरीके से रखा गया था। बॉम्बे हाईकोर्ट ने सात मई को इस मामले में फैसला सुनाया था। उच्च अदालत ने कहा था कि निचली अदालत के फैसले में दखल देने का कोई आधार नहीं है। हाईकोर्ट के अनुसार, अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने में सफल नहीं रहा।
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सबूतों की कड़ी में कई कमजोरियां: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि अभियोजन का मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है। इन परिस्थितियों को जोड़ने वाली कड़ी में कई कमजोरियां हैं। उच्च अदालत ने यह भी कहा था कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि सोहराबुद्दीन शेख और उनकी पत्नी कौसर बी का गुजरात और राजस्थान पुलिस ने अपहरण किया था। हाईकोर्ट के अनुसार, कथित फर्जी मुठभेड़ के पीछे कोई मकसद भी साबित नहीं हो सका।
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सोहराबुद्दीन के भाइयों रुबाबुद्दीन और नयाबुद्दीन ने दिसंबर 2018 के विशेष सीबीआई अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। मुंबई की विशेष सीबीआई अदालत ने दिसंबर 2018 में सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। दोनों भाइयों ने अप्रैल 2019 में हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। लेकिन सात मई को हाईकोर्ट ने उनकी अपील खारिज कर दी।
92 गवाहों के मुकरने पर भी हाईकोर्ट ने नहीं माना ट्रायल में गड़बड़ी
हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि केवल इस आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि मुकदमे की सुनवाई ठीक तरीके से नहीं हुई, क्योंकि अभियोजन पक्ष के 92 गवाह अपने पहले के बयान से मुकर गए थे।
विशेष सीबीआई अदालत ने आरोपियों को बरी करते समय कहा था कि अभियोजन पक्ष ऐसा ठोस और भरोसेमंद मामला पेश नहीं कर सका, जिससे तीनों की हत्या के लिए किसी साजिश की बात साबित हो सके।
उच्च अदालत ने यह भी कहा था कि अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि जिन आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चल रहा था, उनकी इस कथित साजिश में कोई भूमिका थी।
इस मामले में जांच करने वाली एजेंसी सीबीआई ने भी पिछले साल हाईकोर्ट को बताया था कि उसने आरोपियों को बरी करने के फैसले को स्वीकार कर लिया है। सीबीआई ने कहा था कि वह इस फैसले के खिलाफ अपील नहीं करेगी।
2005 में सोहराबुद्दीन और कौसर बी की मौत, 2006 में मारे गए तुलसीराम
मामला नवंबर 2005 का है। सोहराबुद्दीन शेख, उनकी पत्नी कौसर बी और उनके सहयोगी तुलसीराम प्रजापति हैदराबाद से महाराष्ट्र के सांगली जा रहे थे। तीनों बस से यात्रा कर रहे थे। आरोप है कि 22 और 23 नवंबर 2005 की रात पुलिस की एक टीम ने तीनों को हिरासत में ले लिया था। जांच एजेंसी के अनुसार, सोहराबुद्दीन और कौसर बी को एक वाहन में ले जाया गया, जबकि तुलसीराम प्रजापति को दूसरे वाहन में रखा गया।
सीबीआई के मुताबिक, 26 नवंबर 2005 को गुजरात और राजस्थान पुलिस की संयुक्त टीम ने अहमदाबाद के पास कथित मुठभेड़ में सोहराबुद्दीन शेख को मार दिया। जांच एजेंसी के अनुसार, तीन दिन बाद कौसर बी की भी हत्या कर दी गई।
यह भी पढ़ें: मुंबई में FDA का छापा: मैकडोनाल्ड्स और रेडियो क्लब पर गिरी गाज, लाइसेंस निलंबित; अब सुरक्षित है बाहर का खाना?
तुलसीराम प्रजापति का क्या मामला?
तुलसीराम प्रजापति को इस मामले का अहम गवाह माना जाता था। वह बाद में उदयपुर की केंद्रीय जेल में बंद थे। 27 दिसंबर 2006 को गुजरात-राजस्थान सीमा पर एक कथित मुठभेड़ में उनकी भी मौत हो गई। यह मामला काफी चर्चित रहा। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इसकी जांच सीबीआई को सौंप दी थी। मामले की सुनवाई भी गुजरात से मुंबई स्थानांतरित कर दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में तुलसीराम प्रजापति के कथित फर्जी मुठभेड़ मामले को भी सोहराबुद्दीन शेख मामले के साथ जोड़ दिया था। सोहराबुद्दीन के भाइयों ने हाईकोर्ट में दलील दी थी कि मुकदमे की सुनवाई में खामियां थीं। उन्होंने ऐसे मामलों का भी जिक्र किया था, जिनमें कुछ गवाहों ने बाद में दावा किया कि विशेष अदालत ने उनकी गवाही सही तरीके से दर्ज नहीं की। अब नयाबुद्दीन शेख ने हाईकोर्ट के सात मई के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। ऐसे में अब इस चर्चित मामले में सर्वोच्च अदालत के अगले कदम पर नजर रहेगी।