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क्या अकेले फैसला ले सकते हैं सीईसी ज्ञानेश कुमार: याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को सुनवाई; विवाद क्यों?
Fri, 02 Oct 2026 06:18 PM IST
राकेश कुमार
आईएएनएस, नई दिल्ली।
आईएएनएस, नई दिल्ली।
Published by: राकेश कुमार
Updated Fri, 02 Oct 2026 06:18 PM IST
सुप्रीम कोर्ट पांच अक्तूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की शक्तियों से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करेगा। याचिका में चुनाव आयोग के सामूहिक निर्णय लेने के ढांचे का पालन सुनिश्चित करने की मांग की गई है। इसमें दो चुनाव आयुक्तों की ओर से अक्तूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच दर्ज कम से कम 14 आपत्तियों का भी उल्लेख है। वहीं, चुनाव आयोग ने कहा है कि आंतरिक मतभेद सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं और एसआईआर समेत उसके फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे।
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सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट सोमवार, पांच अक्तूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के अधिकारों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करेगा। याचिका में सवाल उठाया गया है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले उन शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं, जो संविधान के तहत पूरे चुनाव आयोग को दी गई हैं। सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वाद सूची के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ इस मामले को सुनेगी।
याचिका में किस कानून का दिया गया हवाला?
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 324 का हवाला देते हुए कहा गया है कि चुनावों की निगरानी, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है, न कि किसी एक व्यक्ति की। इसके अलावा, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 18 का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता के मुताबिक, इस प्रावधान में सामूहिक निर्णय लेने की व्यवस्था है। जिन मामलों में सभी आयुक्तों के बीच सहमति नहीं बनती, उनमें बहुमत के आधार पर फैसला लिया जाना चाहिए।
दूसरे चुनाव आयुक्तों ने कितनी बार जताई आपत्ति?
याचिका में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की लिखित टिप्पणियों और फाइलों में दर्ज नोट का हवाला दिया गया है। दावा है कि दोनों ने अक्तूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच कम से कम 14 बार ऐसे फैसलों और कदमों पर आपत्ति जताई, जिन्हें कथित तौर पर उनकी मंजूरी के बिना चुनाव आयोग के नाम पर उठाया गया था।
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याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से क्या मांग की?
याचिकाकर्ता चाहता है कि अदालत स्पष्ट करे कि चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल आयोग की सांविधानिक और कानूनी व्यवस्था के मुताबिक ही किया जा सकता है। याचिका में सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करने के निर्देश देने की मांग की गई है। साथ ही, विवादित फैसलों से जुड़े दस्तावेज अदालत में पेश करने और उन्हें सुरक्षित रखने का अनुरोध भी किया गया है। 29 सितंबर को वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने मुख्य न्यायाधीश के सामने इस मामले का उल्लेख किया था। इसके बाद अदालत ने इसे अगले सप्ताह सूचीबद्ध करने की बात कही थी।
चुनाव आयोग ने आरोपों पर क्या कहा?
चुनाव आयोग ने कहा है कि आयुक्तों के बीच मतभेद को संस्था में टूट के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। आयोग के मुताबिक, बहुसदस्यीय सांविधानिक संस्थाओं में आंतरिक आपत्तियां और लिखित टिप्पणियां सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं। चुनाव आयोग ने यह भी कहा है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़े फैसलों सहित उसके निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे। उसके अनुसार, आयुक्तों के बीच मतभेद सामान्य विचार-विमर्श और प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
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याचिका में किस कानून का दिया गया हवाला?
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 324 का हवाला देते हुए कहा गया है कि चुनावों की निगरानी, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है, न कि किसी एक व्यक्ति की। इसके अलावा, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 18 का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता के मुताबिक, इस प्रावधान में सामूहिक निर्णय लेने की व्यवस्था है। जिन मामलों में सभी आयुक्तों के बीच सहमति नहीं बनती, उनमें बहुमत के आधार पर फैसला लिया जाना चाहिए।
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दूसरे चुनाव आयुक्तों ने कितनी बार जताई आपत्ति?
याचिका में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की लिखित टिप्पणियों और फाइलों में दर्ज नोट का हवाला दिया गया है। दावा है कि दोनों ने अक्तूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच कम से कम 14 बार ऐसे फैसलों और कदमों पर आपत्ति जताई, जिन्हें कथित तौर पर उनकी मंजूरी के बिना चुनाव आयोग के नाम पर उठाया गया था।
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- चुनाव आयोग की मंजूरी के बिना पत्र और आदेश जारी किए जाने का आरोप। बैठकों से पहले कार्यसूची नहीं देने और बाद में कार्यवाही का विवरण दर्ज नहीं करने का मुद्दा।
- मंजूरी के बिना विदेश यात्रा किए जाने को लेकर आपत्ति। मतदाता सूची में नाम जुड़वाने से जुड़े फॉर्म-6 में बदलाव का मामला।
- मतदाता सूची के आंकड़ों तक पहुंच और उन पर नियंत्रण बढ़ने को लेकर चिंता। चुनाव आयोग के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग में काम के बंटवारे में बदलाव का मुद्दा।
- पश्चिम बंगाल में न्यायाधिकरणों के समक्ष अपील दायर करने को लेकर उठाई गई आपत्तियां।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से क्या मांग की?
याचिकाकर्ता चाहता है कि अदालत स्पष्ट करे कि चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल आयोग की सांविधानिक और कानूनी व्यवस्था के मुताबिक ही किया जा सकता है। याचिका में सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करने के निर्देश देने की मांग की गई है। साथ ही, विवादित फैसलों से जुड़े दस्तावेज अदालत में पेश करने और उन्हें सुरक्षित रखने का अनुरोध भी किया गया है। 29 सितंबर को वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने मुख्य न्यायाधीश के सामने इस मामले का उल्लेख किया था। इसके बाद अदालत ने इसे अगले सप्ताह सूचीबद्ध करने की बात कही थी।
चुनाव आयोग ने आरोपों पर क्या कहा?
चुनाव आयोग ने कहा है कि आयुक्तों के बीच मतभेद को संस्था में टूट के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। आयोग के मुताबिक, बहुसदस्यीय सांविधानिक संस्थाओं में आंतरिक आपत्तियां और लिखित टिप्पणियां सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं। चुनाव आयोग ने यह भी कहा है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़े फैसलों सहित उसके निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे। उसके अनुसार, आयुक्तों के बीच मतभेद सामान्य विचार-विमर्श और प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं।