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सर्जिकल स्ट्राइक का असर या कुछ और: कश्मीर के लॉन्चपैड छोड़ जम्मू इलाके में पहुंचे आतंकी, रणनीति क्यों बदली?
Mon, 28 Sep 2026 04:14 PM IST
राकेश कुमार
आईएएनएस, नई दिल्ली।
आईएएनएस, नई दिल्ली।
Published by: राकेश कुमार
Updated Mon, 28 Sep 2026 04:14 PM IST
2016 की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान की घुसपैठ रणनीति में बड़ा बदलाव आया है। कश्मीर के पारंपरिक लॉन्चपैड अब जम्मू के पुंछ, राजौरी और कठुआ जैसे कठिन इलाकों की ओर खिसकाए गए हैं। सीमा पर स्मार्ट बाड़ और आधुनिक सेंसर से निगरानी मजबूत हुई है, जबकि आतंकियों को अब बड़ी संख्या के बजाय छोटे और ज्यादा प्रशिक्षित समूहों में भेजने की कोशिश हो रही है। बड़े हमलों की जगह प्रॉक्सी संगठनों, प्रचार और लक्षित हमलों पर जोर बढ़ा है।
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आतंकियों की नई चाल
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
साल 2016 में उरी हमले के जवाब में भारतीय सेना की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान की सीमा पार घुसपैठ की रणनीति में बड़ा बदलाव आया। एक अधिकारी के मुताबिक, इस कार्रवाई ने भारतीय सेना की तरफ से आतंकियों को पीछे धकेलने के लिए बार-बार कार्रवाई करने का नया तरीका तय किया, साथ ही पाकिस्तान की यह धारणा भी टूटी कि भारत सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ रणनीतिक संयम बरतेगा। इसके बाद आतंकियों के पुराने लॉन्चपैड और घुसपैठ के रास्तों को लेकर पाकिस्तान को अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करना पड़ा।
घुसपैठ रोकने के लिए भारतीय सुरक्षा व्यवस्था में क्या बदलाव हुआ?
खुफिया ब्यूरो के एक अधिकारी के अनुसार, सर्जिकल स्ट्राइक के बाद घुसपैठ रोकने की रणनीति में पूरी तरह बदलाव आया। नियंत्रण रेखा पर निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था को ज्यादा मजबूत किया गया। 740 किलोमीटर लंबी नियंत्रण रेखा पर लगी बाड़ में से करीब 700 किलोमीटर हिस्से को स्मार्ट बाड़ प्रणाली में बदला जा चुका है।
क्या पाकिस्तान ने सुरंगों के जरिए भी घुसपैठ का रास्ता खोजा?
अधिकारियों के मुताबिक, पाकिस्तान ने आतंकी संगठनों की मदद से जम्मू क्षेत्र में सीमा पार सुरंगें बनाने की कोशिश भी की। इन सुरंगों में ऑक्सीजन की सुविधा होने की बात सामने आई। ऐसी कोशिशों का पता लगाने के लिए भारतीय सुरक्षा व्यवस्था में जमीन के भीतर होने वाली गतिविधियों को पकड़ने वाली तकनीक का इस्तेमाल किया गया। भूकंपीय जमीन सेंसर और विशेष प्रकार की जमीन जांच तकनीक का इस्तेमाल किया गया, जिससे जमीन में बदलाव और भूमिगत कंपन का पता सुरंग के भारतीय हिस्से तक पहुंचने से पहले लगाया जा सके।
अब आतंकियों को भारत भेजने का तरीका कैसे बदला?
एक अधिकारी ने बताया कि पहले बड़ी संख्या में कम प्रशिक्षित आतंकियों को एक साथ भारत में घुसाने की कोशिश की जाती थी। अब यह तरीका बदल गया है। पाकिस्तान छोटे समूहों में ज्यादा प्रशिक्षित आतंकियों को भेजने की कोशिश कर रहा है। हाल के वर्षों में दो-दो आतंकियों की जोड़ी में घुसपैठ की कोशिशें भी हुई हैं। अधिकारियों के मुताबिक, यही बदलाव पाकिस्तान के लिए जम्मू-कश्मीर में बड़ा आतंकी नेटवर्क खड़ा करना मुश्किल बना रहा है।
यह भी पढ़ें: खिलाड़ियों के लिए सरकारी नौकरी: सीआरपीएफ, रेलवे, नौसेना और बैंक में अवसर; कौन कर सकता है आवेदन? जानें
बड़े आतंकी हमलों की जगह अब कौन सी रणनीति अपनाई जा रही है?
अधिकारियों के मुताबिक, सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट हवाई कार्रवाई और ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान को यह समझ आ गया है कि बड़े और चर्चित आतंकी हमले करना उसके लिए जोखिम भरा हो सकता है। इसके बाद आतंक की रणनीति में बदलाव देखने को मिला है। अधिकारियों के मुताबिक, उरी, पुलवामा और पहलगाम जैसे बड़े हमलों के बजाय प्रचार युद्ध, गलत सूचना फैलाने और सुरक्षा काफिलों तथा प्रवासी मजदूरों पर लक्षित घात जैसी रणनीतियों पर ज्यादा निर्भरता दिखाई दी है।
पाकिस्तान लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े प्रॉक्सी संगठनों द रेजिस्टेंस फ्रंट और पीपुल्स एंटी-फासिस्ट फ्रंट के जरिए भी गतिविधियां चला रहा है। अधिकारियों के मुताबिक, इन संगठनों को स्थानीय संगठन के तौर पर दिखाने की कोशिश की जाती है, जिससे हमले के बाद जिम्मेदारी से बचने की गुंजाइश रहे। एक अधिकारी ने कहा कि इसकी एक वजह भारत की बदली हुई नीति भी है, जिसमें आतंकी कार्रवाई को केवल सीमा पार आतंकवाद नहीं बल्कि युद्ध की कार्रवाई के तौर पर देखा जा सकता है।
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- कश्मीर से जम्मू की ओर खिसके लॉन्चपैड: पहले आतंकियों के लॉन्चपैड कश्मीर के घने जंगलों के आसपास होते थे, लेकिन बाद में इन्हें जम्मू संभाग के पुंछ, राजौरी और कठुआ जैसे इलाकों की ओर ले जाया गया।
- कठिन इलाकों को बनाया गया रास्ता: इन इलाकों में नदियों के बीच के हिस्से और ऊबड़-खाबड़ जमीन है, जिससे आतंकियों के लिए सीमा पार कर भारत में दाखिल होना आसान नहीं रहता।
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घुसपैठ रोकने के लिए भारतीय सुरक्षा व्यवस्था में क्या बदलाव हुआ?
खुफिया ब्यूरो के एक अधिकारी के अनुसार, सर्जिकल स्ट्राइक के बाद घुसपैठ रोकने की रणनीति में पूरी तरह बदलाव आया। नियंत्रण रेखा पर निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था को ज्यादा मजबूत किया गया। 740 किलोमीटर लंबी नियंत्रण रेखा पर लगी बाड़ में से करीब 700 किलोमीटर हिस्से को स्मार्ट बाड़ प्रणाली में बदला जा चुका है।
- स्मार्ट बाड़ में कई तरह के सेंसर: इस व्यवस्था में प्रकाशीय, तापीय, ध्वनि और अवरक्त सेंसर के साथ कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित कैमरे लगाए गए हैं, जो संदिग्ध गतिविधि पर नजर रखते हैं।
- कमांड सेंटर तक तुरंत सूचना: जैसे ही किसी घुसपैठिए की गतिविधि का पता चलता है, संबंधित जानकारी और वास्तविक समय की तस्वीरें तुरंत नियंत्रण केंद्र तक पहुंचती हैं।
क्या पाकिस्तान ने सुरंगों के जरिए भी घुसपैठ का रास्ता खोजा?
अधिकारियों के मुताबिक, पाकिस्तान ने आतंकी संगठनों की मदद से जम्मू क्षेत्र में सीमा पार सुरंगें बनाने की कोशिश भी की। इन सुरंगों में ऑक्सीजन की सुविधा होने की बात सामने आई। ऐसी कोशिशों का पता लगाने के लिए भारतीय सुरक्षा व्यवस्था में जमीन के भीतर होने वाली गतिविधियों को पकड़ने वाली तकनीक का इस्तेमाल किया गया। भूकंपीय जमीन सेंसर और विशेष प्रकार की जमीन जांच तकनीक का इस्तेमाल किया गया, जिससे जमीन में बदलाव और भूमिगत कंपन का पता सुरंग के भारतीय हिस्से तक पहुंचने से पहले लगाया जा सके।
अब आतंकियों को भारत भेजने का तरीका कैसे बदला?
एक अधिकारी ने बताया कि पहले बड़ी संख्या में कम प्रशिक्षित आतंकियों को एक साथ भारत में घुसाने की कोशिश की जाती थी। अब यह तरीका बदल गया है। पाकिस्तान छोटे समूहों में ज्यादा प्रशिक्षित आतंकियों को भेजने की कोशिश कर रहा है। हाल के वर्षों में दो-दो आतंकियों की जोड़ी में घुसपैठ की कोशिशें भी हुई हैं। अधिकारियों के मुताबिक, यही बदलाव पाकिस्तान के लिए जम्मू-कश्मीर में बड़ा आतंकी नेटवर्क खड़ा करना मुश्किल बना रहा है।
यह भी पढ़ें: खिलाड़ियों के लिए सरकारी नौकरी: सीआरपीएफ, रेलवे, नौसेना और बैंक में अवसर; कौन कर सकता है आवेदन? जानें
बड़े आतंकी हमलों की जगह अब कौन सी रणनीति अपनाई जा रही है?
अधिकारियों के मुताबिक, सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट हवाई कार्रवाई और ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान को यह समझ आ गया है कि बड़े और चर्चित आतंकी हमले करना उसके लिए जोखिम भरा हो सकता है। इसके बाद आतंक की रणनीति में बदलाव देखने को मिला है। अधिकारियों के मुताबिक, उरी, पुलवामा और पहलगाम जैसे बड़े हमलों के बजाय प्रचार युद्ध, गलत सूचना फैलाने और सुरक्षा काफिलों तथा प्रवासी मजदूरों पर लक्षित घात जैसी रणनीतियों पर ज्यादा निर्भरता दिखाई दी है।
पाकिस्तान लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े प्रॉक्सी संगठनों द रेजिस्टेंस फ्रंट और पीपुल्स एंटी-फासिस्ट फ्रंट के जरिए भी गतिविधियां चला रहा है। अधिकारियों के मुताबिक, इन संगठनों को स्थानीय संगठन के तौर पर दिखाने की कोशिश की जाती है, जिससे हमले के बाद जिम्मेदारी से बचने की गुंजाइश रहे। एक अधिकारी ने कहा कि इसकी एक वजह भारत की बदली हुई नीति भी है, जिसमें आतंकी कार्रवाई को केवल सीमा पार आतंकवाद नहीं बल्कि युद्ध की कार्रवाई के तौर पर देखा जा सकता है।