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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   BJP's Rajya Sabha list: A message to the upper castes as well as the backward castes and Dalits

राज्यसभा सूची: अगड़ों को साधने के साथ पिछड़ों-दलितों को भी संदेश, एक नहीं दोनों चुनावों को साधने की कोशिश

Tue, 06 Oct 2026 07:04 AM IST
रोहित मिश्र सुधीर कुमार सिंह, लखनऊ
सुधीर कुमार सिंह, लखनऊ Published by: रोहित मिश्र Updated Tue, 06 Oct 2026 07:04 AM IST
सार
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BJP Rajya Sabha list in UP: यूपी में भाजपा ने सोमवार को आठ राज्यसभा प्रत्याशियों की सूची जारी की है। इस सूची में भाजपा ने किसी भी बाहरी नेता के बजाय कैडर भी दांव लगाया है। 

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BJP's Rajya Sabha list: A message to the upper castes as well as the backward castes and Dalits
विधानसभा के साथ लोकसभा चुनाव भी साधने की कोशिश। - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

भारतीय जनता पार्टी ने राज्यसभा की दस सीटों के चुनाव के लिए आठ उम्मीदवारों की घोषणा के साथ सिर्फ उच्च सदन का गणित नहीं साधा है, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से लेकर 2029 के लोकसभा चुनाव तक के लिए राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है।

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सूची में पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देकर पार्टी ने मूल काडर को भरोसा दिलाया है कि संगठन में लंबी पारी और निष्ठा का सम्मान होगा। अगड़ों के बीच बनी नाराजगी को थामने के साथ पिछड़े और दलित वर्गों को भी मजबूती से जोड़े रखने की कवायद की है।
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पार्टी ने मौजूदा आठ राज्यसभा सदस्यों में किसी को दोबारा मौका नहीं दिया। केंद्रीय मंत्री बीएल वर्मा और पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर सिंह जैसे पश्चिमी यूपी के प्रभावशाली चेहरों को भी सूची से बाहर रखा। इसके उलट कैबिनेट मंत्री धर्मपाल को राज्यसभा भेजकर पार्टी ने पश्चिमी यूपी में पिछड़े नेतृत्व की नई धुरी खड़ी करने का संकेत दिया है। वहीं, रुहेलखंड के कद्दावर कुर्मी नेता और झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार की पुत्री श्रुति के चयन ने परिवारवाद और संगठनात्मक निष्ठा के बीच भाजपा की कसौटी को लेकर नया सवाल खड़ा कर दिया है।
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यह सूची इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के निर्णायक दौर में है। ऐसे समय में राज्यसभा के लिए चेहरे चुनना महज दिल्ली भेजने की कवायद नहीं, बल्कि अलग-अलग सामाजिक समूहों, क्षेत्रों और संगठनात्मक धड़ों को संदेश देने का जरिया भी है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लोधी समाज के नेतृत्व को लेकर पिछले कुछ समय से बीएल वर्मा और राजवीर सिंह के बीच राजनीतिक दूरी और वर्चस्व की चर्चाएं रही हैं। बीएल वर्मा कभी कल्याण सिंह के करीबी रहे, जबकि राजवीर सिंह पिता की राजनीतिक विरासत के स्वाभाविक दावेदार माने जाते हैं। दोनों का राज्यसभा सूची से बाहर रहना सामान्य घटनाक्रम नहीं हो सकता।

इसके उलट आंवला से कई बार विधायक रहे पशुधन मंत्री धर्मपाल को राज्यसभा भेजने का फैसला पश्चिमी यूपी के लोधी मतदाताओं के बीच नेतृत्व के नए चेहरे को आगे बढ़ाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

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पुराने चेहरों के जरिये नए को संदेश

आठ नामों में अधिकांश ऐसे चेहरे हैं जिनकी राजनीतिक पहचान भाजपा संगठन से बनी है। इनमें प्रियंका सिंह रावत और श्रुति कटियार को अपेक्षाकृत नए चेहरे माना जा सकता है। वहीं गोपीकृष्ण पांडेय, राधाकांत ओझा, धर्मपाल सिंह, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर और रामप्रताप सिंह जैसे नामों के जरिये पार्टी ने पुराने काडर को संकेत दिया है कि लंबे समय तक संगठन के लिए काम करने वालों के लिए उच्च सदन का रास्ता खुला है। सामाजिक समीकरण भी इसी रणनीति का हिस्सा है। तीन अगड़े, तीन पिछड़े और दो दलित चेहरों के जरिए भाजपा ने अपने परंपरागत सवर्ण आधार को साधने के साथ ओबीसी और दलित मतदाताओं को भी प्रतिनिधित्व का संदेश दिया है।

श्रुति पर बड़ा सवाल

BJP's Rajya Sabha list: A message to the upper castes as well as the backward castes and Dalits
राज्यसभा उम्मीदवार श्रुति गंगवार - फोटो : अमर उजाला

झारखंड के राज्यपाल और बरेली से कई बार सांसद रहे संतोष गंगवार की पुत्री होने के कारण श्रुति का चयन भाजपा के भीतर परिवारवाद के सवाल को फिर सामने लाता है। भाजपा लंबे समय से विपक्षी दलों पर यही आरोप लगाती रही है। ऐसे में संगठन की पृष्ठभूमि के बावजूद राजनीतिक परिवार से आने वाली श्रुति को राज्यसभा भेजने का फैसला पार्टी की कसौटियों पर सवाल खड़े करता है। हालांकि इसे पश्चिमी यूपी में कुर्मी समाज को साधने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।

2027 से 2029 तक की बिसात

राज्यसभा की सूची में क्षेत्रीय संतुलन भले पूरी तरह बराबर न दिखता हो, लेकिन सामाजिक और संगठनात्मक संदेश अधिक स्पष्ट है। भाजपा ने एक तरफ अगड़ों के बीच संभावित नाराजगी को कम करने की कोशिश की है, वहीं पिछड़ों और दलितों को भी यह भरोसा देने का प्रयास किया है कि उनका प्रतिनिधित्व सुरक्षित है। सबसे बड़ा संदेश यह है कि पार्टी संगठन में गुटीय दबाव या राजनीतिक विरासत के बजाय नेतृत्व की पसंद और चुनावी उपयोगिता को तरजीह दे सकती है।

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