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यूपी: राज्यसभा- विधान परिषद के चुनाव में प्रत्याशी तलाशना भाजपा के लिए चुनौती, इन पर लगा सकती है दांव
Wed, 23 Sep 2026 06:31 AM IST
रोहित मिश्र
सुधीर कुुमार सिंह, अमर उजाला लखनऊ
सुधीर कुुमार सिंह, अमर उजाला लखनऊ
Published by: रोहित मिश्र
Updated Wed, 23 Sep 2026 06:31 AM IST
Rajya Sabha elections in UP: राज्यसभा और विधान परिषद चुनाव की प्रकृति अलग है, मतदाता अलग हैं और जीत का गणित भी अलग है। फिर भी 2027 से पहले दोनों चुनाव भाजपा संगठनात्मक प्रबंधन के लिए अहम पड़ाव हैं।
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राज्य के साथ केंद्र के लिए भी अहम हैं ये चुनाव।
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
विधानसभा चुनाव 2027 से पहले राज्यसभा व विधान परिषद चुनाव में भाजपा के सामने सामाजिक समीकरणों को साधने वाले चेहरे चुनने की चुनौती होगी। इसी दौरान पार्टी के सियासी कौशल और नवगठित संगठन में शामिल चेहरों के प्रभाव का भी आकलन होगा। इसलिए भाजपा का प्रत्याशी चयन पर विशेष ध्यान रहेगा।
राज्यसभा और विधान परिषद चुनाव की प्रकृति अलग है, मतदाता अलग हैं और जीत का गणित भी अलग है। फिर भी 2027 से पहले दोनों चुनाव भाजपा संगठनात्मक प्रबंधन के लिए अहम पड़ाव हैं। प्रदेश भाजपा की कमान संभालने के बाद पंकज चौधरी और उनकी नई टीम के लिए यह पहला चुनाव है। इसलिए टीम में शामिल नए महामंत्रियों व पदाधिकारियों का चुनावी कौशल भी कसौटी पर होगा।
माना जा रहा है कि राज्यसभा चुनाव में विधायकों के संख्या बल और गठबंधन की एकजुटता की परीक्षा होगी। वहीं, विधान परिषद चुनाव में शिक्षक व स्नातक मतदाताओं के बीच पार्टी की पहुंच और स्थानीय संगठन की सक्रियता की थाह लगेगी। दोनों चुनाव में सपा के मुकाबले भाजपा का राजनीतिक प्रबंधन परखा जाएगा, क्योंकि पार्टी 2027 में तीसरी बार सरकार बनाने का दावा कर रही है।
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राज्यसभा चुनाव में आठ सीटें जीतने के लिए मौजूदा संख्या बल ही नहीं, सहयोगी दलों के विधायकों को एकजुट रखना भी जरूरी होगा। सात सीटों के बाद आठवीं सीट के लिए अतिरिक्त वोटों की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में प्रत्याशियों के चयन से लेकर सहयोगी दलों संग तालमेल और मतदान के दिन तक की रणनीति अहम होगी।
दोनों चुनाव से मिलेंगे महत्वपूर्ण संकेत
खास बात यह है कि दोनों चुनावों के नतीजे विधानसभा चुनाव 2027 का सीधा पूर्वानुमान नहीं होंगे। फिर भी सभी दलों को दोनों चुनावों से चुनावी साल में संगठन की सक्रियता, सहयोगियों का साथ और अलग-अलग मतदाता समूहों तक पहुंच बनाने की क्षमता का संकेत मिलेगा।
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राज्यसभा और विधान परिषद चुनाव की प्रकृति अलग है, मतदाता अलग हैं और जीत का गणित भी अलग है। फिर भी 2027 से पहले दोनों चुनाव भाजपा संगठनात्मक प्रबंधन के लिए अहम पड़ाव हैं। प्रदेश भाजपा की कमान संभालने के बाद पंकज चौधरी और उनकी नई टीम के लिए यह पहला चुनाव है। इसलिए टीम में शामिल नए महामंत्रियों व पदाधिकारियों का चुनावी कौशल भी कसौटी पर होगा।
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माना जा रहा है कि राज्यसभा चुनाव में विधायकों के संख्या बल और गठबंधन की एकजुटता की परीक्षा होगी। वहीं, विधान परिषद चुनाव में शिक्षक व स्नातक मतदाताओं के बीच पार्टी की पहुंच और स्थानीय संगठन की सक्रियता की थाह लगेगी। दोनों चुनाव में सपा के मुकाबले भाजपा का राजनीतिक प्रबंधन परखा जाएगा, क्योंकि पार्टी 2027 में तीसरी बार सरकार बनाने का दावा कर रही है।
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राज्यसभा चुनाव में आठ सीटें जीतने के लिए मौजूदा संख्या बल ही नहीं, सहयोगी दलों के विधायकों को एकजुट रखना भी जरूरी होगा। सात सीटों के बाद आठवीं सीट के लिए अतिरिक्त वोटों की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में प्रत्याशियों के चयन से लेकर सहयोगी दलों संग तालमेल और मतदान के दिन तक की रणनीति अहम होगी।
दोनों चुनाव से मिलेंगे महत्वपूर्ण संकेत
खास बात यह है कि दोनों चुनावों के नतीजे विधानसभा चुनाव 2027 का सीधा पूर्वानुमान नहीं होंगे। फिर भी सभी दलों को दोनों चुनावों से चुनावी साल में संगठन की सक्रियता, सहयोगियों का साथ और अलग-अलग मतदाता समूहों तक पहुंच बनाने की क्षमता का संकेत मिलेगा।
शिक्षक-स्नातक मतदाताओं पर नजर
राज्यसभा के तुरंत बाद विधान परिषद की 11 सीटों के लिए चुनाव राजनीतिक तापमान बढ़ाए रखेगा। इसमें शिक्षक और स्नातक मतदाताओं की अलग मतदाता सूची, प्रत्याशियों का व्यक्तिगत संपर्क, शिक्षक संगठनों की सक्रियता और स्थानीय मुद्दे परिणाम पर असर डालते हैं। फिर भी इन सीटों पर प्रदर्शन से दलों को अपने संगठन की जमीनी सक्रियता का आकलन करने का मौका मिलेगा।