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Hindi News ›   Madhya Pradesh ›   Indore News ›   Indore: 67-year-old Narendra Kasera from Indore sets out on a two-year pilgrimage by bicycle.

Indore: 67 की उम्र में साइकिल से निकले दो साल की तीर्थ यात्रा पर इंदौर के नरेंद्र कसेरा

Fri, 26 Jun 2026 06:49 PM IST
Abhishek Chendke न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ओंकारेश्वर/ इंदौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ओंकारेश्वर/ इंदौर Published by: Abhishek Chendke Updated Fri, 26 Jun 2026 06:49 PM IST
सार
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इंदौर के 67 वर्षीय नरेंद्र कसेरा अपनी साइकिल पर दो वर्ष की लंबी तीर्थयात्रा पर निकले हैं। आस्था, अनुशासन और भारतीय संस्कृति के संदेश को जन-जन तक पहुँचाने के उद्देश्य से वे देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों के साथ नेपाल के तीर्थस्थलों की भी यात्रा करेंगे।

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Indore: 67-year-old Narendra Kasera from Indore sets out on a two-year pilgrimage by bicycle.
इंदौर के 67 वर्षीय नरेंद्र कसेरा - फोटो : amar ujala

विस्तार

जब सुविधाओं के बिना छोटी-सी यात्रा भी कठिन लगती है, ऐसे समय में इंदौर के आदर्श इंदिरा नगर निवासी 67 वर्षीय नरेंद्र कसेरा साइकिल पर दो वर्ष की तीर्थयात्रा पर निकले हैं। यह यात्रा देश के 12 ज्योतिर्लिंग, चारधाम, परली वैजनाथ, अयोध्या, जगन्नाथ पुरी, तिरुपति बालाजी, पद्मनाभस्वामी मंदिर तथा नेपाल के प्रमुख धार्मिक स्थलों तक पहुँचेगी और अंत में उज्जैन के महाकालेश्वर में पूर्ण होगी। वे गुरुवार को ओंकारेश्वर पहुँचे थे।अब वे महाराष्ट्र की तरफ जाएंगे और वहां के तीर्थ स्थलों के दर्शन करेंगे।
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नरेंद्र कसेरा की साइकिल स्वयं एक चलता-फिरता मंदिर प्रतीत होती है। उस पर भगवान भोलेनाथ का ध्वज, तुलसी और बेलपत्र के पौधे, माँ नर्मदा की प्रतिमा, नर्मदेश्वर और चंद्रमौलेश्वर शिवलिंग स्थापित हैं। वे जहाँ भी रुकते हैं, सबसे पहले पूजा-अर्चना कर भगवान का स्मरण करते हैं। रात्रि विश्राम के लिए मंदिर, आश्रम, टोल नाका अथवा पेट्रोल पंप जैसी सुरक्षित जगहों का चयन करते हैं।
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उन्होंने इससे पहले भी 14 माह की साइकिल तीर्थयात्रा पूर्ण की है। उनका कहना है कि भारतीय संस्कृति में तीर्थयात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, सेवा, अनुशासन, धैर्य और राष्ट्र की सांस्कृतिक एकता का सशक्त माध्यम रही है। सदियों से संत, ऋषि और श्रद्धालु पदयात्रा तथा साधनहीन यात्राओं के माध्यम से समाज को यह संदेश देते आए हैं कि जीवन का वास्तविक आनंद भौतिक सुख-सुविधाओं में नहीं, बल्कि श्रद्धा, साधना और सेवा में है।
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