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मप्र हाईकोर्ट: संविदा कर्मियों का दावा मनमाने ढंग से खारिज न किया जाए, नियमितीकरण के दावे पर कोर्ट की टिप्पणी
Sun, 01 Nov 2026 10:26 AM IST
दिनेश शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ग्वालियर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ग्वालियर
Published by: दिनेश शर्मा
Updated Sun, 01 Nov 2026 10:26 AM IST
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंध संस्थान का प्रियंका चौहान के नियमितीकरण का दावा खारिज करने वाला आदेश रद्द कर दिया। न्यायालय ने प्रदर्शन मूल्यांकन और संबंधित नोटशीट की प्रामाणिकता जांचने, कर्मचारी को पक्ष रखने का अवसर देने और प्रमाणित प्रति मिलने के बाद तीन महीने में कारण सहित नया निर्णय लेने का निर्देश दिया।
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मप्र हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
संविदा कर्मचारियों को नियमित होने का स्वतः अधिकार भले ही न हो, लेकिन संस्थान उनका दावा मनमाने ढंग से खारिज नहीं कर सकता। उच्च न्यायालय ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंध संस्थान के 2 सितंबर, 2013 के आदेश को रद्द कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि यदि पहले किए गए मूल्यांकन में कर्मचारी का काम संतोषजनक बताया गया है, तो बाद में उसके प्रदर्शन को औसत या खराब मानने का कारण भी संस्थान को स्पष्ट करना होगा।
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प्रदर्शन मूल्यांकन पर स्पष्ट आधार जरूरी
यह मामला संस्थान की प्रशासनिक अधिकारी प्रियंका चौहान के नियमितीकरण के दावे से जुड़ा है। प्रियंका की संविदा अवधि समय-समय पर बढ़ाई गई थी। इसके बावजूद एक समिति ने उनकी शुरुआती तीन अवधियों का प्रदर्शन औसत और चौथी अवधि का प्रदर्शन खराब माना। इसी आधार पर उनका नियमितीकरण खारिज कर दिया गया था। संस्थान ने इसके लिए 20 जनवरी 2012 की नोटशीट को आधार बनाया था, जिसकी प्रामाणिकता पर प्रियंका ने सवाल उठाए थे। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस आनंद सिंह बहरावत ने कहा कि संस्थान को ऐसा निर्णय लेने के लिए तर्कसंगत आधार बताना होगा।
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नोटशीट की जांच और नया निर्णय लेने का निर्देश
उच्च न्यायालय ने नोटशीट को सीधे फर्जी घोषित नहीं किया है, बल्कि उसकी प्रामाणिकता, पुराने मूल्यांकन और संविदा बढ़ाने के आदेशों की जांच करने के निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही न्यायालय ने कहा कि प्रतिकूल मूल्यांकन की जानकारी देकर प्रियंका को अपना पक्ष रखने का अवसर भी देना होगा। आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के बाद, जहां तक व्यावहारिक हो, संस्थान को तीन महीने के भीतर कारण सहित नया निर्णय पारित करना होगा। हालांकि न्यायालय ने कर्मचारी को सीधे नियमित करने का आदेश नहीं दिया है।
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प्रदर्शन मूल्यांकन पर स्पष्ट आधार जरूरी
यह मामला संस्थान की प्रशासनिक अधिकारी प्रियंका चौहान के नियमितीकरण के दावे से जुड़ा है। प्रियंका की संविदा अवधि समय-समय पर बढ़ाई गई थी। इसके बावजूद एक समिति ने उनकी शुरुआती तीन अवधियों का प्रदर्शन औसत और चौथी अवधि का प्रदर्शन खराब माना। इसी आधार पर उनका नियमितीकरण खारिज कर दिया गया था। संस्थान ने इसके लिए 20 जनवरी 2012 की नोटशीट को आधार बनाया था, जिसकी प्रामाणिकता पर प्रियंका ने सवाल उठाए थे। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस आनंद सिंह बहरावत ने कहा कि संस्थान को ऐसा निर्णय लेने के लिए तर्कसंगत आधार बताना होगा।
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नोटशीट की जांच और नया निर्णय लेने का निर्देश
उच्च न्यायालय ने नोटशीट को सीधे फर्जी घोषित नहीं किया है, बल्कि उसकी प्रामाणिकता, पुराने मूल्यांकन और संविदा बढ़ाने के आदेशों की जांच करने के निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही न्यायालय ने कहा कि प्रतिकूल मूल्यांकन की जानकारी देकर प्रियंका को अपना पक्ष रखने का अवसर भी देना होगा। आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के बाद, जहां तक व्यावहारिक हो, संस्थान को तीन महीने के भीतर कारण सहित नया निर्णय पारित करना होगा। हालांकि न्यायालय ने कर्मचारी को सीधे नियमित करने का आदेश नहीं दिया है।
