अच्छी खबर: स्कूल की घंटी बजते ही शुरू होगा बदलाव, 3.18 लाख बच्चों के लिए पाली में बना नया शिक्षा मॉडल; जानें
Rajasthan: पाली में कलेक्टर रविंद्र गोस्वामी की ‘मिशन मानस’ पहल से सरकारी स्कूलों में प्रार्थना सभा, अंग्रेजी बोलने, योग, करियर काउंसलिंग और किताब पढ़ने पर जोर दिया जा रहा है। ‘आओ गांव चलें’ अभियान से प्रवासियों को स्कूलों के विकास से जोड़ने की कोशिश है। पढे़ं पूरी खबर
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
सुबह स्कूल की घंटी बजती है। बच्चे अपनी-अपनी कक्षाओं में पहुंचते हैं और कुछ ही देर बाद प्रार्थना सभा शुरू होती है। सरकारी स्कूलों में यह सामान्य दिनचर्या है, लेकिन राजस्थान के पाली जिले में प्रार्थना सभा को बच्चों के व्यक्तित्व विकास और आत्मविश्वास बढ़ाने का माध्यम बनाया जा रहा है। पाली कलेक्टर रविंद्र गोस्वामी की पहल ‘मिशन मानस’ और ‘आओ गांव चलें’ के जरिए स्कूली शिक्षा को समाज और प्रवासी समुदाय से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
कलेक्टर के निर्देश पर स्कूलों में रोजाना प्रार्थना सभा के लिए एक शीट तैयार की जाती है। इसमें तय किया जाता है कि उस दिन सभा में क्या गतिविधियां होंगी। संस्कृत के श्लोक का अर्थ समझाने से लेकर नैतिक कहानी, हिंदी और अंग्रेजी में समाचार वाचन, योग, ध्यान और विशेष दिवस से जुड़े संदेश तक इसमें शामिल होते हैं। रविंद्र गोस्वामी का कहना है कि सरकारी स्कूलों के बच्चे पढ़ाई में अच्छे होते हैं, लेकिन कई बार उनमें आत्मविश्वास की कमी दिखाई देती है। ‘मिशन मानस’ के जरिए बच्चों को अंग्रेजी बोलने का अभ्यास कराने, ग्रुप डिस्कशन में शामिल करने और उन्हें मंच पर अपनी बात रखने के लिए तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है।
प्रार्थना सभा के 25 मिनट, लेकिन मकसद पूरे दिन का
मिशन मानस के तहत करीब 25 मिनट की प्रार्थना सभा को औपचारिकता से निकालकर व्यक्तित्व विकास का हिस्सा बनाने की कोशिश है। प्रार्थना और मंत्रोच्चार के बाद गीता अथवा संस्कृत श्लोक पढ़ाए जाते हैं और उनका अर्थ समझाया जाता है। इसके बाद सुविचार, नैतिक कहानियां, हिंदी और अंग्रेजी में समाचार वाचन के साथ योग और प्राणायाम कराया जाता है। इसका उद्देश्य बच्चों में अनुशासन, संस्कार, स्वस्थ जीवनशैली, आत्मविश्वास और बेहतर सोच विकसित करना है।
चौथा शनिवार अब सिर्फ नो बैग डे नहीं, ‘मानस सत्र’ भी
महीने के चौथे शनिवार को बच्चों के लिए नो बैग डे रखा जा रहा है। इस दिन स्कूल बैग नहीं होगा, लेकिन सीखने की प्रक्रिया जारी रहेगी। बच्चों के लिए 70 मिनट का विशेष ‘मानस सत्र’ आयोजित किया जाता है। इस सत्र में अभिभावक, पूर्व विद्यार्थी और स्थानीय सेवानिवृत्त कर्मचारी बच्चों से अपने अनुभव साझा कर सकते हैं। करियर से जुड़े विषयों पर चर्चा होती है और बच्चों को अच्छी आदतें अपनाने का संकल्प दिलाया जाता है। इनमें डिजिटल उपवास जैसी पहल भी शामिल है। मकसद यह है कि बच्चा महीने में कम से कम एक दिन खुद से यह सवाल करे कि वह सिर्फ क्या पढ़ रहा है, यह महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि वह कैसा इंसान बन रहा है, यह भी उतना ही जरूरी है।
पढ़ें: जोजरी नदी प्रदूषण मामले में सुप्रीम कोर्ट का सख्त आदेश: तट के 100 मीटर के दायरे में 'नो-कंस्ट्रक्शन'
अंग्रेजी सिर्फ विषय नहीं, आत्मविश्वास का माध्यम
सरकारी स्कूलों के बच्चों में अंग्रेजी बोलने का आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए रोजाना 30 मिनट की स्पोकन इंग्लिश कक्षा पर जोर दिया जा रहा है। इसकी शुरुआत ‘वर्ड ऑफ द डे’ से होती है। बच्चे उस शब्द से वाक्य बनाते हैं और फिर अंग्रेजी में बातचीत का अभ्यास करते हैं। बच्चों से अपना परिचय अंग्रेजी में देने, समय और तारीख पूछने, मदद मांगने और लंच बॉक्स जैसे रोजमर्रा के विषयों पर बातचीत कराई जाती है। इसका उद्देश्य सिर्फ अंग्रेजी सिखाना नहीं, बल्कि बच्चों को बिना झिझक अपनी बात रखने के लिए तैयार करना है।
किताब पढ़ने की आदत पर जोर
‘मिशन मानस’ के तहत बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने के लिए साप्ताहिक रीडिंग सेशन, रीडिंग कॉर्नर और ‘एक माह-एक पुस्तक’ जैसी गतिविधियां शुरू की गई हैं।
कलेक्टर गोस्वामी का मानना है कि किताब पढ़ने वाला बच्चा सिर्फ जानकारी हासिल नहीं करता, बल्कि उसमें सवाल पूछने और दुनिया को अलग नजरिए से देखने की क्षमता भी विकसित होती है। इसी सोच के साथ स्कूलों में पुस्तक पढ़ने को नियमित गतिविधि बनाने की कोशिश की जा रही है।
करियर काउंसलिंग में अधिकारी बच्चों से करेंगे सीधा संवाद
मिशन मानस का अगला अहम हिस्सा करियर काउंसलिंग है। इसके लिए एसडीओ और बीडीओ को सप्ताह में एक दिन किसी सरकारी स्कूल में जाकर बच्चों से बातचीत करने के निर्देश दिए गए हैं। यह संवाद भाषण आधारित नहीं होगा। अधिकारी बच्चों के सवाल सुनेंगे और उनके जवाब देंगे। इस दौरान करियर के साथ नशे से दूरी, अच्छी आदतों और जीवनशैली जैसे विषयों पर भी चर्चा की जाएगी।
‘आओ गांव चलें’ से प्रवासियों को स्कूलों से जोड़ने की कोशिश
‘मिशन मानस’ के साथ ‘आओ गांव चलें’ अभियान भी चलाया जा रहा है। इसका उद्देश्य स्कूलों के विकास में प्रवासी समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करना है। इसके लिए पाली के प्रवासियों से अपने गांवों के स्कूलों से जुड़ने की अपील की गई है। इस व्यापक पहल के दायरे में करीब 3.18 लाख विद्यार्थी और 2,049 स्कूल हैं। एक ओर बच्चों की आदत और सोच बदलने का प्रयास किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर समाज को स्कूलों के विकास से जोड़ने की कोशिश है।
देश में पहली बार प्रवासियों के लिए सेल शुरू करने का दावा
स्कूलों के बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए कलेक्ट्रेट में प्रवासी सेल शुरू किया गया है। कलेक्टर रविंद्र गोस्वामी के अनुसार, यह अपनी तरह की पहली पहल है। इसमें प्रधानाचार्यों और पटवारियों को भी प्रवासियों से संपर्क करने की जिम्मेदारी दी गई है। अभियान के जरिए गांव से बाहर कारोबार या नौकरी के लिए बस चुके लोगों को अपने गांव के स्कूलों से दोबारा जोड़ने की कोशिश है, ताकि वे अपने स्तर पर स्कूलों में जरूरी काम करा सकें।
300 करोड़ जुटाने का लक्ष्य, लेकिन असली मकसद भागीदारी
‘आओ गांव चलें’ अभियान के जरिए स्कूल और अस्पताल भवनों की मरम्मत सहित विकास कार्यों के लिए 300 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि प्रशासन का कहना है कि अभियान का मकसद केवल पैसा जुटाना नहीं है। प्रवासियों को अपने गांव के स्कूल से भावनात्मक रूप से जोड़ना इसका मुख्य उद्देश्य है। प्रवासी अपने स्तर पर स्कूलों में काम करवा सकेंगे और प्रशासन यह सुनिश्चित करेगा कि सभी कार्य सरकारी नियम-कायदों के अनुरूप हों।
15 अगस्त को प्रवासियों से सीधा संवाद
इस बार स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर पाली के प्रवासियों को जिले में आने का न्योता दिया गया। शाम को कलेक्टर आवास पर आयोजित ‘एट होम’ कार्यक्रम में प्रवासियों को बुलाया गया। कलेक्टर ने उनसे बातचीत की और फोटो भी खिंचवाए, ताकि अभियान के उद्देश्य और उसकी गंभीरता को लेकर सीधा संवाद हो सके। कलेक्टर रविंद्र गोस्वामी के मुताबिक, इन दोनों अभियानों का व्यापक उद्देश्य एक तरफ बच्चों के हाथ में अच्छी किताब पहुंचाना है तो दूसरी तरफ स्कूल की दीवारों और बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाना। यानी बच्चे को पढ़ने के लिए किताब मिले और सीखने के लिए बेहतर वातावरण भी।