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फोरलेन सुरंग निर्माण विवाद: हाईकोर्ट ने एनएचएआई से पूछा, 600 करोड़ का मुआवजा बांटने के बाद प्लान क्यों बदला?

Thu, 29 Oct 2026 06:47 PM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Thu, 29 Oct 2026 06:47 PM IST
सार
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 हाईकोर्ट ने शिमला के संजौली में बन रही ट्विन ट्यूब चलोंठी-संजौली-भट्टाकुफर सुरंग के निर्माण को लेकर एनएचएआई को कड़े निर्देश जारी किए हैं। पढ़ें हाईकोर्ट के बड़े फैसले

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fourlane tunnel construction dispute: High Court asks NHAI why plan was changed after distribution compensatio
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने शिमला के संजौली में बन रही ट्विन ट्यूब चलौंठी-संजौली-भट्टाकुफर सुरंग के निर्माण को लेकर एनएचएआई को कड़े निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने एनएचएआई से जवाब मांगा है कि जब शिमला बाईपास परियोजना के लिए पहले ही भूमि अधिग्रहण करके 600 करोड़ का मुआवजा बांटा जा चुका था, तो अचानक उस योजना को छोड़कर घनी आबादी वाली पहाड़ी के नीचे सुरंग बनाने का फैसला क्यों लिया गया। न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने यह आदेश संजौली के प्रभावित स्थानीय निवासियों (विनीत शर्मा व अन्य) की ओर से दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।

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केंद्र सरकार, प्रदेश सरकार और एनएचएआई समेत अन्य प्रतिवादियों को नोटिस
अदालत ने इस मामले में केंद्र, प्रदेश सरकार और एनएचएआई समेत अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से इस असुरक्षित निर्माण कार्य को तुरंत रोकने की गुहार लगाई थी, क्योंकि सुरंग की वजह से उनके घरों में दरारें आ गई हैं और कई मकानों को असुरक्षित घोषित कर दिया गया है। सुनवाई के दौरान एनएचएआई की ओर से कोर्ट को आश्वस्त किया गया कि स्थानीय लोगों की सुरक्षा चिंताओं और तकनीकी टीम के इनपुट के बाद 18 सितंबर से सुरंग का काम पूरी तरह बंद किया गया है। 

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600 करोड़ का नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई कौन करेगा: कोर्ट
उन्होंने कहा कि जब तक आईआईटी रुड़की की तकनीकी टीम अपनी सुरक्षा रिपोर्ट नहीं सौंप देती और स्थानीय मकानों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं हो जाते, तब तक काम शुरू नहीं किया जाएगा। इस बयान के मद्देनजर कोर्ट ने औपचारिक रोक तो नहीं लगाई, लेकिन उम्मीद जताई कि अगली सुनवाई तक वहां कोई निर्माण गतिविधि नहीं होगी। हाईकोर्ट ने एनएचएआई को अपने जवाब में स्पष्ट करने को कहा है कि मूल योजना के तहत छकड़ेल, भट्टाकुफर और ढली से होकर एक सरफेस हाईवे (सतही मार्ग) बनना था। इसके लिए लगभग 88 परिवारों को विस्थापित कर उनके घरों को तोड़ा गया और 600 करोड़ का भारी-भरकम मुआवजा बांटा गया। कोर्ट ने पूछा है कि इस योजना को बिना किसी ठोस वजह के छोड़ने से सरकारी खजाने को जो 600 करोड़ का नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई कौन करेगा।

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घनी आबादी वाली पहाड़ी के नीचे सुरंग न बनाने की सलाह दी थी
याचिका में पेश दस्तावेजों से खुलासा हुआ कि भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने पहले ही इस घनी आबादी वाली पहाड़ी के नीचे सुरंग न बनाने की सलाह दी थी, जिसे कथित तौर पर नजरअंदाज कर दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार, सिमेट्री (कब्रिस्तान) और विशाल मेगा मार्ट जैसे कुछ स्थानों पर सुरंग और ऊपर बनी सतह (जहां सैकड़ों मकान हैं) के बीच की दूरी महज 14 मीटर है। सुरंग के दोनों तरफ से भारी मात्रा में पानी का रिसाव हो रहा है। इससे पहले शिमला के उपायुक्त ने भी शिकायतों के बाद ब्लास्टिंग के काम को रोकने के निर्देश दिए थे।

निजी कॉलेज कर्मियों की बढ़ी ग्रेच्युटी और लीव इनकैशमेंट देने के एकल जज के आदेश पर अंतरिम रोक
 प्रदेश हाईकोर्ट ने निजी तौर पर प्रबंधित कॉलेजों के कर्मचारियों को बढ़ी हुई ग्रेच्युटी और लीव एनकैशमेंट (छुट्टियों के बदले नकद भुगतान) देने के एकल जज के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने यह रोक राज्य सरकार की ओर से दायर अपीलों पर सुनवाई करते हुए लगाई गई है। सरकार ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ताओं ने राज्य सरकार के अधीन काम नहीं किया है, बल्कि एक निजी तौर पर प्रबंधित कॉलेज में अपनी सेवाएं दी हैं। उन्हें ग्रेच्युटी की देय स्वीकार्य राशि पहले ही जारी की जा चुकी है। सरकार ने स्पष्ट किया कि 25 फरवरी 2022 का कार्यालय ज्ञापन केवल उन सरकारी कर्मचारियों पर लागू होता है, जो सीसीएस (पेंशन) नियम, 1972 के तहत आते हैं। इसलिए निजी कॉलेज के स्टाफ पर यह बढ़ी हुई ग्रेच्युटी और लीव एनकैशमेंट लागू नहीं होता है। दलील दी गई कि इन संस्थानों को भुगतान हिमाचल प्रदेश ग्रांट-इन-एड टू नॉन-गवर्नमेंट कॉलेज रूल्स 2017 के प्रावधानों के तहत ही किया जा रहा है। खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सिंगल जज के फैसलों के क्रियान्वयन और संचालन पर आगामी सुनवाई तक अंतरिम रोक लगा दी है। मामले में अगली सुनवाई अब 16 दिसंबर को होगी।

ऐतिहासिक मृकुला देवी मंदिर के संरक्षण के लिए एनआईटी से मांगी ताजा स्टेटस रिपोर्ट
 प्रदेश हाईकोर्ट ने लाहौल-स्पीति जिले में 10,367 फीट की ऊंचाई पर स्थित ऐतिहासिक मृकुला देवी मंदिर के संरक्षण और मरम्मत कार्यों की प्रगति को लेकर एनआईटी हमीरपुर से ताजा स्टेटस रिपोर्ट तलब की है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने अगली सुनवाई जनवरी के पहले सप्ताह में तय की है। लाहौल-स्पीति के उपायुक्त की ओर से दायर हलफनामे में बताया गया है कि मंदिर परिसर में कई महत्वपूर्ण कार्य पूरे कर लिए गए हैं। बाहरी सीमेंट मोर्टार को हटाकर पत्थरों के जोड़ों को पारंपरिक चूना-सुरखी मोर्टार से भरकर मिट्टी का प्लास्टर पूरा किया जा चुका है। मंदिर की उत्तरी और पश्चिमी दीवारों में आईं दरारों को लकड़ी के अनुकूल सेक्शन का उपयोग करके सुरक्षित कर दिया गया है। गर्भगृह और मंडप की ढलवां छत पर लकड़ी के संरक्षण की कोटिंग का काम पूरा हो चुका है। मंदिर में वाटर कूलर लगाने, री-इलेक्ट्रिफिकेशन और बाहरी रोशनी का काम भी पूरा कर लिया गया है। अदालत को सूचित किया गया कि लेजर स्कैनिंग, मिट्टी जांच और भूकंपीय संवेदनशीलता मूल्यांकन जैसे जटिल कार्यों के लिए विशेष तकनीकी विशेषज्ञता की आवश्यकता है, जिसका जिम्मा एनआईटी हमीरपुर को सौंपा गया है। पुरातात्विक विभाग की ओर से इन कार्यों के लिए एनआईटी हमीरपुर के खाते में 8,96,800 की राशि जारी की जा चुकी है।

तय प्रक्रिया के बिना दायर चुनाव याचिका हाईकोर्ट ने की खारिज
 प्रदेश हाईकोर्ट ने पंचायत चुनाव से जुड़े एक मामले में फैसला सुनाते हुए निचली अदालतों के आदेश को पूरी तरह सही ठहराया है।अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई चुनाव याचिका तय कानूनी प्रक्रिया, समयसीमा या सुरक्षा राशि जमा किए बिना या नियमों का पालन किए बिना दाखिल की जाती है, तो उसे अनिवार्य रूप से खारिज कर दिया जाएगा। कानून में ऐसी तकनीकी और प्रक्रियात्मक कमियों को बाद में सुधारने का कोई प्रावधान नहीं है। साथ ही ऐसे मामलों में कमियों को सुधारने का मौका देना अनिवार्य नहीं है। न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने यह फैसला हमीरपुर जिले की नादौन तहसील की पंचायत बड़ा के प्रधान पद के चुनाव से जुड़ी कुलदीप चंद की याचिका को खारिज करते हुए सुनाया। इस मामले में हिमाचल प्रदेश पंचायती राज अधिनियम की धारा 163 और चुनाव नियम 95 के तहत याचिका दायर करते समय सरकारी ट्रेजरी में 300 की सुरक्षा राशि जमा करना अनिवार्य है, जो नहीं की गई थी। याचिका और उसके साथ संलग्न दस्तावेजों पर याचिकाकर्ता के न तो हस्ताक्षर थे और न ही नियम 164(2) के तहत उनका सत्यापन किया गया था।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि ये कमियां तकनीकी थीं और कोर्ट को इन्हें सुधारने का एक मौका देना चाहिए था। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि जब कानून किसी कार्य को एक विशिष्ट तरीके से करने का आदेश देता है, तो उसी का पालन करना होता है। अधिनियम की धारा 165 स्पष्ट रूप से कहती है कि यदि तय प्रक्रिया या समयसीमा का पालन न हो, तो प्राधिकृत अधिकारी याचिका को खारिज करने के लिए बाध्य है। हाईकोर्ट ने एसडीएम नादौन के आदेशों को बरकरार रखते हुए रिट याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता कुलदीप चंद ने पंचायत बड़ा के प्रधान पद पर प्रतिवादी सरिता देवी के निर्वाचन को चुनौती देते हुए एसडीएम (नादौन)-कम-प्राधिकृत अधिकारी की अदालत में एक चुनाव याचिका दायर की थी। एसडीएम अदालत ने अगस्त 2025 में इस याचिका को खारिज कर दिया था। इसके बाद उपायुक्त की अपीलीय अदालत ने भी अप्रैल 2026 में एसडीएम के फैसले को सही ठहराया। इन दोनों फैसलों के खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया था।

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