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हिमाचल: हाईकोर्ट ने कहा- वेटिंग लिस्ट से नियुक्त कर्मचारी को पहले जॉइन करने वाले से अधिक वरिष्ठता नहीं

Wed, 28 Oct 2026 06:12 PM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Wed, 28 Oct 2026 06:12 PM IST
सार
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न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की अदालत ने कहा कि एक सीधी भर्ती वाला कर्मचारी केवल अपनी नियमित नियुक्ति की तारीख से ही वरिष्ठता का दावा कर सकता है, उस तारीख से नहीं जब वह सेवा में पैदा ही नहीं हुआ था। 

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High Court rules that an employee appointed from a waiting list cannot claim higher seniority than someone who
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

 प्रदेश हाईकोर्ट ने सेवा मामलों में स्पष्ट किया है कि वेटिंग लिस्ट (प्रतीक्षा सूची) से नियुक्त किए गए किसी भी सीधे भर्ती वाले उम्मीदवार को उस कर्मचारी से ऊपर वरिष्ठता नहीं दी जा सकती, जिसने उससे पहले विभाग में जॉइन कर लिया था। न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की अदालत ने कहा कि एक सीधी भर्ती वाला कर्मचारी केवल अपनी नियमित नियुक्ति की तारीख से ही वरिष्ठता का दावा कर सकता है, उस तारीख से नहीं जब वह सेवा में पैदा ही नहीं हुआ था। इसके साथ ही अदालत ने 13 फरवरी 2009 को जारी उस सरकारी अधिसूचना को रद्द कर दिया, जिसमें एक कनिष्ठ उम्मीदवार को कंप्यूटर इंजीनियरिंग विभाग में विभागाध्यक्ष के पद पर प्रमोट किया गया था। अदालत ने यह फैसला याचिकाकर्ता पुनीत सूद की ओर से दायर याचिका को स्वीकार करते हुए सुनाया।

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याचिकाकर्ता को हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग की सिफारिश पर 6 फरवरी 1998 को लेक्चरर (कंप्यूटर एप्लीकेशन) नियुक्त किया गया और उन्होंने 16 फरवरी 1998 को कार्यभार संभाल लिया। दूसरी ओर निजी प्रतिवादी ने लेक्चरर (कंप्यूटर इंजीनियरिंग) के पद के लिए परीक्षा दी थी, लेकिन मुख्य चयन सूची में उनका नाम नहीं था। मुख्य सूची के टॉपर के जॉइन न करने के कारण वेटिंग लिस्ट से प्रतिवादी को 17 मार्च 1998 को नियुक्ति पत्र जारी हुआ और उन्होंने 26 मार्च 1998 को विभाग जॉइन किया। विभाग के भर्ती नियमों के अनुसार दोनों स्ट्रीम की एक संयुक्त वरिष्ठता सूची बननी थी।

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साल 2008 में लोक सेवा आयोग ने एक संयुक्त मेरिट सूची भेजी, जिसमें बाद में जॉइन करने वाले प्रतिवादी को सीरियल नंबर 4 पर और पहले जॉइन करने वाले याचिकाकर्ता को सीरियल नंबर 7 पर रख दिया गया। इसी गलत वरिष्ठता के आधार पर सरकार ने 13 फरवरी 2009 को प्रतिवादी को विभागाध्यक्ष पदोन्नति कर दिया। अदालत ने निजी प्रतिवादी की इस दलील को खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता ने 2008 की सीनियरिटी लिस्ट को सीधे चुनौती नहीं दी थी। कोर्ट ने कहा कि लोक सेवा आयोग के पास सरकार के दो अलग-अलग विंग या विज्ञापनों के पदों की आपसी सीनियोरिटी तय करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

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पैरा टीचर से नियमित हुई शिक्षक को मिलेगी पेंशन, सरकार का तर्क खारिज
 प्रदेश हाईकोर्ट ने पैरा टीचर के रूप में सेवा देने के बाद नियमित हुई अध्यापकों को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पैरा टीचर के रूप में दी गई निरंतर सेवा को पेंशन के लिए अर्हक सेवा (क्वालीफाइंग सर्विसेज) के रूप में जोड़ा जाएगा, ताकि कर्मचारियों को पेंशन का लाभ मिल सके। इसके साथ ही न्यायाधीश अजय मोहन गोल और न्यायाधीश योगेश जसवाल की खंडपीठ ने उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें तहत सरकार ने पैरा टीचर के रूप में बिताए गए समय को पेंशन के लिए जोड़ने से इन्कार कर दिया था। अदालत ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता सीता देवी की ओर से पैरा टीचर के रूप में दी गई सेवा को उनकी नियमित सेवा के साथ जोड़कर कुल सेवा को 10 साल (पेंशन के लिए अनिवार्य न्यूनतम अवधि) माना जाए।

इसके अलावा याचिकाकर्ता को दिसंबर 2026 से नियमित पेंशन का भुगतान किया जाएगा। बकाया राशि का भुगतान अगले 6 महीनों के भीतर करने के निर्देश दिए गए हैं। यदि इस अवधि में भुगतान नहीं होता है, तो आदेश की तिथि से 6 फीसदी साधारण वार्षिक ब्याज देना होगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पैरा टीचर की सेवा को केवल पेंशन के लिए 10 वर्ष की पात्रता पूरी करने के लिए गिना जाएगा, अन्य किसी वित्तीय लाभ के लिए नहीं। सरकार ने तर्क दिया था कि पैरा टीचर की नियुक्ति अस्थायी थी और उस समय चयन आयोग पर सवाल उठने के कारण छात्रों की पढ़ाई के लिए यह व्यवस्था की गई थी। अदालत ने सरकार के इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता और अन्य शिक्षकों ने विभाग के स्कूलों में लगातार सेवा दी है और बाद में सरकार ने ही उनकी सेवाओं को नियमित भी कर दिया। ऐसे में पेंशन जैसे लाभ से वंचित करना मनमाना और भेदभावपूर्ण है।

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