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हिमाचल प्रदेश: रोगी मित्रों की आउटसोर्स भर्ती पर हाईकोर्ट की रोक, 15 हजार वेतन पर भरे जाने थे एक हजार पद
Tue, 08 Sep 2026 04:18 PM IST
Ankesh Dogra
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
Published by: Ankesh Dogra
Updated Tue, 08 Sep 2026 04:18 PM IST
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने रोगी मित्रों की आउटसोर्स भर्ती से जुड़े मामले में भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ाने पर रोक लगा दी है। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत को आश्वासन दिया कि याचिका के लंबित रहने तक रोगी मित्रों की आउटसोर्स भर्ती की प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
विस्तार
हिमाचल प्रदेश में अस्पतालों की व्यवस्था संभालने के लिए सरकार की ओर से आउटसोर्स पर रोगी मित्र तैनात करने की योजना को हाईकोर्ट ने फिलहाल रोक दिया है। हाईकोर्ट ने 1,000 रोगी मित्रों की प्रस्तावित भर्ती पर रोक लगाते हुए सरकार की उस नीति पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं, जिसके तहत नियमित भर्ती करने के बजाय बार-बार आउटसोर्स कर्मचारियों के सहारे स्वास्थ्य संस्थानों में खाली पदों को भरने का प्रयास किया जा रहा है।
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मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने बाल कृष्ण की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया। याचिका में सरकार की उस योजना को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत स्टाफ नर्स के बराबर शैक्षणिक योग्यता रखने वाले 1,000 युवाओं को अस्पतालों में रोगी मित्र के तौर पर आउटसोर्स एजेंसियों के माध्यम से तैनात किया जाना था। इन कर्मचारियों को प्रति माह 15,000 रुपये का निश्चित मानदेय दिया जाना प्रस्तावित था।
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सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से उप अधिवक्ता जनरल ने अदालत को बताया कि सरकार इस नीति पर पुनर्विचार कर रही है। सरकार ने यह भी आश्वासन दिया कि एक अन्य संबंधित मामला लंबित रहने तक रोगी मित्र नीति को लागू नहीं किया जाएगा। अदालत ने सरकार के इस बयान को रिकॉर्ड पर लेते हुए स्पष्ट कर दिया कि अगले आदेश तक रोगी मित्रों की नई भर्ती या तैनाती नहीं की जाएगी।
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कोर्ट ने स्वास्थ्य संस्थानों में 290 पदों को भरने के लिए 1 अगस्त को जारी किए गए मांग पत्र पर भी कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने सवाल उठाया कि जब स्वास्थ्य विभाग और चिकित्सा शिक्षा विभाग में स्टाफ नर्सों के 1,535 पद खाली पड़े हैं, तो नियमित भर्ती की दिशा में ठोस कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं।
खंडपीठ ने आउटसोर्स व्यवस्था के सामाजिक और प्रशासनिक प्रभावों पर भी चिंता जताई। अदालत के अनुसार, आउटसोर्स कर्मचारियों से नियमित कर्मचारियों की तरह काम लिया जाता है, लेकिन उन्हें महज 15,000 रुपये के निश्चित मानदेय पर रखा जाता है। कोर्ट ने इसे युवाओं के शोषण को बढ़ावा देने वाली स्थिति बताया।
अदालत ने यह भी कहा कि आउटसोर्स एजेंसियों की कार्यप्रणाली पहले से ही न्यायिक जांच के दायरे में है। ऐसे में उसी व्यवस्था के तहत नई नियुक्तियां करना लंबित अदालती कार्यवाही को प्रभावित करने जैसा है। कोर्ट ने सरकार की इस प्रक्रिया को बेहद गंभीरता से लिया और कहा कि जब तक आउटसोर्सिंग से संबंधित मुख्य मामला अदालत में लंबित है, तब तक ऐसी नई नीति को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
हाईकोर्ट के इस आदेश से फिलहाल 1,000 रोगी मित्रों की प्रस्तावित आउटसोर्स भर्ती पर ब्रेक लग गया है। अब सरकार को नियमित स्वास्थ्य कर्मचारियों के खाली पदों को भरने और आउटसोर्स व्यवस्था को लेकर अपनी नीति पर अदालत के सामने स्थिति स्पष्ट करनी होगी।
अदालत ने यह भी कहा कि आउटसोर्स एजेंसियों की कार्यप्रणाली पहले से ही न्यायिक जांच के दायरे में है। ऐसे में उसी व्यवस्था के तहत नई नियुक्तियां करना लंबित अदालती कार्यवाही को प्रभावित करने जैसा है। कोर्ट ने सरकार की इस प्रक्रिया को बेहद गंभीरता से लिया और कहा कि जब तक आउटसोर्सिंग से संबंधित मुख्य मामला अदालत में लंबित है, तब तक ऐसी नई नीति को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
हाईकोर्ट के इस आदेश से फिलहाल 1,000 रोगी मित्रों की प्रस्तावित आउटसोर्स भर्ती पर ब्रेक लग गया है। अब सरकार को नियमित स्वास्थ्य कर्मचारियों के खाली पदों को भरने और आउटसोर्स व्यवस्था को लेकर अपनी नीति पर अदालत के सामने स्थिति स्पष्ट करनी होगी।