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हिमाचल प्रदेश: हांगो के गेहूं में मिले रोग प्रतिरोधी जीन, अब सेब की पुरानी किस्मों पर वैज्ञानिकों की नजर
Sun, 04 Oct 2026 12:24 PM IST
Ankesh Dogra
अनिल पंवार, संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
अनिल पंवार, संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
Published by: Ankesh Dogra
Updated Sun, 04 Oct 2026 12:24 PM IST
हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिला किन्नौर की हांगो पंचायत अब कृषि वैज्ञानिकों के लिए शोध का महत्वपूर्ण केंद्र बन रही है। यहां की पुरानी गेहूं की किस्मों में भूरा रतुआ और काला रतुआ जैसे रोगों के प्रति प्रतिरोधी गुण मिलने के बाद अब वैज्ञानिक पारंपरिक सेब की किस्मों में भी रोगों से लड़ने वाले जीन तलाशेंगे। चयनित पौधों और फलों के गुणों का रिकॉर्ड तैयार कर आगे वैज्ञानिक और आनुवंशिक जांच की जाएगी।
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सांकेतिक तस्वीर।
- फोटो : AI
विस्तार
हिमाचल के जनजातीय जिला किन्नौर की हांगो पंचायत में गेहूं की कई पुरानी किस्मों में रोग प्रतिरोधी गुण मिलने के बाद अब सेब की किस्मों में भी यह गुण खोजे जाएंगे। क्षेत्र में सेब की पारंपरिक किस्मों में सेब के पौधों में लगने वाले रोगों से लड़ने वाले जीन की वैज्ञानिक जांच की जाएगी। इस क्षेत्र में सेब की भी अच्छी गुणवत्ता और पैदावार हो रही है। वैज्ञानिक अब जांचेंगे कि आखिर इस क्षेत्र में ऊगाई जा रही सेब की किस्मों में ऐसी क्या खास बात है कि इनमें बीमारियां कम लग रही हैं।
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इसी उद्देश्य से हाल ही में हांगो पंचायत में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल के वैज्ञानिकों और उद्यान विभाग के अधिकारियों की सहभागिता में वैज्ञानिक संवाद शिविर भी लगाया गया है। विभाग के अधिकारियों के अनुसार वर्ष 2004-05 में हांगो की स्थानीय गेहूं की कई किस्मों के बीजों पर अध्ययन किया गया था। इसमें गेहूं की स्थानीय किस्मों में भूरा रतुआ और काला रतुआ जैसे रोगों के प्रति प्रतिरोधी गुण पाए गए। अध्ययनों में इस गेहूं की आनुवंशिक सामग्री से जुड़े रोग प्रतिरोधी जीनों की पहचान हुई है। गेहूं में एलआर-80 और एसआर-65 जैसे जीन शामिल हैं।
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गेहूं में रोग प्रतिरोधी गुण मिलने के बाद अब इसी दृष्टिकोण से हांगो और आसपास के क्षेत्रों में मौजूद पुरानी सेब किस्मों की तलाश की जाएगी। इन किस्मों की पहचान कर उनके पौधों और फलों के गुणों का रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा। चयनित पौधों को वैज्ञानिक संस्थानों के सहयोग से आगे रोग परीक्षण और आनुवंशिक जांच के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
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किसी स्थानीय किस्म में रोग प्रतिरोध से जुड़े उपयोगी गुण प्रमाणित होते हैं तो भविष्य में उनका उपयोग नई और बेहतर सेब किस्में तैयार करने में किया जा सकता है। क्षेत्र में सेब की गुणवत्ता काफी अच्छी है। बीमारियों की भी कम ही शिकायतें हैं।
दस लाख रुपये के पुरस्कार का है प्रावधान
अधिकारियों के अनुसार जीन मिलने के बाद हांगो के गेहूं की किस्म की संरक्षित कृषि को वैज्ञानिक पहचान दिलाने के लिए प्लांट जीनोम सेवियर कम्युनिटी पुरस्कार के लिए प्रस्ताव आगे बढ़ाया जा रहा है। इसमें 10 लाख रुपये के पुरस्कार का प्रावधान है। उद्यान विभाग केंद्र पूह के विषय विशेषज्ञ डॉ. देवराज कायथ ने कहा कि सेब की पुरानी किस्मों में भी रोग प्रतिरोधी गुणों की वैज्ञानिक जांच करवाने का प्रस्ताव विभाग और सरकार को भेजा जा रहा है।
अधिकारियों के अनुसार जीन मिलने के बाद हांगो के गेहूं की किस्म की संरक्षित कृषि को वैज्ञानिक पहचान दिलाने के लिए प्लांट जीनोम सेवियर कम्युनिटी पुरस्कार के लिए प्रस्ताव आगे बढ़ाया जा रहा है। इसमें 10 लाख रुपये के पुरस्कार का प्रावधान है। उद्यान विभाग केंद्र पूह के विषय विशेषज्ञ डॉ. देवराज कायथ ने कहा कि सेब की पुरानी किस्मों में भी रोग प्रतिरोधी गुणों की वैज्ञानिक जांच करवाने का प्रस्ताव विभाग और सरकार को भेजा जा रहा है।