साइबर सुरक्षा: एआई टेलीकॉम की ढाल बनेगा या खतरा? विशेषज्ञों ने बताया कैसे नेटवर्क पर मंडरा रहा नया रिस्क
एआई दुनिया भर में तेजी से बदलती तकनीक का केंद्र बन चुका है। जहां एक तरफ बड़ी टेक कंपनियां इसके तेज विकास पर नियंत्रण और सुरक्षा की बात कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ वैश्विक स्तर पर देश इसे सहयोग का प्रमुख जरिया बना रहे हैं। आइए जानते हैं एआई को लेकर दिग्गजों का क्या कहना है...

विस्तार
एआई का इस्तेमाल अब रोजमर्रा के कामों को छोड़कर टेलीकॉम नेटवर्क को बेहतर और सुरक्षित अनाने में भी हो रहा है, लेकिन इसी तकनीक का दूसरा पहलू साइबर सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। एक तरफ एआई नेटवर्क में आने वाली खामियों को पहचानने, स्पैम से बचाने और नेटवर्क की मरम्मत को ज्यादा कुशल बनाने में मदद कर रहा है। दूसरी तरफ यही एआई किसी नेटवर्क की कमजोरियों का पता लगाकर बड़े पैमाने पर साइबर हमले के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसी दोहरे इस्तेमाल को लेकर ब्रिटिश हाई कमीशन और भारतीय टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट्स ने चिंता जताई है।

एआई डेवलपमेंट को लेकर इंडस्ट्री में चिंता
भारत में ब्रिटिश हाई कमीशन में इनोवेशन, टेक्नोलॉजी और स्ट्रैटेजिक सेक्टर के हेड जो जोस्लिन ने एआई के तेजी से हो रहे विकास को लेकर इंडस्ट्री की चिंताओं का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि एंथ्रोपिक, ओपनएआई जैसे कुछ बड़ी टेक कंपनियां एआई के विकास की रफ्तार धीमी करने की बात कह रही है, लेकिन उनका यानी की जो जोसलिन का मानना है कि इससे यह संकेत मिलता है कि एआई इंडस्ट्री खुद इसके विकास से जुड़े संभावित जोखिमों को लेकर गंभीरता से सोच रही है।
जोस्लिन के मुताबिक, सरकार के नजरिए से भी एआई को लेकर सहयोग जरूरी है और यूके-इंडिया संबंधों में एआई एक अहम सहयोग क्षेत्र के तौर पर उभर रहा है।
यूके और भारत मिलकर एआई पर क्यों कर रहे काम?
जोस्लिन ने बताया कि यूके के पास एक टेक्नोलॉजी सिक्योरिटी इनिशिएटिव है। इसके अलावा भारत और येके के प्रधानमंत्रियों ने एक जॉइंट एआई सेंट भी शुरू किया है। इसका उद्देश्य रिसर्चसे, इंडस्ट्री और दोनों देशों की सरकारों को एक साथ लाना है। इसके जरिए सामान्य परिस्थितियों के साथ-साथ संकट की स्थिति में भी दोनों देश मिलकर काम करने की कोशिश करेंगे। यानी एआई को केवल तकनीकी विकास के तौर पर नहीं, बल्कि तकनीकी सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग के नजरिए से भी देखा जा रहा है।
जोस्लिन का कहना है कि आगे एआई को लेकर कई चुनौतियां सामने आ सकती हैं, लेकिन अगर ऐसे सहयोगी मंच तैयार किए जाते हैं तो उनका मिलकर सामना करना आसान होगा।

एआई टेलीकॉम नेटवर्क को कैसे सुरक्षित कर रहा है?
वहीं, सेंटर फॉर डिजिटल इकोनॉमी पॉलिसी रिसर्चर के प्रेसिडेंट जयजीत भट्टाचार्य ने एआई के टेलीकॉम सेक्टर में इस्तेमाल के फायदे बताए।
उनका मानना है कि एआई का इस्तेमाल टेलीकॉम नेटवर्क को बेहतर बनाने के लिए किया जा रहा है। यह नेटवर्क पर आने वाले स्पैम से बचाने में मदद कर सकता है और नेटवर्क की मरम्मत यानी नेटवर्क हीलिंग को ज्यादा कुशल बना सकता है। इसका मतलब है कि एआई नेटवर्क में आने वाली समस्याओं को पहचानने और उन्हें ठीक करने की प्रक्रिया को तेज और ज्यादा प्रभावी बना सकता है। लेकिन यही एआई नेटवर्क पर हमला भी कर सकता है
एआई का सबसे बड़ा खतरा क्या है?
भट्टाचार्य के अनुसार, एआई टूल्स का इस्तेमाल अब यह पता लगाने के लिए भी किया जा रहा है कि किसी नेटवर्क में कहां-कहां कमजोरियां मौजूद हैं। खतरा यहीं से शुरू होता है। अगर एआई किसी नेटवर्क की कमजोरियों को तेजी से पहचान सकता है, तो उसी जानकारी का इस्तेमाल उस नेटवर्क पर बड़े पैमाने पर हमला करने के लिए भी किया जा सकता है। यानी जिस तकनीक का इस्तेमाल नेटवर्क की सुरक्षा मजबूत करने के लिए किया जा रहा है, वही तकनीक हमलावरों के हाथ में जाकर सुरक्षा व्यवस्था के खिलाफ इस्तेमाल हो सकती है।
एक ही एआई, दो अलग-अलग इस्तेमाल
एआई के इस दोहरे इस्तेमाल को आसान भाषा में समझें तो तस्वीर कुछ ऐसी है। सुरक्षा के लिए एआई नेटवर्क की खामियां पहचानना, स्पैम से बचाना, नेटवर्क की मरम्मत को तेज करना, नेटवर्क की निगरानी को बेहतर बनाना है।
वहीं, हमले के लिए एआई नेटवर्क की कमजाेरियां नेटवर्क की कमजोरियां ढूंढना, कमजोर सिस्टम को निशाना बनाना, हमले को बड़े स्तर पर अंजाम देना और साइबर हमलों की गति और क्षमता बढ़ाना शामिल है। यही वजह है कि एआई के बढ़ते इस्तेमाल के साथ साइबर सुरक्षा को लेकर नई रणनीति की जरूरत महसूस की जा रही है।
एआई के विकास को रोकना नहीं, सुरक्षित बनाना चुनौती
एआई के विकास को लेकर एंथ्रोपिक और ओपनएआई जैसी कंपनियों की ओर से रफ्तार को लेकर चिंता का जिक्र ऐसे समय में हुआ है, जब एआई की क्षमताएं तेजी से बढ़ रही हैं। ब्रिटिश हाई कमीशन के प्रतिनिधि के अनुसार, इस स्थिति में सरकार, रिसर्चर्स और इंडस्ट्री के बीच सहयोग जरूरी है। यूके और भारत का संयुक्त एआई केंद्र इसी तरह के सहयोग का एक उदाहरण है, जहां रिसर्च, इंडस्ट्री और सरकार को एक साथ लाने की कोशिश की जा रही है।
टेलीकॉम के लिए आगे क्या चुनौती?
जयजीत भट्टाचार्य के मुताबिक,एआई आधारित साइबर खतरों से निपटने के लिए केवल एक देश या एक संस्था का प्रयास पर्याप्त नहीं होगा। एआई से जुड़े साइबर खतरों की प्रकृति ऐसी है कि देशों के बीच जानकारी साझा करना और मिलकर काम करना महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने यूके के साथ सहयोग को इसी दिशा में एक कदम बताया है।