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यूएन: क्षेत्रीय हथियार नियंत्रण प्रस्ताव के खिलाफ भारत-इस्राइल का मतदान, कहा- सीमा तक सीमित नहीं सुरक्षा चिंता

Tue, 03 Nov 2026 12:14 PM IST
देवेश त्रिपाठी पीटीआई, न्यूयॉर्क
पीटीआई, न्यूयॉर्क Published by: देवेश त्रिपाठी Updated Tue, 03 Nov 2026 12:14 PM IST
सार
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संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रथम समिति में पारंपरिक हथियारों पर क्षेत्रीय नियंत्रण से जुड़े प्रस्ताव को लेकर भारत और इस्राइल ने अलग रुख अपनाया। पाकिस्तान और बेलारूस की ओर से लाए गए इस प्रस्ताव के पक्ष में 180 देशों ने मतदान किया। भारत ने इसे अपनी सुरक्षा संबंधी चिंताओं और पहले से मौजूद अंतरराष्ट्रीय सहमतियों के संदर्भ में अनुपयुक्त माना।

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संयुक्त राष्ट्र महासभा - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

संयुक्त राष्ट्र में क्षेत्रीय स्तर पर पारंपरिक हथियारों पर नियंत्रण से जुड़े पाकिस्तान और बेलारूस के प्रस्ताव के खिलाफ भारत और इस्राइल ने मतदान किया है। भारत ने कहा कि किसी भी देश की सुरक्षा संबंधी चिंताएं केवल उसकी क्षेत्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं होती हैं।
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'सामान्य और पूर्ण निरस्त्रीकरण : क्षेत्रीय और उपक्षेत्रीय स्तर पर पारंपरिक हथियारों पर नियंत्रण' शीर्षक वाले इस प्रस्ताव को सोमवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रथम समिति में मंजूरी मिली। इसके पक्ष में 180 देशों ने मतदान किया, जबकि भारत और इस्राइल ने इसके विरोध में वोट दिया। किसी भी देश ने मतदान से दूरी नहीं बनाई। 193 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र में भारत और इस्राइल ही ऐसे देश थे, जिन्होंने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया।
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भारत ने क्यों किया प्रस्ताव का विरोध?
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन के प्रथम सचिव अनमोल शेर बेदी ने भारत के मतदान की वजह बताते हुए कहा कि पारंपरिक हथियारों पर नियंत्रण एक वैश्विक मुद्दा है। संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रथम समिति में भारत की ओर से मतदान पर स्पष्टीकरण देते हुए बेदी ने कहा, "हम पूरी तरह इस बात से सहमत नहीं हैं कि इस मुद्दे को मुख्य रूप से क्षेत्रीय और उपक्षेत्रीय स्तर पर आगे बढ़ाया जाना चाहिए।"
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उन्होंने कहा कि भारत ने अपनी पुरानी नीति के अनुरूप इस प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया है। भारत ने प्रस्ताव में संयुक्त राष्ट्र निरस्त्रीकरण आयोग से पारंपरिक हथियारों पर क्षेत्रीय समझौतों के लिए रूपरेखा तैयार करने वाले सिद्धांतों पर विचार करने के अनुरोध पर भी सवाल उठाया। बेदी ने कहा, "हमने इस अनुरोध को कुछ हैरानी के साथ देखा है।"

'पहले ही सर्वसम्मति से स्वीकारे जा चुके हैं तीन नजीते'
उन्होंने बताया कि आयोग 1993 में क्षेत्रीय निरस्त्रीकरण पर दिशा-निर्देश और सिफारिशें सर्वसम्मति से स्वीकार कर चुका है। इसके बाद 1999 में पारंपरिक हथियारों पर नियंत्रण और निरस्त्रीकरण से जुड़े दिशा-निर्देश तथा 2017 में पारंपरिक हथियारों के क्षेत्र में व्यावहारिक विश्वास बहाली के उपायों पर सिफारिशें भी सर्वसम्मति से अपनाई गई थीं।

बेदी ने कहा, "इसका मतलब है कि इसी विषय पर उसी आयोग में पहले ही सर्वसम्मति से तीन नतीजे स्वीकार किए जा चुके हैं। अब उसी आयोग से फिर से शून्य से शुरुआत करने को कहा जा रहा है।" उन्होंने आगे कहा, "हम यह समझने में असमर्थ हैं कि जिस विषय पर पहले ही विस्तार से चर्चा हो चुकी है, उस पर दोबारा विचार-विमर्श की जरूरत क्यों है। ऐसा लगता है कि इसका उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र की निरस्त्रीकरण व्यवस्था को व्यस्त रखना है।"

क्षेत्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं होतीं सुरक्षा चिंताएं
भारत ने प्रस्ताव में किसी क्षेत्र या उपक्षेत्र के भीतर रक्षा क्षमताओं के संतुलन को बनाए रखने के तरीके पर भी आपत्ति जताई। बेदी ने कहा, "इसमें यह मान लिया गया है कि देशों की सुरक्षा संबंधी चिंताएं शालीनता से उनकी क्षेत्रीय सीमाओं पर ही रुक जाती हैं। ऐसा नहीं है।"

उन्होंने कहा, "जैसा कि सभी जानते हैं और इसके पीछे कई स्पष्ट कारण हैं, सुरक्षा संबंधी चिंताएं सीमित क्षेत्रीय और उपक्षेत्रीय सीमाओं से आगे तक फैली होती हैं। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी क्षेत्र या उपक्षेत्र में संतुलन बनाए रखने की अवधारणा व्यावहारिक नहीं लगती।"

प्रस्ताव में क्या कहा गया था?
प्रस्ताव में कहा गया है कि शीत युद्ध के बाद के दौर में शांति और सुरक्षा के लिए ज्यादातर खतरे एक ही क्षेत्र या उपक्षेत्र में स्थित देशों के बीच पैदा हुए हैं। इसलिए पारंपरिक हथियारों पर नियंत्रण का प्रयास मुख्य रूप से क्षेत्रीय और उपक्षेत्रीय स्तर पर किया जाना चाहिए।

इसमें क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा मजबूत करने के लिए ऐसे समझौतों को बढ़ावा देने की इच्छा भी जताई गई है, जिनके तहत हथियारों और सैन्य बलों की तैनाती का स्तर 'यथासंभव कम' रखा जा सके।

दक्षिण एशिया से जुड़े प्रस्ताव का भी भारत ने किया विरोध
भारत ने प्रस्ताव के एक अलग पैराग्राफ के खिलाफ भी मतदान किया। इसमें दक्षिण एशिया के संदर्भ में पारंपरिक हथियारों पर नियंत्रण से जुड़े प्रस्तावों का उल्लेख किया गया था। इस पैराग्राफ में लैटिन अमेरिका के कुछ देशों के बीच हुई बातचीत और दक्षिण एशिया में पारंपरिक हथियारों पर नियंत्रण के लिए दिए गए प्रस्तावों को 'विशेष रुचि' के साथ रेखांकित किया गया था। इसमें क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए पारंपरिक हथियारों पर नियंत्रण के महत्व को भी स्वीकार किया गया था।


प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े समझौतों को बढ़ावा देने में सैन्य रूप से महत्वपूर्ण देशों और अधिक सैन्य क्षमता रखने वाले देशों की विशेष जिम्मेदारी है।
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