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एक्सप्लेनर: अगले 73 वर्षों में धरती से मिट सकता है इंसानों का नामोनिशान? लैंसेट की रिपोर्ट में डराने वाला दावा
Mon, 12 Oct 2026 08:32 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Mon, 12 Oct 2026 08:32 AM IST
मेडिकल जर्नल 'द लैंसेट' की नई रिपोर्ट में 2100 तक इंसानों के विलुप्त होने का खतरा जताया गया है। जानें एआई, परमाणु संघर्ष और 17 विनाशकारी जोखिमों पर रिसर्चर्स का विश्लेषण और इस खतरे से बचने को लेकर क्या तरीके सुझाए गए हैं।
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लैंसेट की रिपोर्ट में अगले 73 साल के लिए चेतावनी।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
साल 2100 तक धरती से इंसान विलुप्त हो सकते हैं। यह दावा हुआ है चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ी सबसे प्रतिष्ठित मैगजीन लैंसेट की एक रिपोर्ट में। वैश्विक जोखिम के विश्लेषण से जुड़ी इस रिपोर्ट में अगली सदी तक मानव जाति के लिए सबसे बड़े खतरों को चिह्नित करने का लक्ष्य रखा गया था। इस रिपोर्ट में जिन कारणों को इंसानों के लिए सबसे खतरनाक करार दिया गया है, उनमें परमाणु युद्ध और कृत्रिम बुद्धिमता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को उच्च स्तर पर रखा गया है। इसके साथ ही 17 अन्य खतरों को इंसानों की विलुप्ति के संभावित कारण के तौर पर शामिल किया गया है।
आइये जानते हैं कि जिस लैंसेट रिपोर्ट में सन 2100 तक इंसानों के विलुप्त हो जाने का डर जताया गया है, वह क्या है और उसे तैयार किसने किया है? इसमें इंसानों के लिए सबसे बड़ा खतरा किन चीजों से बताया गया है? अलग-अलग क्षेत्रों के लिए इस रिपोर्ट में खतरे पैदा होने की क्या वजह बताई गई है? आइये जानते हैं...
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आइये जानते हैं कि जिस लैंसेट रिपोर्ट में सन 2100 तक इंसानों के विलुप्त हो जाने का डर जताया गया है, वह क्या है और उसे तैयार किसने किया है? इसमें इंसानों के लिए सबसे बड़ा खतरा किन चीजों से बताया गया है? अलग-अलग क्षेत्रों के लिए इस रिपोर्ट में खतरे पैदा होने की क्या वजह बताई गई है? आइये जानते हैं...
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इंसानों की विलुप्ति का खतरा बताने वाली रिपोर्ट क्या, किसने तैयार की?
इंसानों पर विलुप्ति का खतरा बताने वाली इस रिपोर्ट को '21वीं सदी में स्वास्थ्य के लिए वैश्विक खतरों पर लैंसेट आयोग' (The Lancet Commission on 21st Century Global Threats to Health) की ओर से तैयार किया गया है। यह अध्ययन प्रसिद्ध मेडिकल जर्नल द लैंसेट में प्रकाशित हुआ है।यह रिपोर्ट क्या है?
- इस रिपोर्ट में अगले 73 वर्षों (वर्ष 2100 तक) के दौरान मानव स्वास्थ्य और अस्तित्व के लिए 17 प्रमुख और विनाशकारी खतरों का आकलन किया गया है।
- रिपोर्ट के मुताबिक, एआई का गलत इस्तेमाल, जैसे- जैविक हथियार बनाना या परमाणु संघर्ष साल 2100 तक इंसानों के लिए विलुप्त होने का खतरा पैदा करते हैं।
- विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि यूं तो इस विलुप्ति की घटनाओं की संभावना कम है, लेकिन अगर ये होता है तो इनका प्रभाव पूरी मानवता के लिए विनाशकारी होगा।
- जलवायु परिवर्तन, अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य सहायता में कटौती, बाल कुपोषण, वायु प्रदूषण, मोटापा और महामारियों को भी प्रमुख खतरों में शामिल किया गया है।
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इस रिपोर्ट को किसने तैयार किया है?
साल 2100 तक इंसानों की संभावित विलुप्ति का जोखिम उच्चतम स्तर पर पहुंचने के दो प्रमुख कारण बताए गए हैं।
खतरा क्यों: अगर एआई की मदद से ऐसा खतरनाक जैविक एजेंट या वायरस विकसित हो जाता है जो अनियंत्रित हो जाए, तो यह दुनिया भर में फैलकर पूरी मानव जाति के अस्तित्व को संकट में डाल सकता है।
- इस रिपोर्ट को स्वास्थ्य, विज्ञान और वैश्विक नीति से जुड़े 35 अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की टीम (आयोग) ने तैयार किया है।
- वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मैट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन के निदेशक और कमीशन के सह-अध्यक्ष प्रो. क्रिस्टोफर मरे इसके सह-अध्यक्ष रहे।
- डॉ. नतालिया कानेम संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) की पूर्व कार्यकारी निदेशक और कमीशन की सह-अध्यक्ष हैं।
- यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (यूसीएल) में संक्रामक रोग महामारी विज्ञान के प्रोफेसर इब्राहिम अबूबकर भी इस आयोग के प्रमुख सदस्य हैं।
इंसानों की विलुप्ति के पीछे क्या हो सकती है वजह, खतरा क्यों?
साल 2100 तक इंसानों की संभावित विलुप्ति का जोखिम उच्चतम स्तर पर पहुंचने के दो प्रमुख कारण बताए गए हैं।
1. एआई का दुर्भावनापूर्ण इस्तेमाल
वजह: रिपोर्ट में कहा गया है कि वजह उन्नत एआई तकनीक का दुरुपयोग घातक जैविक हथियार तैयार करने के लिए किया जा सकता है।खतरा क्यों: अगर एआई की मदद से ऐसा खतरनाक जैविक एजेंट या वायरस विकसित हो जाता है जो अनियंत्रित हो जाए, तो यह दुनिया भर में फैलकर पूरी मानव जाति के अस्तित्व को संकट में डाल सकता है।
2. परमाणु संघर्ष और 'परमाणु अकाल'
वजह: वैश्विक शक्तियों के बीच बड़े पैमाने पर परमाणु युद्ध होना।खतरा क्यों: परमाणु विस्फोटों से पैदा हुआ धुआं और राख के कण वायुमंडल की ऊपरी परत में जमा हो जाएंगे, जो सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी तक पहुंचने से रोक देंगे। नतीजतन तापमान में जबरदस्त गिरावट आएगी और व्यापक परमाणु अकाल की स्थिति पैदा होगी, जिससे वैश्विक खाद्य आपूर्ति ठप हो जाएगी और इंसानों की भुखमरी से मौत हो सकती है।
लैंसेट की रिपोर्ट में बताए गए मानवता के लिए सबसे बड़े खतरे।
- फोटो : अमर उजाला
और कौन से खतरों से विलुप्ति की कगार पर पहुंच सकते हैं इंसान?
लैंसेट की रिपोर्ट में विलुप्ति का खतरा पैदा करने वाले सबसे गंभीर दो खतरों के अलावा 15 ऐसे खतरों को भी जगह दी गई है, जो आसपास की दुनिया में रोजाना घटते हैं और लंबे समय में इंसानों के लिए विलुप्ति का कारण बन सकते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह खतरे एक अरब से ज्यादा स्वस्थ जीवन वर्षों (डीएएलवाई) के नुकसान का कारण बन सकते हैं। इनमें वायु प्रदूषण से लेकर जलवायु परिवर्तन और सशस्त्र संघर्ष से लेकर कुपोषण और शराब पीने-धूम्रपान को वजह माना गया है।इन खतरों को असामयिक मृत्यु और बीमारी या विकलांगता की वजह से बर्बाद होने वाले स्वस्थ जीवन वर्षों (विकलांगता की वजह से खराब होने वाले जीवन के वर्ष (डीएएलवाई) के आधार पर मापा गया है।
भारत के लिए कौन से खतरे बन सकते हैं इंसानों की विलुप्ति का कारण?
लैंसेट की रिपोर्ट में भारत का जिक्र करते हुए मुख्य रूप से चार कारणों को इंसानियत के लिए विलुप्ति के खतरे में जोड़ा गया है।
1. वायु प्रदूषण और राजनीतिक चुनौतियां
- दक्षिण एशिया में वायु प्रदूषण (पीएम 2.5) से बचने लायक स्वस्थ जीवन वर्षों के नुकसान की सबसे बड़ी संभावना जताई गई है।
- भारत में वायु प्रदूषण के उच्च स्तर का संबंध कृषि पद्धतियों, जैसे- फसल के अवशेष, पराली जलाने से जुड़ा हुआ है।
- रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में वायु प्रदूषण कम करने की चुनौती आर्थिक से ज्यादा राजनीतिक है, क्योंकि सरकार कृषि प्रथाओं को विनियमित करने के मामले में ढिलाई बरतती है।
2. सूखा और नीतिगत प्रबंधन
रिपोर्ट में भारत का उदाहरण देते हुए जिक्र किया गया है कि देश के कई हिस्सों में बार-बार सूखे की स्थिति बनने के बावजूद, प्रभावी नीतिगत निर्णयों और प्रतिक्रियाओं की वजह से पिछले 50 वर्षों में कोई अकाल नहीं पड़ा है। हालांकि, इसके खतरा आने वाले समय में इंसानियत की विलुप्ति के बड़े कारणों में से एक रह सकता है।
3. जलवायु परिवर्तन के बहुआयामी प्रभाव
जलवायु परिवर्तन का सबसे गंभीर बोझ विकासशील और कम आय वाले क्षेत्रों की संवेदनशील आबादी पर पड़ता है। इस मामले में भारत को भी संवेदनशील माना जाता है। दरअसल, तीन तरफ से समुद्र और बड़े भूभाग का पहाड़ियों से घिरे होने के कारण भारत पर जलवायु परिवर्तन का बड़ा असर होने की आशंका है। जहां समुद्र का बढ़ता जलस्तर भारत के तटीय इलाकों के लिए खतरा बन सकता है, तो वहीं ग्लोबल वार्मिंग के चलते पिघलती बर्फ पहाड़ी और ऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए समस्या खड़ी कर सकती है।
इतना ही नहीं काफी ज्यादा तापमान और गर्मी के संपर्क में आने से बच्चों में कुपोषण का जोखिम बढ़ता है। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से कृषि क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हो सकता है, जिससे ग्रामीण समाज में इस पर निर्भर प्रति व्यक्ति आय में कमी आ सकती है। तापमान बढ़ोतरी और बाढ़ जैसी घटनाओं से बीमारियों, मलेरिया और डेंगू के प्रसार का खतरा बना रहता है।
रिपोर्ट में भारत का उदाहरण देते हुए जिक्र किया गया है कि देश के कई हिस्सों में बार-बार सूखे की स्थिति बनने के बावजूद, प्रभावी नीतिगत निर्णयों और प्रतिक्रियाओं की वजह से पिछले 50 वर्षों में कोई अकाल नहीं पड़ा है। हालांकि, इसके खतरा आने वाले समय में इंसानियत की विलुप्ति के बड़े कारणों में से एक रह सकता है।
3. जलवायु परिवर्तन के बहुआयामी प्रभाव
जलवायु परिवर्तन का सबसे गंभीर बोझ विकासशील और कम आय वाले क्षेत्रों की संवेदनशील आबादी पर पड़ता है। इस मामले में भारत को भी संवेदनशील माना जाता है। दरअसल, तीन तरफ से समुद्र और बड़े भूभाग का पहाड़ियों से घिरे होने के कारण भारत पर जलवायु परिवर्तन का बड़ा असर होने की आशंका है। जहां समुद्र का बढ़ता जलस्तर भारत के तटीय इलाकों के लिए खतरा बन सकता है, तो वहीं ग्लोबल वार्मिंग के चलते पिघलती बर्फ पहाड़ी और ऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए समस्या खड़ी कर सकती है।
इतना ही नहीं काफी ज्यादा तापमान और गर्मी के संपर्क में आने से बच्चों में कुपोषण का जोखिम बढ़ता है। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से कृषि क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हो सकता है, जिससे ग्रामीण समाज में इस पर निर्भर प्रति व्यक्ति आय में कमी आ सकती है। तापमान बढ़ोतरी और बाढ़ जैसी घटनाओं से बीमारियों, मलेरिया और डेंगू के प्रसार का खतरा बना रहता है।
4. वैश्विक सर्वनाशकारी खतरे: एआई का गलत इस्तेमाल और परमाणु युद्ध
एआई के जरिए बनाए गए जैविक-अन्य हथियार और परमाणु संघर्ष ऐसे वैश्विक अति-जोखिम हैं, जिनके असर से भारत भी बचा नहीं रह सकता। यह भारत के साथ-साथ कई और देशों में पूरी मानव सभ्यता की विलुप्ति का कारण बन सकता है।
रिसर्चर्स ने संकट खड़ा होने की स्थिति में सिर्फ त्वरित और अचानक प्रतिक्रिया देने के बजाय पूर्वाभास, रोकथाम, तैयारी और सुरक्षा की समर्पित क्षमताओं वाली स्वास्थ्य प्रणालियों के निर्माण और टिकाऊ वित्तीय व्यवस्था पर जोर देने की सिफारिश की है।
एआई के जरिए बनाए गए जैविक-अन्य हथियार और परमाणु संघर्ष ऐसे वैश्विक अति-जोखिम हैं, जिनके असर से भारत भी बचा नहीं रह सकता। यह भारत के साथ-साथ कई और देशों में पूरी मानव सभ्यता की विलुप्ति का कारण बन सकता है।
भविष्य के इन संकटों से निपटने के क्या तरीके?
लैंसेट की रिपोर्ट में भविष्य के महाविनाशकारी खतरों से निपटने और मानवता की सुरक्षा के लिए तीन मुख्य सिफारिशें और कई उपाय बताए गए हैं।क्या हैं तीन प्रमुख सिफारिशें?
1. खतरे से निपटने में सक्षम स्वास्थ्य प्रणालियांरिसर्चर्स ने संकट खड़ा होने की स्थिति में सिर्फ त्वरित और अचानक प्रतिक्रिया देने के बजाय पूर्वाभास, रोकथाम, तैयारी और सुरक्षा की समर्पित क्षमताओं वाली स्वास्थ्य प्रणालियों के निर्माण और टिकाऊ वित्तीय व्यवस्था पर जोर देने की सिफारिश की है।
2. क्रांतिकारी नवाचार और तकनीक पर सख्त नियंत्रण
लैंसेट की रिपोर्ट में कहा गया है कि जहां मौजूदा समय में साधन अपर्याप्त हैं, जैसे कि प्लेटफॉर्म टीके, नए एंटीबायोटिक्स, मोटापे के उपचार, जलवायु से निपटने की व्यवस्था न होना और वायुमंडलीय कार्बन निष्कासन। वहां इनोवेशन (नवाचार) में निवेश में भारी बढ़ोतरी की जानी चाहिए। इसके साथ ही, फ्रंटियर एआई प्रणालियों और एआई-सक्षम बायो-डिजाइन टूल्स जैसी उच्च जोखिम वाली तकनीकों के प्रबंधन के लिए सख्त गवर्नेंस ढांचा स्थापित किया जाना जरूरी है।
3. 21वीं सदी के वैश्विक खतरों की निगरानी की जरूरत
लैंसेट की तरफ से खतरों के नियमित आकलन, विज्ञान और डेटा को ट्रैक करने और इसके अलावा प्रमुख राजनीतिक और सुरक्षा मंचों के समक्ष निष्कर्ष प्रस्तुत करने के लिए एक निगरानी सिस्टम की स्थापना का भी आह्वान किया गया है, ताकि अलग-अलग देशों और वर्गों की तरफ से इन खतरों को कमतर आंकने के चक्र को खत्म किया जा सके।
लैंसेट की रिपोर्ट में कहा गया है कि जहां मौजूदा समय में साधन अपर्याप्त हैं, जैसे कि प्लेटफॉर्म टीके, नए एंटीबायोटिक्स, मोटापे के उपचार, जलवायु से निपटने की व्यवस्था न होना और वायुमंडलीय कार्बन निष्कासन। वहां इनोवेशन (नवाचार) में निवेश में भारी बढ़ोतरी की जानी चाहिए। इसके साथ ही, फ्रंटियर एआई प्रणालियों और एआई-सक्षम बायो-डिजाइन टूल्स जैसी उच्च जोखिम वाली तकनीकों के प्रबंधन के लिए सख्त गवर्नेंस ढांचा स्थापित किया जाना जरूरी है।
3. 21वीं सदी के वैश्विक खतरों की निगरानी की जरूरत
लैंसेट की तरफ से खतरों के नियमित आकलन, विज्ञान और डेटा को ट्रैक करने और इसके अलावा प्रमुख राजनीतिक और सुरक्षा मंचों के समक्ष निष्कर्ष प्रस्तुत करने के लिए एक निगरानी सिस्टम की स्थापना का भी आह्वान किया गया है, ताकि अलग-अलग देशों और वर्गों की तरफ से इन खतरों को कमतर आंकने के चक्र को खत्म किया जा सके।
क्या हैं रिपोर्ट में सुझाए गए उपाय?
1. संस्थागत और सामाजिक सुधार की जरूरत- सरकारों और बहुपक्षीय संस्थानों को केवल निकट भविष्य और अपने स्थानीय दायरे तक सीमित रहने के बजाय दीर्घकालिक पूर्वानुमान और नियमित जोखिम आकलन प्रणाली अपनाने की सलाह दी गई है।
- नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन और संकटों से निपटने के लिए सामाजिक व संस्थागत विश्वास को मजबूत करना एक अहम आधार माना गया है।
- ऐसे जटिल खतरों के लिए, जिन्हें कोई भी देश अकेले हल नहीं कर सकता, प्रभावी अंतरराष्ट्रीय शासन और बहुपक्षीय सहयोग स्थापित करना अनिवार्य है।
- असमानता घटाने वाली नीतियां लागू करना, टिकाऊ व लचीली खाद्य प्रणालियां बनाना और गुणवत्ता वाली किफायती स्वास्थ्य कवरेज को अहम बताया गया है।
2. खतरों का पता लगाकर पहले से कार्रवाई की तैयारी
रिपोर्ट में जोर दिया गया है कि केवल आपदा आने के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय, जोखिमों के गंभीर संकट में बदलने से पहले ही पूर्व-अनुमान लगाकर कदम उठाए जाने चाहिए।