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बुध की सतह ने खोला अतीत का राज: कांच के मोतियों से सामने आया कौन सा रहस्य? अब बेपीकोलंबो करेगा अहम पुष्टि
Sat, 12 Sep 2026 07:38 PM IST
देवेश त्रिपाठी
अमर उजाला नेटवर्क, बर्लिन
अमर उजाला नेटवर्क, बर्लिन
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Sat, 12 Sep 2026 07:38 PM IST
सौरमंडल के सबसे छोटे ग्रह बुध की सतह की नई जांच ने उसके शुरुआती इतिहास को लेकर वैज्ञानिकों की समझ में अहम बदलाव की संभावना जताई है। अध्ययन में सतह पर सिलिकॉन डाइऑक्साइड की मात्रा करीब 37 प्रतिशत आंकी गई, जो पुराने अनुमान से काफी कम है।
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वैज्ञानिकों को मिला कम सिलिकॉन डाइऑक्साइड का बड़ा संकेत
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
सूर्य के सबसे करीब और सौरमंडल के सबसे छोटे ग्रह बुध की सतह ने उसके अतीत से जुड़ा एक अहम रहस्य उजागर किया है।वैज्ञानिकों के नए अध्ययन के मुताबिक बुध की सतह पर सिलिकॉन डाइऑक्साइड की मात्रा पहले लगाए गए अनुमान से काफी कम है। इसकी मात्रा करीब 37 प्रतिशत पाई गई है, जो पुराने अनुमानों से 25 प्रतिशत तक कम है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अंतर संकेत देता है कि अरबों साल पहले बुध का आंतरिक भाग और उसका ज्वालामुखीय वातावरण अपेक्षा से कहीं अधिक गर्म रहा होगा।यह अध्ययन जर्मनी के मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर सोलर सिस्टम रिसर्च, मुंस्टर विश्वविद्यालय और गॉटिंगेन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने किया है। शोध प्लेनेटरी रिसर्च जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक बुध के प्राचीन ज्वालामुखियों से निकला लावा ग्रह के मैंटल के उन गहरे हिस्सों से आया हो सकता है, जहां अत्यधिक तापमान पर ज्यादा मात्रा में चट्टानी पदार्थ पिघला था।ग्रह की ठोस पपड़ी के नीचे मौजूद परत को मैंटल कहा जाता है। किसी ग्रह के शुरुआती दौर में इसका बड़ा हिस्सा पिघला हुआ हो सकता है। जैसे-जैसे यह पिघला हुआ पदार्थ ठंडा होता है, सबसे पहले जमने वाली चट्टानों में सिलिकॉन डाइऑक्साइड की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है। इसके बाद जैसे-जैसे पदार्थ क्रिस्टल के रूप में जमता जाता है, बची हुई पिघली सामग्री में सिलिकॉन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती जाती है।
इसलिए बुध की सतह पर अपेक्षाकृत कम सिलिकॉन डाइऑक्साइड मिलने का अर्थ यह हो सकता है कि उसका लावा मैंटल के ऐसे गहरे हिस्सों से निकला, जहां बहुत अधिक तापमान पर बड़े पैमाने पर पिघलाव हुआ था। हालांकि वैज्ञानिकों ने एक दूसरी संभावना भी जताई है। हो सकता है कि बुध की शुरुआती पपड़ी में सिलिकॉन डाइऑक्साइड ज्यादा रहा हो और बाद में ग्रह ने ऑक्सीजन खो दी हो।
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आधा मिलीमीटर के कांच के मोतियों से जांच
बुध की चट्टानों के सीधे नमूने पृथ्वी पर उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए वैज्ञानिकों को उसकी सतह की रासायनिक संरचना जानने के लिए दूर से मिले इन्फ्रारेड विकिरण पर निर्भर रहना पड़ता है। इस प्रक्रिया को अधिक सटीक बनाने के लिए शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में करीब आधा मिलीमीटर आकार के छोटे कांच के मोती तैयार किए। इनमें सिलिकॉन डाइऑक्साइड की मात्रा पहले से निश्चित रखी गई और उनके इन्फ्रारेड गुणों को मापा गया।इसके बाद इस तकनीक को पहले चंद्रमा पर परखा गया। चंद्रमा के मामले में वैज्ञानिकों के पास अंतरिक्ष यानों से मिले इन्फ्रारेड आंकड़ों के साथ वास्तविक चंद्र चट्टानों के नमूने भी मौजूद हैं। शोधकर्ताओं ने नासा के लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर से मिले आंकड़ों की तुलना चंद्रमा से लाए गए नमूनों से की। इस परीक्षण से तकनीक की विश्वसनीयता जांचने में मदद मिली।
बेपीकोलंबो से मिल सकती है निर्णायक पुष्टि
तकनीक के सफल परीक्षण के बाद वैज्ञानिकों ने इसे बुध पर लागू किया। पृथ्वी से किए गए बुध के इन्फ्रारेड अवलोकनों, जिनमें अमेरिका के एरिजोना स्थित बोक टेलीस्कोप के आंकड़े भी शामिल हैं, के विश्लेषण से सतह पर करीब 37 प्रतिशत सिलिकॉन डाइऑक्साइड का अनुमान सामने आया।अब वैज्ञानिकों को यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी और जापान की जाक्सा के संयुक्त बेपीकोलंबो मिशन से और सटीक जानकारी मिलने की उम्मीद है। दोनों जांच यान 3 सितंबर को परिवहन मॉड्यूल से अलग हो चुके हैं और मिशन के नवंबर में बुध की कक्षा में पहुंचने का कार्यक्रम है। इसका मेर्टिस उपकरण बुध की सतह के इन्फ्रारेड आंकड़े कहीं अधिक ऊंचे रिजॉल्यूशन में जुटाएगा। इससे वैज्ञानिक यह जांच सकेंगे कि बुध की सतह पर वास्तव में सिलिकॉन डाइऑक्साइड इतना कम है या नहीं और उसके बेहद गर्म ज्वालामुखीय अतीत को और बेहतर ढंग से समझ सकें।
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वैज्ञानिकों के मुताबिक बुध के प्राचीन ज्वालामुखियों से निकला लावा ग्रह के मैंटल के उन गहरे हिस्सों से आया हो सकता है, जहां अत्यधिक तापमान पर ज्यादा मात्रा में चट्टानी पदार्थ पिघला था।ग्रह की ठोस पपड़ी के नीचे मौजूद परत को मैंटल कहा जाता है। किसी ग्रह के शुरुआती दौर में इसका बड़ा हिस्सा पिघला हुआ हो सकता है। जैसे-जैसे यह पिघला हुआ पदार्थ ठंडा होता है, सबसे पहले जमने वाली चट्टानों में सिलिकॉन डाइऑक्साइड की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है। इसके बाद जैसे-जैसे पदार्थ क्रिस्टल के रूप में जमता जाता है, बची हुई पिघली सामग्री में सिलिकॉन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती जाती है।
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इसलिए बुध की सतह पर अपेक्षाकृत कम सिलिकॉन डाइऑक्साइड मिलने का अर्थ यह हो सकता है कि उसका लावा मैंटल के ऐसे गहरे हिस्सों से निकला, जहां बहुत अधिक तापमान पर बड़े पैमाने पर पिघलाव हुआ था। हालांकि वैज्ञानिकों ने एक दूसरी संभावना भी जताई है। हो सकता है कि बुध की शुरुआती पपड़ी में सिलिकॉन डाइऑक्साइड ज्यादा रहा हो और बाद में ग्रह ने ऑक्सीजन खो दी हो।
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आधा मिलीमीटर के कांच के मोतियों से जांच
बुध की चट्टानों के सीधे नमूने पृथ्वी पर उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए वैज्ञानिकों को उसकी सतह की रासायनिक संरचना जानने के लिए दूर से मिले इन्फ्रारेड विकिरण पर निर्भर रहना पड़ता है। इस प्रक्रिया को अधिक सटीक बनाने के लिए शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में करीब आधा मिलीमीटर आकार के छोटे कांच के मोती तैयार किए। इनमें सिलिकॉन डाइऑक्साइड की मात्रा पहले से निश्चित रखी गई और उनके इन्फ्रारेड गुणों को मापा गया।इसके बाद इस तकनीक को पहले चंद्रमा पर परखा गया। चंद्रमा के मामले में वैज्ञानिकों के पास अंतरिक्ष यानों से मिले इन्फ्रारेड आंकड़ों के साथ वास्तविक चंद्र चट्टानों के नमूने भी मौजूद हैं। शोधकर्ताओं ने नासा के लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर से मिले आंकड़ों की तुलना चंद्रमा से लाए गए नमूनों से की। इस परीक्षण से तकनीक की विश्वसनीयता जांचने में मदद मिली।
बेपीकोलंबो से मिल सकती है निर्णायक पुष्टि
तकनीक के सफल परीक्षण के बाद वैज्ञानिकों ने इसे बुध पर लागू किया। पृथ्वी से किए गए बुध के इन्फ्रारेड अवलोकनों, जिनमें अमेरिका के एरिजोना स्थित बोक टेलीस्कोप के आंकड़े भी शामिल हैं, के विश्लेषण से सतह पर करीब 37 प्रतिशत सिलिकॉन डाइऑक्साइड का अनुमान सामने आया।अब वैज्ञानिकों को यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी और जापान की जाक्सा के संयुक्त बेपीकोलंबो मिशन से और सटीक जानकारी मिलने की उम्मीद है। दोनों जांच यान 3 सितंबर को परिवहन मॉड्यूल से अलग हो चुके हैं और मिशन के नवंबर में बुध की कक्षा में पहुंचने का कार्यक्रम है। इसका मेर्टिस उपकरण बुध की सतह के इन्फ्रारेड आंकड़े कहीं अधिक ऊंचे रिजॉल्यूशन में जुटाएगा। इससे वैज्ञानिक यह जांच सकेंगे कि बुध की सतह पर वास्तव में सिलिकॉन डाइऑक्साइड इतना कम है या नहीं और उसके बेहद गर्म ज्वालामुखीय अतीत को और बेहतर ढंग से समझ सकें।