भागवत का ब्रिटेन दौरा: गुरुद्वारे में सिख समुदाय से बातचीत; कहा- संघ के काम का आधार 'शुद्ध सात्विक प्रेम'
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने ब्रिटेन दौरे के दौरान लंदन में ब्रिटिश सिख समुदाय के साथ बातचीत की। उन्होंने कहा, आरएसएस की गतिविधियों का आधार 'घृणा' नहीं, 'शुद्ध सात्विक प्रेम' है। उन्होंने विदेश में रहने वाले हिंदू और भारतीयों की निष्ठा, विकास के साथ पर्यावरण का ध्यान रखने जैसे विषयों पर भी विस्तार से बात की।
विस्तार
अमेरिका के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत लंदन दौरे पर पहुंचे हैं। उन्होंने एक कार्यक्रम के दौरान कहा, संगठन के कार्य का वास्तविक आधार 'शुद्ध सात्विक प्रेम' है। संघ प्रमुख ने उन दावों को खारिज किया जिनमें कहा गया था कि 'घृणा' आरएसएस की गतिविधियों का आधार है। भागवत के मुताबिक 'अपनत्व' की भावना और हिंदू विचार आरएसएस के दृष्टिकोण में केंद्रीय हैं। यह एकात्मता और अपनत्व की भावना व्यक्ति से परिवार, समुदाय, समाज और मानवता तक फैली हुई है।
शुद्ध सात्विक प्रेम और संघ पर क्या बोले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत
भागवत ने कहा कि कुछ लोग मानते हैं कि तीव्र घृणा उनके कार्य का आधार है, जबकि यह बिल्कुल विपरीत है। उन्होंने हिंदू सभ्यता के प्रकृति के साथ गहरे संबंध पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि एक हिंदू केवल एक व्यक्ति नहीं है, बल्कि वह परिवार, समुदाय, समाज और मानवता का भी हिस्सा है। हिंदू प्रकृति से प्रेम करते हैं, केवल उसकी पूजा ही नहीं करते। अपनत्व और प्रेम की यह भावना एकता और चरित्र का आधार बनती है। यह सौ वर्षों के बाद भी आरएसएस के लिए केंद्रीय बनी हुई है। बकौल भागवत, संघ में एक गीत गाया जाता है: 'शुद्ध सात्विक प्रेम अपने कार्य का आधार है।' यह भावना सौ वर्षों में भी क्षीण नहीं हुई है।
उन्होंने कहा कि स्वयंसेवकों के व्यवहार और संघ के वातावरण में वही शुद्ध सात्विक प्रेम देखने को मिलता है। वैश्विक संघर्षों, पारिस्थितिक, आर्थिक चुनौतियों और और डिजिटल युग के असर के बीच हिंदू सभ्यता विश्व को क्या दे सकती है? इस सवाल पर भागवत ने कहा कि हिंदू विचार इस विचार में निहित है कि अस्तित्व मूल रूप से एक है। यह पूरी दुनिया में दिखने वाली विविधता के बावजूद है। विविधताएं स्वाभाविक हैं, इसलिए हमें उन्हें स्वीकार कर, उनका सम्मान करना चाहिए। हमें विविधताओं को ध्यान में रखते समझना होगा कि ये अस्तित्व की एकता में अलग-अलग सजावटें हैं।
मानव विकास और पर्यावरणीय संतुलन पर संघ का नजरिया
बकौल भागवत, एक को अनेक बनना है, इसलिए अनेक का सम्मान किया जाता है। अनेक का सामना व्यावहारिक है, क्योंकि हमें प्रकृति से होकर गुजरना पड़ता है। लेकिन हमें उन्हें अलग नहीं देखना चाहिए। हम एक हैं, सब एक है। उन्होंने तर्क दिया कि मानवता को आपस में जुड़ा हुआ देखने से संघर्षों को सुलझाने में मदद मिल सकती है। इससे प्रतिस्पर्धा और शत्रुता के बजाय दोनों पक्षों को स्वीकार्य समाधानों को प्रोत्साहन मिलेगा। संघ प्रमुख ने मानव विकास को पर्यावरण संरक्षण से भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि कोई भी तरक्की प्रकृति की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। जब हम प्रकृति का हिस्सा हैं, तो हमारी प्रगति से प्रकृति के विस्तार में सहायता मिलनी चाहिए। विकास और प्रकृति में टकराव नहीं, इन्हें पूरक होना चाहिए। उन्होंने कहा कि 'हरित समाधान' का विचार इसी संतुलन को दिखाता है। मानवीय जरूरतें पूरी करने के साथ ही प्रकृति की रक्षा भी करनी चाहिए।
कर्मभूमि के साथ विश्व के प्रति निष्ठा कैसे?
आरएसएस प्रमुख ने विदेश में रहने वाले भारतीयों से जुड़े एक सवाल पर कहा कि लोगों को अपनी 'कर्मभूमि' (कर्तव्य का क्षेत्र) के प्रति प्रतिबद्ध रहते हुए भी भारत में योगदान देना चाहिए। ब्रिटिश स्वयंसेवकों से संघ की अपेक्षाओं पर उन्होंने कहा, यदि ब्रिटिश हिंदू 'अच्छे, पक्के और सच्चे हिंदू' हैं, तो ब्रिटेन और भारत के हितों के बीच कोई संघर्ष नहीं होगा। यदि ऐसा होता भी है, तो यह स्पष्ट है कि ब्रिटिश हिंदू ब्रिटेन का साथ देंगे। उन्होंने कहा, आपकी कर्मभूमि वही है जहां आपकी निष्ठा है। जन्मभूमि (जन्म स्थान) से आपको अपने मूल्य मिलते हैं, और आप उन मूल्यों को अपनी कर्मभूमि में लागू करते हैं। हिंदुत्व कभी भी आपको अपनी कर्मभूमि को धोखा देने के लिए नहीं कहता। आरएसएस प्रमुख के अनुसार, हिंदू सभ्यता स्पष्ट रूप से प्रतिस्पर्धी विचारों में सामंजस्य का प्रयास करता है। इसमें व्यक्तिगत अधिकार और सामाजिक उत्तरदायित्व, साथ ही मानव विकास और पर्यावरण संरक्षण आदि विषय शामिल हैं।
ब्रिटेन दौरे पर कैसा रहा भागवत का कार्यक्रम
इससे पहले ब्रिटिश सिख समुदाय बीच पहुंचे मोहन भागवत के संबंध में राज्यसभा सांसद विक्रमजीत सिंह साहनी ने बताया कि भागवत अपने विदेश दौरे के अंतिम चरण में ब्रिटेन पहुंचे हैं। उन्होंने इसी सप्ताह लंदन के ऐतिहासिक खालसा जत्था ब्रिटिश आइल्स गुरुद्वारा साहिब का दौरा किया। साहनी के मुताबिक, 'मोहन भागवत ने रुमाला साहिब भेंट किया, कड़ा प्रसाद ग्रहण किया और गुरुद्वारा प्रबंधन के साथ सार्थक बातचीत की।
- आइल्स गुरुद्वारा साहिब भारत के बाहर सबसे पुराने गुरुद्वारों में से एक है और 1908 से अस्तित्व में है।
- श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर मोहन भागवत लंदन के विल्सडन स्थित श्री स्वामीनारायण मंदिर भी पहुंचे।
- आरएसएस की केंद्रीय कार्यकारिणी के सदस्य सुनील आंबेकर के मुताबिक लंदन में 1966 में ब्रिटेन में स्थापित एक हिंदू सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन ने भागवत के कार्यक्रम का आयोजन किया।
- आंबेकर के अनुसार, मोहन भागवत के ब्रिटेन दौरे का मकसद हिंदुत्व को लेकर दुनिया में मौजूद गलतफहमियों को दूर करना है।
- यात्रा का उद्देश्य पश्चिमी देशों के शिक्षाविदों, सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों के साथ भारत को लेकर गहरी सभ्यतागत बातचीत करना भी है।
प्रमुख का विदेश दौरा क्यों, आरएसएस की प्राथमिकताएं क्या?
गौरतलब है कि लंदन में 'एकात्मता का उत्सव' विषय के तहत जिस कार्यक्रम में भागवत ने शिरकत की वह आरएसएस के शताब्दी समारोह और उसके व्यापक विदेशी संपर्क कार्यक्रम का हिस्सा है। इस कार्यक्रम की शुरुआत हिंदू स्वयंसेवक संघ यूके (HSS UK) ने इंटीग्रल के समर्थन से की थी। भागवत इससे पहले अमेरिका के न्यूयॉर्क और कनाडा के टोरंटो में भी ऐसे ही कार्यक्रमों को संबोधित कर चुके हैं। 1925 में भारत में स्थापित आरएसएस इस वर्ष अपनी शताब्दी मना रहा है। शताब्दी समारोह के हिस्से के रूप में, संगठन ने व्यापक सामाजिक लाभ के मकसद से पांच प्राथमिकताओं को रेखांकित किया है। संघ की प्राथमिकताएं सामाजिक समरसता, पारिवारिक मूल्यों को मजबूत करना, पर्यावरण को लेकर उत्तरदायित्व का बोध, आत्मनिर्भरता और नागरिक उत्तरदायित्व हैं।
आरएसएस के वैश्विक संवाद का विस्तार
अप्रैल 2026 में आरएसएस के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने यूनाइटेड किंगडम, अमेरिका और जर्मनी का दौरा कर संघ के विचारों से पूरी दुनिया को अवगत कराया था। आरएसएस के मुताबिक उनका सभ्यतागत दृष्टिकोण 'वसुधैव कुटुंबकम्' यानी 'विश्व एक परिवार है' पर आधारित है।
पश्चिमी देशों में हिंदुत्व को लेकर गलतफहमियां दूर करने का प्रयास
आरएसएस के प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने भी संघ और देश को लेकर एक बयान में कहा, भारत एक 'सांस्कृतिक अवधारणा' है, न कि कठोर राजनीतिक राष्ट्र-राज्य। उन्होंने कहा कि हिंदुत्व सभी धार्मिक परंपराओं का सम्मान और स्वीकार करता है। बकौल आंबेकर, बहुत सारी गलतफहमियों को दूर करने का प्रयास हो रहा है। हिंदुत्व किसी धर्म की तरह नहीं है।यह ऐसी अवधारणा है, जिसमें किसी भी तरह के धर्म या सभी धार्मिक परंपराओं की सच्चाई के प्रति सम्मान और विश्वास है। यही हिंदुत्व है, यही भारत है।