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फोर्ट हुड केस: 13 लोगों की हत्या के दोषी निडाल हसन को 3 दिसंबर को मिलेगी सजा-ए-मौत, क्या है फायरिंग स्क्वाड?

Wed, 07 Oct 2026 08:15 AM IST
प्रशांत तिवारी वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला Published by: प्रशांत तिवारी Updated Wed, 07 Oct 2026 08:15 AM IST
सार
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मेरिका के फोर्ट हुड सैन्य अड्डे पर 2009 में 13 लोगों की हत्या के दोषी पूर्व सैन्य मनोचिकित्सक निडाल मलिक हसन को 3 दिसंबर को फायरिंग स्क्वॉड से मौत की सजा देने की घोषणा की गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसकी मंजूरी दे दी है, लेकिन हसन की संभावित कानूनी अपील से सजा पर अमल में देरी हो सकती है।

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Nidal Hasan set to executed by firing squad on December 3 this will first instance in US military since 1961
निडाल मलिक हसन - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

अमेरिका के टेक्सास स्थित फोर्ट हुड सैन्य अड्डे पर साल 2009 में गोलीबारी कर 13 लोगों की जान लेने वाले पूर्व सैन्य अधिकारी निडाल मलिक हसन को 3 दिसंबर को मौत की सजा दी जाएगी। अमेरिकी सेना के कार्यवाहक सचिव एडम टेल ने मंगलवार को सोशल मीडिया पर इसकी जानकारी दी। हसन को फायरिंग स्क्वॉड यानी गोली मारकर मौत की सजा दी जाएगी। अमेरिकी सेना में 1961 के बाद से किसी को भी मौत की सजा नहीं दी गई है। ऐसे में यह मामला एक बार फिर अमेरिका की सैन्य न्याय व्यवस्था को चर्चा में ले आया है।

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ट्रंप की मंजूरी के बाद आगे बढ़ी सजा की प्रक्रिया
पेंटागन के प्रवक्ता सीन पार्नेल ने सोमवार को बताया था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हसन को मौत की सजा देने की मंजूरी दे दी है। इसके बाद सेना ने सजा को अमल में लाने की दिशा में जरूरी प्रक्रियाएं शुरू कर दी हैं। कार्यवाहक सेना सचिव एडम टेल के मुताबिक, सजा टेक्सास के फोर्ट हुड सैन्य अड्डे पर ही दी जाएगी, जहां हसन ने 2009 में इस जानलेवा हमले को अंजाम दिया था।
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मेडिकल जांच कराने पहुंचे सैनिकों पर बरसाई थीं गोलियां
नवंबर 2009 में निडाल हसन फोर्ट हुड के एक मेडिकल भवन में पहुंचा था। उस समय वहां सैनिक अपनी स्वास्थ्य जांच कराने के लिए मौजूद थे। हसन ने अचानक गोलीबारी शुरू कर दी। हमले के दौरान उसने 'अल्लाहु अकबर' कहा, जिसका अर्थ है 'ईश्वर महान है'। उसने लेजर साइट वाली पिस्तौल से गोलियां चलाईं। इस हमले में 13 लोगों की मौत हो गई, जबकि 30 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। इस घटना ने पूरे अमेरिका को झकझोर कर रख दिया था।
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अदालत में खुद को बताया था 'पाला बदलने वाला सैनिक'
हसन अमेरिकी सेना में मनोचिकित्सक के पद पर तैनात था। मुकदमे के दौरान उसने अपने बचाव में बहुत कम दलीलें दीं। उसने जूरी से कहा था कि सबूत यह साबित कर देंगे कि गोली चलाने वाला वही था। उसने खुद को ऐसा सैनिक बताया था, जिसने अपना पक्ष बदल लिया है। हसन ने यह भी कहा था कि उसका मकसद सैनिकों को अफगानिस्तान जाने और वहां अपने साथी मुसलमानों को मारने से रोकना था। उसके इस बयान ने मामले को और भी संवेदनशील बना दिया था।

मौत की सजा पर कानूनी अड़चनें अभी भी बाकी
राष्ट्रपति ट्रंप की मंजूरी मिलने के बाद भी हसन की सजा पर अमल करना इतना आसान नहीं है। अमेरिकी सैन्य कानून के तहत जरूरी प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। इसके अलावा, हसन के पास नागरिक संघीय अदालत में हैबियस कॉर्पस याचिका दायर करने का विकल्प भी है। इस कानूनी प्रक्रिया के जरिए वह अपनी हिरासत या सजा को चुनौती दे सकता है। मई में 'आर्मी लॉयर' पत्रिका में प्रकाशित एक लेख के मुताबिक, अगर हसन इस रास्ते का इस्तेमाल करता है, तो फांसी की प्रक्रिया रुक सकती है और मामला कई साल तक खिंच सकता है। ऐसे में 3 दिसंबर की तारीख तय होने के बावजूद यह देखना बाकी है कि सजा निर्धारित समय पर दी जा सकेगी या नहीं।

क्या है फायरिंग स्क्वॉड?
फायरिंग स्क्वॉड मौत की सजा देने का एक तरीका है, जिसमें प्रशिक्षित सैनिकों या निशानेबाजों का एक दल दोषी व्यक्ति पर एक साथ गोलियां चलाता है। सरल शब्दों में, एक व्यक्ति को सामने रखकर कई शूटर उस पर गोली चलाते हैं, जिससे उसकी मौत हो जाती है। इसे अंग्रेजी में फायरिंग स्क्वॉड कहा जाता है। यह तरीका कई देशों में ऐतिहासिक रूप से इस्तेमाल हुआ है और आज भी कुछ जगहों पर कानूनी रूप से मौजूद है। अमेरिका में यह तरीका बेहद दुर्लभ है।


ये भी पढ़ें: 17 साल बाद होगा फोर्ट हूड कांड का अंत: निडाल हसन की मौत की सजा पर ट्रंप की मुहर, क्या अब भी रुक सकता है फैसला?

61 साल से क्यों नहीं हुई अमेरिकी सेना में मौत की सजा?
अमेरिकी सेना ने आखिरी बार 1961 में किसी दोषी को मौत की सजा दी थी। उसके बाद से सैन्य मामलों में मृत्युदंड को अमल में नहीं लाया गया। हसन के मामले में राष्ट्रपति की मंजूरी और फायरिंग स्क्वॉड से सजा देने की घोषणा के बाद यह सवाल फिर उठने लगा है कि क्या अमेरिकी सेना छह दशक से ज्यादा समय बाद मृत्युदंड की प्रक्रिया पूरी कर पाएगी। हालांकि, अंतिम फैसला कानूनी प्रक्रियाओं और संभावित अपीलों पर भी निर्भर करेगा।

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