इकोनॉमी: विकास, प्रवाह व मूल्यांकन में सामांजस्य से भारत की आर्थिक स्थिति मजबूत बन रही है, रिपोर्ट में दावा
एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के घरेलू बुनियादी कारणों जिसमें कंपनियों की आय में वृद्धि, ऋण में मांग बने रहने से बढ़ोतरी और संस्थागत प्रवाह स्थिर रहने के साथ ही विकास, प्रावह और मूल्यांकन में सामांजस्य स्थापित होने से देश की अर्थव्यवस्था को गति मिल रही है।
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पश्चिम एशिया में तनाव फिर बढ़ने, होर्मुज तनाव से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने और एआई व्यापार में कमी के बाद भी घरेलू बाजार में गति बनी हुई है। पीएल असेट मैनेजमेंट ने अपनी मासिक रिपोर्ट में इसकी जानकारी दी है। भारत के घरेलू बुनियादी कारणों जिसमें कंपनियों की आय में वृद्धि, ऋण में मांग बने रहने से बढ़ोतरी और संस्थागत प्रवाह स्थिर रहने के साथ ही विकास, प्रावह और मूल्यांकन में सामांजस्य स्थापित होने से देश की अर्थव्यवस्था को गति मिल रही है।
रिपोर्ट के अनुसार जुलाई का महीना ईरान के साथ बिगड़े युद्धविराम और होर्मुज स्ट्रेट में नए सिरे से उत्पन्न व्यवधानों से प्रभावित रहा। जबकि मई में हुए समझौते के तहत टैंकरों का आवागमन कुछ समय के लिए बहाल हुआ, लेकिन महीने के दौरान ही यह विफल हो गया। जहाजों पर नए तरह से हमले, नाकाबंदी की वजह से कच्चे तेल के दाम मार्च के बाद 80 से 120 डॉलर प्रति बैरल के व्यापक दायरे में है।
घरेलू बुनियादी ढांचे अस्थिर बाहरी परिदृश्य के बावजूद भी स्थिर बने हुए हैं
रिपोर्ट का दावा है, अमेरिका की मुद्रास्फीति सालाना आधार पर कम हुई है। जिसकी वजह से निकट भविष्य में अमेरिकी फैडरेल बैंक के अध्यक्ष केविन वॉर्श किसी प्रकार की कार्रवाई की उम्मीद कम कर दी है। इसके परिणामस्वरूप वैश्विक बाजारों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला। जुलाई में हैंग सेंग 13.13 प्रतिशत बढ़ा, जबकि कोरपी 22.19 प्रतिशत गिरा, नैस्डैक 100 में 6.61 प्रतिशत की गिरावट आई। वहीं निक्केई 225 में 8.14 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।
रिपोर्ट के अनुसार कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और सेमीकंडक्टर आधारित व्यापार में व्यापक गिरावट देखी गई, जिसने साल के शुरुआत में कई एशियाई बाजारों को गति प्रदान की थी। इस दौरान निफ्टी 50 में इसी महीने की तुलना में 2.17 प्रतिशत की वृद्धि हुई और जुलाई के अंत में यह 24,383.60 पर बंद हुआ, जबकि रुपया डॉलर के मुकाबले 95.42 पर रहा। रिपोर्ट कहती है, भारत के घरेलू बुनियादी ढांचे अस्थिर बाहरी परिदृश्य के बावजूद भी स्थिर बने हुए हैं।
विदेशी निवेश में बदलाव के साथ घरेलू खरीदारी जारी
रिपोर्ट कहती है, विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के लिए कई बदलाव किए जाने के बाद भी घरेलू संस्थागत निवेशकों (म्यूचुअल फंड्स, बीमा कंपनियों और पेंशन फंड) ने जुलाई में लगातार 37 महीनों तक शुद्ध खरीदारी जारी रखी, जो 2007 से अब तक का सबसे लंबा सिलसिला है। उन्होनें पूरे महीने विदेशी बिकवाली को अवशोषित करना जारी रखा।
कंपनियों की आय में तेजी से वृद्धि
रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में कंपनियों की आय में उल्लेखनीय उछाल आया है। सूचीबद्ध कंपनियों के औसत ईपीएस में वार्षिक आधार पर 24 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो पिछले तिमाही में मात्र छह प्रतिशत थी। रिपोर्ट बताती है, कंपनियों की बिक्री, परिचालन लाभ और पीएटी तीनों में एक साथ वृद्धि हुई है। वहीं औद्योगिक उत्पादन भी लगभग दो वर्षों में अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया, जिसमें पूंजीगत वस्तुओं और बिजली उपकरणों का उत्पाद सबसे अधिक रहा है। ये, यह दर्शाता है कि अर्थव्यवस्था में सुधार निवेश आधारित हैं, न कि केवल उपभोग पर आधारित है।
मैक्रो इकोनॉमिक संकेतक भी सहायक
रिपोर्ट के अनुसार पिछले पांच वर्षों में तीन स्वतंत्र डेटा शृंखलाएं औसत से काफी आगे चल रही हैं। यह आंकड़ों से अधिक व्यापक संकेत हैं। जून में औद्योगिक उत्पादन (आईआईपी) में 7.3 प्रतिशत की वृद्धि, जबकि पिछले पांच वर्षों का औसत लगभग 5.5 प्रतिशत रहा। जुलाई में बैंक ऋणों में 17.7 प्रतिशत की वृद्धि जबकि औसत लगभग 11.5 प्रतिशत रहा। जीएसटी संग्रह में 15.4 प्रतिशत की वृद्धि, जो लगभग 10.0 प्रतिशत के औसत के मुकाबले 14 महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। वहीं मुद्रास्फीति में कमी, बॉन्ड यील्ड घटकर 6.77 प्रतिशत पहुंच गई, साथ ही भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा चौथी बार ब्याज दर को 5.25 पर स्थिर बनाए रखने के फैसलों से भारत की अर्थव्यवस्था में बल मिला है।
रिपोर्ट भारतीय शेयर बाजार को लेकर सकारात्मक रुख पेश करती है। औद्योगिक उत्पाद और ऋण कई वर्षों के उच्चतम स्तर पर हैं, वहीं आय वृद्धि दर नई तिमाही में लगभग शून्य से बढ़कर 24 प्रतिशत हो गई है। हालांकि डॉलर के संदर्भ में निफ्टी ने वैश्विक शेयर बाजारों की तुलना में काफी खराब प्रदर्शन किया है। बावजूद इसके घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीदारी, विदेशी निवेशकों के रुख में सकारात्मक संकेत दे रहे हैं। आने वाले समय में मुख्य निर्णायक कारण बाहरी रहेंगे, तेल, मुद्रा और अगले कुछ तिमाहियों तक आय में वृद्धि का बने रहना ही आर्थिक स्थिति की दिशा तय करेंगे।