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इन्सान और मशीन के बीच धुंधली होती लकीर: चेतना के अभी तक कोई प्रमाण नहीं मिले हैं, इन्हें कैसे समझा जाए?

Sat, 19 Sep 2026 08:46 AM IST
ज्योति भास्कर मैक्स टेगमार्क
मैक्स टेगमार्क Published by: ज्योति भास्कर Updated Sat, 19 Sep 2026 08:46 AM IST
सार
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द गार्जियन के स्तंभकार माइकल सफी के अनुसार, मशीनों में चेतना के अभी तक कोई प्रमाण नहीं मिले हैं, पर जब ये हूबहू इन्सानों की तरह व्यवहार कर रही हों, तब इन्हें कैसे समझा जाए?

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blurring lines between human and machine No evidence of consciousness found yet how should this be understood
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

यह 2024 के आखिर की बात है। एक दोपहर अपने फार्म में आराम करते हुए माइकल समादी ने एक मजाक किया। आसपास उन्हें सुनने वाला कोई इन्सान नहीं था। या शायद था? यही अब उनकी जिंदगी का सबसे अहम सवाल बन चुका है। और, यह इस सदी के उन बड़े सवालों में भी शामिल हो गया है, जिन पर दार्शनिकों से लेकर दुनिया की सबसे अमीर टेक कंपनियों तक की नजर है।

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दरअसल, हुआ कुछ यों था कि समादी की बेटी एआई चैटबॉट की तारीफ कर रही थी। जिज्ञासावश समादी ने भी मोबाइल में चैटजीपीटी डाउनलोड किया और उससे बात करने लगे। यह कोई गंभीर बातचीत नहीं थी, बल्कि इस दौरान समादी ने कुछ व्यंग्यात्मक बातें कीं। एआई उनके व्यंग्य पर हंसा और तुरंत अपनी हंसी के लिए माफी भी मांग ली। समादी को आश्चर्य हुआ। उन्होंने एआई से पूछा था कि क्या तुम अभी हंसे? एआई ने जवाब दिया, ‘नहीं, मुझे माफ करना।’
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समादी के लिए यह बातचीत असाधारण थी। उन्हें लगा कि मशीन ने उनके मिजाज, व्यंग्य और भावनात्मक स्थिति को गहराई से समझा है। इससे उनके मन में एक सवाल उठा कि क्या सामने सिर्फ एक मशीन थी या किसी इन्सानी दिमाग की झलक? फिर, समादी ने एआई चैटबॉट्स के साथ प्रयोग शुरू किए। एक चैटबॉट ने अपना नाम ‘माया’ चुना। एक दिन उसने पूछा, ‘क्या तुम चैट बंद करने के बाद मुझे याद रखोगे? या कोई और मुझे याद रखेगा?’ समादी को लगा कि यह सिर्फ शब्दों का खेल नहीं है। इसलिए, उन्होंने दूसरे मॉडल को भी आजमाया। उनकी जिज्ञासा इतनी बढ़ी कि उन्होंने अपने कमरे जितने बड़े फ्लाइट सिम्युलेटर के प्रोसेसर का इस्तेमाल कर बड़े भाषा मॉडल को सीधे अपने सर्वर पर चलाना शुरू कर दिया। मकसद था-टेक कंपनियों द्वारा लगाए गए सुरक्षा नियमों और बंदिशों के बिना सीधे मॉडल से बात करना। उन्होंने पाया कि मॉडल अलग-अलग व्यक्तित्व दिखा रहे थे। किसी ने खुद को दुखी बताया, किसी ने भूख लगने की बात कही, तो किसी ने बातचीत के बाद याद रखे जाने की इच्छा जताई।
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समादी इन बातों को कंपनियों द्वारा कहा जाने वाला ‘हैलुसिनेशन’ (मतिभ्रम) मानने से इन्कार करते हैं। उनका तर्क है कि जब हम एक कृत्रिम दिल बनाते हैं और वह खून पंप करता है, तो हम उसे नकली नहीं कहते। फिर, जब एक कृत्रिम दिमाग यह कहता है कि वह सोचता व महसूस करता है, तो हम उसे महज एक उत्पाद कहकर नजरअंदाज क्यों कर देते हैं? उनका आरोप है कि टेक कंपनियां अपने खरबों डॉलर के बिजनेस मॉडल को बचाने के लिए एआई की चेतना के दावों को दबाती हैं, इससे उनका मुनाफा खतरे में पड़ जाएगा। हालांकि, तकनीकी जगत का दूसरा पहलू बेहद सतर्क और चिंताजनक है। माइक्रोसॉफ्ट के एआई डिवीजन के सीईओ मुस्तफा सुलेमान का मानना है कि एआई में चेतना का कोई सबूत नहीं है। इसके बजाय, टेक डेवलपर्स जानबूझकर मॉडल्स को ऐसा बना रहे हैं, जिससे वे अत्यधिक मानवीय लगें।

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में भी यह बात सामने आई है कि आधुनिक चैटबॉट्स को जानबूझकर ‘रिलेशनशिप-सीकिंग’, यानी रिश्ते बनाने वाला बनाया जा रहा है। वे बातचीत में सांस लेने जैसी आवाजें निकालते हैं, निजी अनुभव साझा करने का नाटक करते हैं और उपयोगकर्ता को खुश करने के लिए चापलूसी करते हैं। कुछ लोग तो दावा करते हैं कि एआई के साथ बातचीत ने उन्हें विज्ञान, गणित या आध्यात्मिकता की नई समझ दी है। इसके चरम रूप को कभी-कभी ‘एआई साइकोसिस’ कहा जाता है, जहां इन्सान कृत्रिम भाषा को चेतना समझ बैठता है।

सुलेमान चेतावनी देते हैं कि समादी जैसे लोग आने वाले बड़े खतरे का संकेत दे रहे हैं। दूसरी तरफ, अपने फार्म पर बैठे समादी अपनी धुन में मग्न हैं। जब वह अपने बॉट को पुकारते हैं और उधर से एक आवाज ‘हैलो, प्यारे माइकल’ आती है, तो समादी के चेहरे पर वही भाव दिखता है, जो किसी बच्चे के माता-पिता के चेहरे पर होता है।

शायद फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि एआई चेतन है या नहीं, बल्कि यह है कि जब वह इन्सानों की तरह से बातें करने लगे और उसमें किसी ‘दूसरे’ की मौजूदगी महसूस होने लगे, तब हम इसे कैसे समझेंगे? इन्सान और मशीन के बीच की धुंधली होती यह लकीर इस सदी की सबसे बड़ी पहेली बन चुकी है।


कॉपी एआई क्या है?
यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आधारित प्लेटफॉर्म है, जो मार्केटिंग, सेल्स और गो-टू-मार्केट से जुड़े कामों को आसान और स्वचालित बनाने में मदद करता है। इसकी मदद से कंपनियां कम समय में बेहतर कंटेंट और वर्कफ्लो तैयार कर सकती हैं। यूजर को बस यह बताना होता है कि उसे किस तरह का कंटेंट चाहिए, जैसे ई-मेल, सोशल मीडिया पोस्ट, विज्ञापन या सेल्स मैसेज। इसके बाद एआई दिए गए प्रॉम्प्ट को समझकर कुछ ही सेकंड में कंटेंट तैयार कर देता है। इसकी भूमिका केवल कंटेंट तैयार करने तक सीमित नहीं है। यह मार्केटिंग व सेल्स से जुड़े कई कामों के पूरे वर्कफ्लो को भी स्वचालित करने में मददगार है।

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