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ब्रिक्स सम्मेलन : तिरुक्कुरल और रामनाथस्वामी मंदिर के बहाने भारतीय ज्ञान और स्थापत्य परंपरा की चर्चा

Sat, 12 Sep 2026 04:49 PM IST
विनोद पाठक लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: विनोद पाठक Updated Sat, 12 Sep 2026 04:49 PM IST
सार
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ब्रिक्स जैसे वैश्विक मंच पर तिरुक्कुरल जैसी कालजयी कृति को रूसी भाषा में प्रस्तुत करना और भारतीय स्थापत्य एवं सांस्कृतिक प्रतीकों को प्रमुखता देना इसी व्यापक दृष्टि की ओर संकेत करता है।

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BRICS Summit 2026: How India Showcased Tirukkural and Its Ancient Heritage on the Global Stage
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

अंतरराष्ट्रीय संबंधों का मंच केवल द्विपक्षीय वार्ताओं, रणनीतिक चर्चाओं और आर्थिक समझौतों तक सीमित नहीं होता। यह किसी राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना, दार्शनिक ऊंचाई और धरोहर को वैश्विक पटल पर सामने रखने का भी सशक्त माध्यम है। नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से जुड़े कार्यक्रमों के दौरान भारत की सांस्कृतिक कूटनीति के दो ऐसे उदाहरण सामने आए, जिन्होंने दुनिया का ध्यान भारत की समृद्ध परंपराओं की ओर खींचा।

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एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को महान तमिल ग्रंथ 'तिरुक्कुरल' का रूसी भाषा में अनुवादित संस्करण भेंट किया, वहीं दूसरी ओर शिखर सम्मेलन से जुड़े आयोजन में भारत की सांस्कृतिक विरासत और स्थापत्य परंपरा को भी प्रमुखता दी गई। 
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यह केवल औपचारिक उपहार या सजावटी व्यवस्था भर नहीं है। इसके पीछे विश्व मंच पर भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा, नैतिक दर्शन और सांस्कृतिक विरासत को सामने रखने का भाव दिखाई देता है। यह घटनाक्रम बताता है कि भारत की सांस्कृतिक सामर्थ्य की जड़ें उसकी उस प्राचीन विरासत में हैं, जिसने सदियों से मानव जीवन में न्याय, करुणा, सुशासन और आत्मानुशासन जैसे मूल्यों को महत्व दिया है।
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तिरुक्कुरल कालजयी ग्रन्थ

 

तमिल भाषा और साहित्य के महान संत-कवि तिरुवल्लुवर द्वारा रचित 'तिरुक्कुरल' केवल दक्षिण भारत या भारत तक सीमित ग्रंथ नहीं है। यह मानव जीवन के नैतिक और व्यावहारिक पक्षों पर विचार करने वाला एक कालजयी ग्रंथ है। इसकी रचना का काल निश्चित रूप से तय नहीं है, लेकिन इसे लगभग दो हजार वर्ष पुरानी तमिल साहित्यिक परंपरा का महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। 'तिरु' का अर्थ पवित्र या सम्मानसूचक है, जबकि 'कुरल' संक्षिप्त छंद की ओर संकेत करता है। 1,330 कुरलों में तिरुवल्लुवर ने जीवन के गहरे सत्यों, नैतिक मूल्यों और सामाजिक व्यवहार को बेहद संक्षिप्त और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है।


तिरुक्कुरल की विशेषता

 

तिरुक्कुरल की सबसे बड़ी विशेषताओं में इसका व्यापक और सर्वसमावेशी चरित्र है। यह किसी एक संकीर्ण धार्मिक या सामाजिक दायरे तक सीमित नहीं है। इसमें नैतिकता, सामाजिक जीवन, शासन, अर्थव्यवस्था, मानवीय संबंधों और प्रेम जैसे विषयों पर विचार किया गया है। इसी व्यापकता के कारण इसे दुनिया की अनेक भाषाओं में अनूदित किया गया है। तमिलनाडु सरकार और विभिन्न संस्थानों के प्रयासों से इसके अनेक भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुए हैं।

तीन प्रमुख भागों में ढांचा

 

तिरुक्कुरल का पूरा ढांचा तीन प्रमुख भागों अरम, पोरुल और इन्बम में विभाजित है। पहला भाग 'अरम' सदाचार और नैतिक जीवन से संबंधित है। इसके 38 अध्यायों में सत्य, अहिंसा, दया, कृतज्ञता, आत्मसंयम और करुणा जैसे विषयों पर विचार किया गया है। तिरुवल्लुवर के विचार में सच्चा धर्म केवल बाहरी अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि व्यक्ति के आचरण और मन की पवित्रता में दिखाई देता है। छल-कपट से दूर रहना और सभी जीवों के प्रति दया रखना ही वास्तविक नैतिकता का आधार है।

 

दूसरा भाग 'पोरुल' है, जिसमें 70 अध्यायों के माध्यम से राज्य व्यवस्था, प्रशासन, नेतृत्व, कूटनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन पर विचार किया गया है। यह हिस्सा आधुनिक शासन और राजनीति के संदर्भ में भी विशेष रूप से महत्वपूर्ण दिखाई देता है। इसमें आदर्श शासक के गुणों, मंत्रियों की योग्यता, न्याय, सुरक्षा, मित्रता और राज्य संचालन जैसे विषयों पर व्यावहारिक दृष्टि मिलती है।

तिरुवल्लुवर के अनुसार एक अच्छे राज्य में जनता को भूख, बीमारी और असुरक्षा से बचाने की जिम्मेदारी शासक की होती है। तीसरा भाग 'इन्बम' या 'कामत्तुपाल' है, जिसमें 25 अध्याय हैं। इसमें प्रेम, मानवीय भावनाओं, गृहस्थ जीवन और दांपत्य संबंधों का काव्यात्मक चित्रण मिलता है। यह बताता है कि भारतीय चिंतन परंपरा में मानव जीवन के सांसारिक पक्ष और भावनात्मक संबंधों को भी गंभीरता से देखा गया है।

पोरुल खंड का महत्व

 

अंतरराष्ट्रीय संबंधों और आधुनिक राजनीति के दृष्टिकोण से तिरुक्कुरल का 'पोरुल' खंड विशेष महत्व रखता है। आज जब दुनिया युद्ध, आर्थिक असमानता, राजनीतिक अस्थिरता और अविश्वास जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, तब तिरुवल्लुवर का सुशासन, न्याय और जिम्मेदार नेतृत्व पर जोर और भी प्रासंगिक लगता है। दुनिया के नेताओं के सामने इस ग्रंथ को रखना भारत की उस सांस्कृतिक कूटनीति का हिस्सा माना जा सकता है, जिसमें भारत केवल व्यापार और रणनीतिक साझेदारी की बात नहीं करता, अपितु अपनी विचार-संपदा को भी दुनिया के साथ साझा करता है।

 

तिरुक्कुरल भारत की विचार-संपदा और अमूर्त ज्ञान-परंपरा का प्रतीक है तो तमिलनाडु के रामेश्वरम में स्थित रामनाथस्वामी मंदिर भारत की दृश्य वास्तुकला, स्थापत्य कला और धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा की निरंतरता का जीवंत उदाहरण है। यह मंदिर रामेश्वरम द्वीप पर स्थित है और हिंदू आस्था के प्रमुख तीर्थस्थलों में गिना जाता है। यह 12 ज्योतिर्लिंग मंदिरों में से एक है।

रामनाथस्वामी मंदिर का स्थान

 

सनातन परंपरा में रामनाथस्वामी मंदिर का स्थान विशेष है। इसे चार धामों में से एक रामेश्वरम से भी जोड़ा जाता है। भारतीय धार्मिक परंपरा में काशी और रामेश्वरम के बीच एक विशेष आध्यात्मिक संबंध माना जाता है। काशी से गंगाजल लाकर रामेश्वरम में अभिषेक करने की परंपरा भी इसी सांस्कृतिक संबंध को दर्शाती है। यह परंपरा इस बात का प्रतीक है कि भौगोलिक रूप से विशाल और विविधताओं से भरा भारत लंबे समय से तीर्थ परंपराओं और सांस्कृतिक संबंधों के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़ा रहा है।

 

पौराणिक कथाओं के अनुसार रावण का वध करने के बाद भगवान राम ने समुद्र तट पर भगवान शिव की पूजा के लिए शिवलिंग स्थापित करने का संकल्प लिया। मान्यता है कि हनुमान जी कैलाश से शिवलिंग लाने गए थे, लेकिन उनके लौटने में विलंब हुआ। तब माता सीता ने रेत से शिवलिंग बनाया, जिसकी पूजा भगवान राम ने की। इसे 'रामलिंगम' कहा जाता है। बाद में हनुमान द्वारा लाए गए शिवलिंग की भी स्थापना की गई। यह कथा भारतीय परंपरा में शैव और वैष्णव आस्थाओं के सुंदर समन्वय का प्रतीक मानी जाती है।

द्रविड़ स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण

 

रामनाथस्वामी मंदिर द्रविड़ स्थापत्य कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसका निर्माण और विस्तार कई शताब्दियों में विभिन्न शासकों और राजवंशों के संरक्षण में हुआ। मंदिर की सबसे बड़ी वास्तुशिल्पीय विशेषताओं में इसके विशाल गलियारे शामिल हैं। लगभग 1,200 मीटर लंबा यह गलियारा 1,212 अलंकृत स्तंभों के लिए प्रसिद्ध है। इन स्तंभों पर की गई बारीक नक्काशी तत्कालीन शिल्पकारों की दक्षता और स्थापत्य कौशल को दर्शाती है। मंदिर परिसर में 22 पवित्र कुएं भी हैं, जिनका धार्मिक महत्व विशेष है।

 

रामनाथस्वामी मंदिर की वास्तुकला और उसकी सांस्कृतिक महत्ता को अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में भारत की विरासत के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह देश की आधुनिक पहचान को उसकी प्राचीन जड़ों से जोड़ता है। भारत आज तकनीक, अर्थव्यवस्था, विज्ञान और रणनीतिक क्षमता के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है, लेकिन उसकी पहचान केवल आधुनिक उपलब्धियों से नहीं बनती। उसके पीछे हजारों वर्षों की सभ्यता, दर्शन, साहित्य, कला और स्थापत्य की एक लंबी परंपरा भी है।


ग्रन्थ को रूसी भाषा प्रस्तुत करना
 

ब्रिक्स जैसे वैश्विक मंच पर तिरुक्कुरल जैसी कालजयी कृति को रूसी भाषा में प्रस्तुत करना और भारतीय स्थापत्य एवं सांस्कृतिक प्रतीकों को प्रमुखता देना इसी व्यापक दृष्टि की ओर संकेत करता है। यह संदेश देता है कि भारत दुनिया से संवाद करते समय केवल आर्थिक और रणनीतिक हितों की भाषा नहीं बोलता। वह अपनी सभ्यता की उस विचार-संपदा को भी सामने रखता है, जिसमें मानवता, नैतिकता, सुशासन और सांस्कृतिक विविधता के लिए महत्वपूर्ण संदेश निहित हैं।

 

यही भारत की सांस्कृतिक कूटनीति की वास्तविक शक्ति है। आधुनिक भारत जब वैश्विक मंच पर खड़ा होता है तो उसके साथ केवल उसकी आर्थिक ताकत नहीं होती, बल्कि तिरुवल्लुवर का चिंतन, रामेश्वरम की स्थापत्य परंपरा और सदियों पुरानी भारतीय सभ्यता की स्मृति भी साथ होती है। यही विरासत भारत को विश्व के सामने केवल एक उभरती हुई शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक गहरी और जीवंत सभ्यतागत परंपरा वाले राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करती है।



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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