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देव की डायरी: कोई मजनू अब भटकता नहीं, लोकेशन मांग लेता है.!

देव प्रकाश चौधरी देव प्रकाश चौधरी
Updated Fri, 25 Sep 2026 03:20 PM IST
सार
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Technology and Human Life: मनुष्य जब बहुत अधिक आधुनिक होने लगता है, तो वह सबसे पहले अपने भटकने का सौंदर्य खो बैठता है। ‘लोकेशन भेजने और पाने’ के इस स्वर्णिम काल में हम न तो भटक रहे हैं और न ही यह कह पा रहे हैं, “बस, आपके घर के मोड़ पर ही खड़ा हूं!” प्रेम के अपार संसार में अब न कोई रांझा रास्ता भूलेगा, न कोई मजनू सहरा में भटक सकता है। मजनू अगर आज के जमाने में होता, तो रास्ते में ही फोन निकाल कर कहता, “जरा लैला की लोकेशन तो सेंड करना, जालिम का रस्ता बहुत पेचीदा है और मेरी गाड़ी का पेट्रोल खत्म होने को है!”
 

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How GPS and Live Location Changed the Way We Live
कोई मजनू अब भटकता नहीं, लोकेशन मांग लेता है! - फोटो : AI

विस्तार

Technology and Human Life: आदिम काल में जब जंगली इंसान गुफा से बाहर निकलता था, तो वह जानवरों से छिपने के लिए अलग रास्ता ढूंढता था। फिर वह सभ्य हुआ, तो इसके बाद उसने राज्य, पुलिस और समाज से छिपने के रास्ते तलाशे। पर इक्कीसवीं सदी का यह डिजिटल युग इंसान से छिपने का बुनियादी अधिकार भी छीन लेना चाहता है। उसने एक नया महामंत्र ईजाद किया है- “लोकेशन भेजिए!”  ईश्वर ने इंसान को दो पैर इसलिए दिए थे कि एक जगह से दूसरी जगह भटक सके। आधुनिक विज्ञान को इंसान का यह स्वाभाविक रूप से भटकना बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने इंसान की जेब में एक ऐसा यंत्र थमा दिया, जिसके बाद आदमी बार-बार कहता है- “लोकेशन भेजिए!”

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मेरे गांव मोतिया में तो जब तक गूगल मैप्स का प्रवेश नहीं हुआ था, तब तक किसी के घर का पता पूछना अपने आपमें एक दीर्घकालिक सांस्कृतिक अनुष्ठान हुआ करता था। आप किसी मोड़ पर खड़े होकर पूछते कि “गुजरी गुरु का घर किधर है?” तो सामने बैठा आदमी तुरंत रास्ता नहीं बताता था, वह पहले आपको आपादमस्तक घूरता, फिर हवाई चप्पल को पटक कर, पहले उससे धूल झाड़ कर सवाल दागता- “कहां से हैं, उनसे क्या काम है?” जब आप अपनी दो-तीन पीढ़ियों का परिचय दे देते, तब वह अपने हाथ के इशारे और आवाज के साथ स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करता, “आगे जाकर, जहां एक खराब चापाकल है, वहां से बाएं घूम जाइए, उसी जगह है। लेकिन गुजरी गुरु अभी घर पर मिलेंगे नहीं, आम के बगीचे में जमीन की मापी का कुछ झगड़ा हो रहा है, वही देखने गए हैं!”
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इस पूछताछ में एक किस्म का सामाजिक ज्ञान था और लोकल स्तर की राजनीति भी। पूछने और बताने की यह परंपरा अब मेरे गांव से भी लुप्त हो चुकी है। और पूरी दुनिया की कहानी यही है। अब आप अपनी मर्जी या गलती से भटक नहीं सकते। मेले या कुंभ में भी खो नहीं सकते। यह इस जमाने का सबसे बड़ा ‘अन्याय’ है। सच ही कहा है किसी ने," मनुष्य जब बहुत अधिक आधुनिक होने लगता है, तो वह सबसे पहले अपने भटकने का सौंदर्य खो बैठता है।"
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“लोकेशन भेजिए” के इस युग में मुझे कवि कालिदास याद आते हैं। कालिदास के यक्ष ने जब मेघ को अलकापुरी का मार्ग बताया था, तो उसमें केवल उत्तर दिशा का निर्देश नहीं था, उसमें रास्ते में पड़ने वाली नदियां थीं, आम्रकुंज थे और विप्रलंभ शृंगार की विकलता थी। मेघ को किसी ने 'लाइव लोकेशन' नहीं भेजी थी। मेघ तो हवा के रुख, चमेली की गंध और आषाढ़ के पहले बादल की व्यथा से अपना रास्ता ढूंढ रहा था। अब आज की आधुनिक कांता को देखिए। वह अपने प्रियतम से मेघदूत की भाषा में बात नहीं करती। वह सीधे स्क्रीन पर उंगली मारती है और एक शुष्क, यांत्रिक आज्ञा जारी करती है, “लोकेशन शेयर कीजिए!” इन दिनों प्रेम पर 'लाइव लोकेशन' का सबसे सख्त पहरा है। अगर प्रेमी कहे कि मैं तुम्हारे दिल में हूं, तो प्रेमिका पल भर में मोबाइल स्क्रीन पर उंगली मारते हुए पूछ बैठती है, “पर तुम्हारी लोकेशन तो कनॉट प्लेस के पास की दिखा रही है और वह भी आठ मिनट पहले अपडेट हुई है!”

लोकेशन ने विश्वास को तकनीक के हवाले कर दिया है। ‘लोकशन मांगने’ के इस स्वर्णिम काल की प्रेम कहानी में अब न कोई रांझा रास्ता भूल सकता है, न कोई मजनू सहरा में भटक सकता है। मजनू अगर आज के जमाने में होता, तो रास्ते में ही फोन निकाल कर कहता, “जरा लैला की लोकेशन तो सेंड करना, जालिम का रस्ता बहुत पेचीदा है और मेरी गाड़ी का पेट्रोल खत्म होने को है!”

याद करें, पुराने जमाने में जब कोई मेहमान घर आने वाला होता था, तो घर के तीन-चार लोग बरामदे में बैठ कर सड़क की तरफ टकटकी लगाए रहते थे। दूर से कोई साइकिल या रिक्शा मुड़ता दिखता, तो दिल की धड़कन बढ़ जाती थी- “लो, आ गए मौसा जी!” उसमें एक उत्सुकता थी और एक मानवीय बेताबी भी। अब मौसा जी रास्ते में ही फोन पर गरजते हैं, “अरे, पानी गरम करवा दो! मैंने व्हाट्सएप पर ‘लाइव लोकेशन’ भेज दी है, ठीक 15 मिनट में तुम्हारी चौखट पर पैर रख दूंगा।” अतिथि, जिनके आने की कोई तिथि नहीं होती थी, वह अब ‘गूगल मैप्स’ की स्क्रीन पर रेंगता हुआ एक तीर है, जो चौराहे पर लाल बत्ती होते ही रुक जाता है और हरी बत्ती होते ही आगे सरकने लगता है। आधुनिक मनुष्य की त्रासदी देखिए। मिलने से पहले वह अपना दिल, अपनी नीयत या अपनी परेशानी नहीं बताता, वह सबसे पहले अपनी ‘लोकेशन’ फेंकता है, मानो कह रहा हो, “देखिए साहब, मैं इस समय इस अक्षांश और देशांतर पर मौजूद हूं। मेरी इंसानियत पर भले भरोसा मत कीजिए, पर सैटेलाइट के इस संदेश पर पूरा भरोसा रखिए।”

बस, यहीं जाकर हमारी सारी उपलब्धियां ढेर हो जाती हैं। लोकेशन ने उस महान भारतीय परंपरा का अंत कर दिया, जिसे हम ‘सफेद झूठ’ कहते थे और जिसके बल पर हमारा पूरा प्रशासनिक ढांचा पिछले कई दशकों से  सुचारू रूप से चल रहा था। और उस जीपीएस वाली आवाज का तो कहना ही क्या! गांव का जो प्रधान जी पूरे ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर को अपनी जेब में रख कर घूमता है, जो दरोगा जी को चौराहे पर रोक कर डांट देता है, वही प्रधान जी जब अपनी स्कॉर्पियो में बैठते हैं, तो मोबाइल से एक यांत्रिक आवाज आती है, “पांच सौ मीटर आगे जाकर यू-टर्न लीजिए!” और प्रधान जी, जिन्होंने जीवन में कभी अपनी ‘माई’ की बात भी नहीं सुनी, वह चुपचाप स्टेयरिंग घुमाकर यू-टर्न ले लेते हैं! इसे कहते हैं तकनीक का असली विकेंद्रीकरण। जो काम राज्य सरकार की पुलिस नहीं कर सकी, वह काम एक अदृश्य सैटेलाइट की आवाज ने कर दिखाया। और फिर जीपीएस का वह मशहूर वाक्य- “यू हैव अराइव्ड!” कई बार आदमी कार से उतर कर देखता है- चारों तरफ सन्नाटा है, दो-चार आवारा पशु घूम रहे हैं और सामने एक नाला बह रहा है। पर गूगल कह रहा है कि आप पहुंच गए हैं, तो हमें मानना पड़ेगा कि हम पहुंच गए हैं।

कुछ साल पहले तक जब कोई मित्र या परिजन पूछता था कि “आप कहां हैं?” तो इसमें उसकी एक चिंता थी। तब आप झूठ बोलने के लिए भी स्वतंत्र थे कि “बस, आपके घर के मोड़ पर ही खड़ा हूं!” इस झूठ से भी एक किस्म का सामाजिक सौहार्द बना रहता था। लोकेशन ने झूठ बोलने का हमारा पारंपरिक और मौलिक अधिकार भी छीन लिया। हमने सभ्यता की हजारों साल की यात्रा में आदमी को इतना सटीक बना दिया कि अब वह यह भी नहीं कह सकता कि “मैं आस-पास हूं।”

हालांकि लोकेशन भेजने की इस महान क्रांति ने कुछ मामले में चमत्कार भी किया है। अब बेटियां रात के अधेरे में घर लौटते समय मां को “मैं ठीक हूं” कहने की जगह सिर्फ एक नीली बिंदी भेज देती हैं और मां का दिल सैटेलाइट के भरोसे तसल्ली पा जाता है। अब दामाद को झूठ बोलने की जरूरत नहीं पड़ती कि “बस, पांच मिनट में पहुंच रहा हूं”, क्योंकि सास खुद स्क्रीन पर देख लेती हैं कि उसे अभी तीन लाल बत्तियां और दो जाम पार करके आना है। भटकने का सौंदर्य भले चला गया हो, पर सटीक पहुंच का प्रमाण-पत्र अब हर किसी की जेब में है।

फिर भी, आदमी अपनी लोकेशन छिपाने के लिए स्वतंत्र है। इसमें दिमाग नहीं, बल्कि नेटवर्क बंद करने की चालाकी चाहिए। या कहें तो लोकेशन ने मनुष्य के भीतर के छल को खत्म नहीं किया है, उसने छल को और ज्यादा ‘तकनीकी’ बना दिया है। आदमी किसी दूरदराज के इलाके में बैठ कर भी ‘लोकेशन मॉक ऐप’ का इस्तेमाल करके अपनी जगह बदल सकता है। हालांकि सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि इस देश में आदमी की ‘करेंट लोकेशन’ कभी वह नहीं होती, जहां उसका शरीर खड़ा होता है।

अस्वीकरण: यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें। 

 

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