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जीवन धारा: जिंदगी बदलने से पहले अपना दृष्टिकोण बदलें, जो सामने है, उसे स्वीकार करने का सूत्र सार्थक
Tue, 06 Oct 2026 06:55 AM IST
ज्योति भास्कर
रयान हॉलिडे (अमेरिकन लेखक)
रयान हॉलिडे (अमेरिकन लेखक)
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Tue, 06 Oct 2026 06:55 AM IST
जब जीवन कठिन हो, तो समस्या को बहुत बड़ा बनाने के बजाय उसे एक छोटे-से सवाल में बदलना चाहिए कि ‘क्या यह मेरे हाथ में है?’ अगर जवाब हां है, तो पूरा प्रयास करना चाहिए।
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जिंदगी बदलने से पहले अपना दृष्टिकोण बदलें
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
मैंने जीवन में देखा है कि ज्यादातर लोग अपनी ऊर्जा उन चीजों से लड़ने में खर्च कर देते हैं, जिन्हें वे बदल ही नहीं सकते। हम बीते हुए कल को बदलना चाहते हैं, दूसरों के फैसलों को अपने अनुसार देखना चाहते हैं और परिस्थितियों को अपनी इच्छा के मुताबिक ढालना चाहते हैं। लेकिन, ऐसा होता नहीं है। और, जितनी जल्दी हम इसे स्वीकार कर लेते हैं, उतनी ही जल्दी उस शक्ति को पहचानना शुरू कर देते हैं, जो वास्तव में हमारे पास है।
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जब मेरे सामने कोई कठिन परिस्थिति आती है, तो मैं खुद से यह पूछने के बजाय कि ‘मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ?’, दूसरा जरूरी सवाल पूछना ज्यादा उपयोगी समझता हूं कि ‘अब मैं क्या कर सकता हूं?’ दोनों सवालों के बीच बहुत बड़ा फर्क है। पहला सवाल मुझे उस घटना के सामने खड़ा रखता है, जिसे मैं बदल नहीं सकता, जबकि दूसरा मुझे उस छोटे-से हिस्से की ओर ले जाता है, जिस पर मेरा अधिकार अब भी है-प्रयास।
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किसी खिलाड़ी का ही उदाहरण ले लीजिए। अगर वह चोटिल हो जाए, तो अपने शरीर को तुरंत ठीक नहीं कर सकता। चोट उसके नियंत्रण में नहीं है। लेकिन, उसके बाद वह क्या करता है, यह उसके वश में जरूर है। वह खुद को जल्दी ठीक करने का काम कर सकता है, अपनी कमजोरियों को सुधार सकता है और समय को व्यर्थ जाने से रोक सकता है। यही बात जीवन पर भी लागू होती है। मैं यह तय नहीं कर सकता कि कोई व्यक्ति मुझे समझेगा या नहीं, मेरे साथ रहेगा या नहीं, मुझसे प्रेम करेगा या नहीं। पर, यह जरूर तय कर सकता हूं कि उसके व्यवहार के बाद मैं क्या करूंगा। यहीं मनुष्य की वास्तविक शक्ति दिखाई देती है।
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कभी-कभी सफलता की संभावना केवल एक प्रतिशत होती है। पर, मेरे लिए वह एक प्रतिशत भी मायने रखता है, क्योंकि मैं अपने प्रयासों से उसे और बढ़ा सकता हूं। इसलिए, जहां थोड़ी-सी भी संभावना बची हो, वहां प्रयास का कोई अर्थ जरूर होता है। जब जीवन कठिन हो, तो समस्या को बहुत बड़ा बनाने के बजाय उसे एक छोटे-से सवाल में बदलना चाहिए कि ‘क्या यह मेरे हाथ में है?’ अगर जवाब हां है, तो वह काम करना चाहिए। बिना बहाने, बिना शिकायत और पूरी ताकत के साथ। और, अगर जवाब नहीं है, तो उसे स्वीकार करना चाहिए। स्वीकार कर लेने का मतलब हार मान लेना नहीं, बल्कि यह समझना है कि ऊर्जा सीमित है और उसे वहीं लगाना चाहिए, जहां उससे कोई फर्क पड़ सकता है।
मेरे लिए वास्तविक स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि दुनिया मेरी इच्छा के अनुसार चले। इसका अर्थ यह है कि दुनिया जैसी भी हो, मैं अपने हिस्से का चुनाव करने की क्षमता बनाए रखूं। मैं पूरी दुनिया को नियंत्रित नहीं कर सकता। और, शायद मुझे करना भी नहीं चाहिए। -द ऑब्सटेकल इज द वे के अनूदित अंश
सूत्र: जो सामने है, उसे स्वीकारें
जो बीत गया, उसे बदलने में अपनी शक्ति मत गंवाइए। जो सामने है, उसे पूरी सजगता से स्वीकार कीजिए और जहां थोड़ी-सी भी संभावना दिखाई दे, वहां अपना पूरा प्रयास देने में कोई कसर न छोड़ें। जीवन की असली शक्ति परिस्थितियों को नियंत्रित करने में नहीं, बल्कि उनके बीच अपने विचार, निर्णय और कर्म को नियंत्रित करने में है।