फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Madhya Pradesh ›   Indore News ›   columns blog ananya mishra A life entangled between karma and destiny

जिजीविषा: कर्म और भाग्य के बीच उलझा जीवन, आखिर किसके हाथ में है हमारा भविष्य?

Wed, 21 Oct 2026 03:04 PM IST
Ananya Mishra अनन्या मिश्रा
Updated Wed, 21 Oct 2026 03:04 PM IST
सार
Register For Event

मनुष्य का जीवन केवल भाग्य या कर्म से निर्धारित नहीं होता। प्रयास, परिस्थितियाँ और अवसर सभी इसकी दिशा तय करते हैं। सफलता के लिए पुरुषार्थ जरूरी है, लेकिन अनियंत्रित परिस्थितियों को स्वीकार करना भी विवेक, धैर्य और आध्यात्मिकता का हिस्सा है।

विज्ञापन
columns blog ananya mishra A life entangled between karma and destiny
सांकेतिक - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मनुष्य के जीवन में कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जिनके सामने उसका सारा आत्मविश्वास, परिश्रम और बुद्धि भी छोटे पड़ जाते हैं। कोई व्यक्ति वर्षों तक कठिन परिश्रम करता है, अपने लक्ष्य के लिए अनेक त्याग करता है, फिर भी सफलता उससे दूर रहती है, जबकि कोई दूसरा व्यक्ति अनुकूल परिस्थितियों, सही अवसर अथवा अप्रत्याशित सहायता के कारण अपेक्षाकृत कम प्रयास में आगे निकल जाता है।

विज्ञापन


कभी किसी निर्दोष व्यक्ति के जीवन में ऐसी कठिनाइयाँ आती हैं जिनका कारण वह समझ नहीं पाता, तो कभी किसी कठिन समय में अचानक ऐसा अवसर सामने आ जाता है जो जीवन की दिशा बदल देता है। तो क्या मनुष्य का जीवन वास्तव में उसके अपने निर्णयों से बनता है, या कोई अदृश्य व्यवस्था पहले ही यह निर्धारित कर चुकी है कि उसे क्या प्राप्त होगा और क्या खोना पड़ेगा? यदि सब कुछ भाग्य है, तो प्रयास का क्या अर्थ है, और यदि सब कुछ हमारे कर्मों पर निर्भर है, तो उन परिस्थितियों का उत्तरदायित्व किसका है जिन्हें हमने कभी चुना ही नहीं?
विज्ञापन


अपने परिश्रम को उसका कारण मानते हैं
भारतीय दर्शन में भाग्य और पुरुषार्थ का प्रश्न केवल भविष्य के विषय में हमारी जिज्ञासा नहीं, बल्कि जीवन के प्रति हमारे दृष्टिकोण से भी जुड़ा हुआ है। हममें से अनेक लोग सफलता मिलने पर अपने परिश्रम को उसका कारण मानते हैं, लेकिन असफलता आने पर परिस्थितियों, समय अथवा भाग्य को दोष देने लगते हैं। इसके विपरीत, कुछ लोग जीवन में मिलने वाली प्रत्येक कठिनाई को अपने पूर्वकर्मों का परिणाम मानकर स्वीकार कर लेते हैं, मानो वर्तमान में उनके पास कुछ बदलने की क्षमता ही न हो। इन दोनों दृष्टिकोणों में एक महत्त्वपूर्ण कमी दिखाई देती है।
विज्ञापन
विज्ञापन


पहला दृष्टिकोण उन अनेक परिस्थितियों की उपेक्षा कर सकता है जो किसी व्यक्ति के नियंत्रण से बाहर होती हैं, जबकि दूसरा दृष्टिकोण मनुष्य की वर्तमान निर्णय लेने और अपने जीवन को बेहतर बनाने की क्षमता को कमजोर कर सकता है। भारतीय चिंतन की विशेषता यह है कि वह कर्म, ज्ञान, कर्तव्य और आत्मसंयम पर विचार करते हुए मनुष्य को केवल परिस्थितियों का असहाय पात्र मानकर नहीं छोड़ता।

परिस्थितियों पर उसका पूरा नियंत्रण नहीं होता
मनुष्य अपने प्रयासों की दिशा चुन सकता है, अपने निर्णयों को सुधार सकता है और अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदार रह सकता है, लेकिन वह प्रत्येक परिणाम को अपनी इच्छा के अनुसार सुनिश्चित नहीं कर सकता। एक किसान खेत तैयार कर सकता है, बीज बो सकता है और फसल की देखभाल कर सकता है, किंतु वर्षा, तापमान और अनेक प्राकृतिक परिस्थितियों पर उसका पूरा नियंत्रण नहीं होता। इसका अर्थ यह नहीं कि खेती करना व्यर्थ है, बल्कि यह है कि सफल खेती के लिए परिश्रम के साथ परिस्थितियों की समझ, धैर्य और अनिश्चितता को स्वीकार करने की क्षमता भी आवश्यक है। मनुष्य का जीवन भी कुछ ऐसा ही है। प्रयास आवश्यक है, लेकिन प्रयास और परिणाम के बीच अनेक ऐसे तत्त्व कार्य करते हैं जिन्हें केवल इच्छाशक्ति से नियंत्रित नहीं किया जा सकता।

इसी प्रकार, परिस्थितियों को स्वीकार करना और उनके सामने आत्मसमर्पण कर देना एक ही बात नहीं है। मान लीजिए कि किसी युवा को आर्थिक कठिनाइयों के कारण वह शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं मिल पाता जिसकी उसने कल्पना की थी। यह कहना कि उसने अपनी परिस्थितियाँ स्वयं चुनी हैं, वास्तविकता की उपेक्षा होगी। लेकिन यह मान लेना कि अब उसके जीवन में आगे बढ़ने की कोई संभावना नहीं बची, उसकी संभावनाओं को समय से पहले समाप्त कर देना होगा। संभव है कि उसका मार्ग दूसरों से अधिक कठिन हो, उसकी प्रगति में अधिक समय लगे और उसे ऐसे अवसरों के लिए भी संघर्ष करना पड़े जो दूसरे लोगों को सहज रूप से उपलब्ध हो जाते हैं। फिर भी उपलब्ध परिस्थितियों के भीतर वह नए कौशल सीख सकता है, सहायता खोज सकता है और अपने लिए कोई दूसरा मार्ग बना सकता है। यहाँ भाग्य और पुरुषार्थ का संबंध किसी रहस्यमय गणना से अधिक जीवन की वास्तविक जटिलता को समझने में दिखाई देता है।

भारतीय दर्शन में कर्म की अवधारणा भी इसी कारण विचारणीय है। कर्म को केवल पुरस्कार और दंड की किसी सरल व्यवस्था के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। कर्म का एक व्यावहारिक पक्ष यह है कि हमारे निर्णय हमारे स्वभाव, संबंधों और भविष्य की संभावनाओं को प्रभावित करते हैं। यदि कोई व्यक्ति निरंतर क्रोध में निर्णय लेता है, तो उसके संबंध प्रभावित हो सकते हैं; यदि वह कठिनाइयों के बीच सीखने और सुधारने का प्रयास करता है, तो उसके लिए नई संभावनाएँ उत्पन्न हो सकती हैं। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि जीवन में होने वाली प्रत्येक घटना किसी व्यक्ति के कर्मों का प्रत्यक्ष फल ही है। किसी के दुख को देखकर यह कहना कि उसने अवश्य कोई गलत कर्म किया होगा, न केवल असंवेदनशील है, बल्कि कर्म के विषय में हमारी समझ को भी अत्यंत सीमित कर देता है। दूसरों के जीवन की परिस्थितियों का पूरा ज्ञान हमारे पास नहीं होता। इसलिए कर्म का विचार हमें अपने आचरण के प्रति उत्तरदायी बनाने में सहायक होना चाहिए, न कि दूसरों के दुख का निर्णय करने का साधन।

जिनके भीतर मनुष्य को जीवन जीना पड़ता
जीवन में सबसे कठिन साधना शायद यह पहचानना है कि कहाँ प्रयास करना चाहिए और कहाँ अपनी सीमाओं को स्वीकार करना चाहिए। जिस परिस्थिति को बदला जा सकता है, उसके सामने भाग्य का बहाना बनाकर बैठ जाना स्वयं के प्रति अन्याय है। दूसरी ओर, जिस घटना पर हमारा नियंत्रण नहीं था, उसके लिए जीवन भर स्वयं को दोष देते रहना भी विवेकपूर्ण नहीं है। किसी संबंध का टूटना, किसी अवसर का छूट जाना अथवा किसी प्रियजन को खो देना हमेशा हमारी किसी गलती का परिणाम नहीं होता। ऐसी परिस्थितियों में मनुष्य को केवल समाधान ही नहीं, बल्कि समय, संवेदना और स्वयं को संभालने का अवसर भी चाहिए। आध्यात्मिकता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यही है कि वह हमें कर्म करने की प्रेरणा देने के साथ उन सीमाओं को स्वीकार करना भी सिखाए जिनके भीतर मनुष्य को जीवन जीना पड़ता है।

जीवन हमें हमेशा समान अवसर नहीं देता
हम यह सुनिश्चित नहीं कर सकते कि प्रत्येक प्रयास सफल होगा, लेकिन हम यह चुनने का प्रयास कर सकते हैं कि असफलता के बाद स्वयं को कैसे संभालेंगे। हम हर परिस्थिति को अपनी इच्छा के अनुसार नहीं बदल सकते, लेकिन जहाँ परिवर्तन संभव है, वहाँ अपने उत्तरदायित्व से मुँह भी नहीं मोड़ना चाहिए। जीवन हमें हमेशा समान अवसर नहीं देता, फिर भी परिस्थितियों की असमानता को स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं कि हम अपने प्रयासों का मूल्य समाप्त मान लें। मनुष्य का साहस इसी में प्रकट होता है कि वह अनिश्चितता के बीच भी विवेकपूर्ण निर्णय ले, अपनी सीमाओं को पहचाने और उपलब्ध संभावनाओं का उपयोग करे।

जब हम अपने जीवन को इस दृष्टि से देखते हैं, तब भाग्य कोई ऐसा अदृश्य निर्णय नहीं रह जाता जिसके सामने हमें विवश होकर खड़ा रहना पड़े, और कर्म भी प्रत्येक परिणाम पर पूर्ण अधिकार प्राप्त करने का दावा नहीं करता। मनुष्य वास्तव में अपने भाग्य का पूर्ण निर्माता नहीं है, लेकिन वह केवल परिस्थितियों का असहाय पात्र भी नहीं है। उसके हाथ में जीवन की प्रत्येक घटना नहीं, परंतु अनेक घटनाओं के बीच अपने आचरण, विवेक और साहस को दिशा देने की संभावना अवश्य है। और कभी कभी जीवन को अर्थपूर्ण बनाने के लिए इतना ही पर्याप्त होता है।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed