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राज की बात : जंतर मंतर 2.0 का पूरा हिसाब

Sun, 11 Oct 2026 03:32 PM IST
Rajkishor राजकिशोर
Updated Sun, 11 Oct 2026 03:32 PM IST
सार
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सीजेपी के दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान सड़क पर पुलिस जीती, स्क्रीन पर आंदोलन। पुलिस की सख्ती के चलते जंतर मंतर खाली रहा, पर सुप्रीम कोर्ट, जिनेवा और सोशल मीडिया पर सीजेपी आंदोलन गरमाया। 

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Delhi cjp protest jantar mantar leaders detained geneva supreme court
सीजेपी का विरोध प्रदर्शन - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जंतर मंतर लगातार दूसरे दिन बैरिकेड के पीछे सील रहा पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का आंदोलन बीते 48 घंटों में तीन नए मोर्चों पर पहुंच गया: सुप्रीम कोर्ट, जिनेवा और सोशल मीडिया। रविवार सुबह अभिजीत दिपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने 50,000 रुपये के मुचलके पर रिहा कर दिया। शर्त यह है कि वे एक साल तक शांति बनाए रखेंगे। उसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने विशेष सुनवाई में निर्देश दिया कि मेट्रो और रेल सामान्य रूप से चलें, इंटरनेट बाधित न हो और किसी को कानूनी प्रक्रिया के बिना हिरासत में न रखा जाए। उधर जिनेवा में भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की चिंता को अंदरूनी मामलों में अनुचित दखल बताकर खारिज कर दिया। यह आंदोलन सड़क पर कमजोर दिखा, पर बहस में और मजबूत हुआ। इसी विरोधाभास में जंतर मंतर 2.0 की पूरी कहानी छिपी है।
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जुलाई का सबक, अक्तूबर की रणनीति
तीन महीने पहले नीट पेपर लीक के खिलाफ सीजेपी का आंदोलन जंतर मंतर से संसद तक पहुंचा था। 20 जुलाई के संसद मार्च में पथराव, लाठीचार्ज और आंसू गैस चली, सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 118 पुलिसकर्मी घायल हुए और 25 जुलाई को शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। सरकार और दिल्ली पुलिस ने उस अनुभव से साफ सबक लिया कि भीड़ को जुटने ही मत दो।
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इसी रणनीति के तहत अनुमति नहीं दी गई। संयुक्त पुलिस आयुक्त नूपुर प्रसाद के मुताबिक आवेदन तय 10 दिन के बजाय सिर्फ तीन दिन पहले आया था और पिछली बार पार्टी ने लिखित वचन तोड़ा था। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लगाई गई। गृह सचिव गोविंद मोहन ने राज्यों से दिल्ली में अनधिकृत प्रवेश रोकने को कहा। करीब 25,000 जवान 20 जोन में तैनात किए गए और रविवार को यह संख्या 30,000 से ऊपर पहुंच गई। नेतृत्व को पहले ही अलग कर दिया गया। मुंबई से आई एयर इंडिया की उड़ान एआई 2428 के उतरते ही दिपके और उनके साथियों को विमान के भीतर से हिरासत में ले लिया गया।
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नतीजा सामने है। दो दिन में जंतर मंतर पर कोई बड़ी भीड़ नहीं जुटी, लाठी नहीं चली और आकाशवाणी भवन के पास पथराव में दो पुलिसकर्मियों के घायल होने के अलावा हिंसा की कोई बड़ी घटना नहीं हुई। जुलाई जैसी टकराव की तस्वीरें इस बार नहीं बनीं।

हिरासत के आंकड़ों पर धुंध
हिरासत की संख्या पर अब भी कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है। पुलिस सूत्रों और मीडिया रिपोर्टों में यह 2,500 से 7,000 के बीच बताई गई है, जबकि सीजेपी 15,000 से ज्यादा का दावा करती है। सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि ज्यादातर लोगों को दोपहर दो बजे उठाया गया और शाम छह बजे तक छोड़ दिया गया।

हिरासत में लिए गए लोगों की सूची बताती है कि यह सिर्फ छात्रों का आंदोलन नहीं रहा। अरविंद केजरीवाल को लोधी एस्टेट से जाफरपुर कलां थाने ले जाया गया। ममता बनर्जी, डेरेक ओब्रायन और साकेत गोखले समेत तृणमूल के नेता करीब चार घंटे द्वारका नॉर्थ थाने में रहे। केरल हाउस से मार्च कर रहे पिनराई विजयन, एम ए बेबी और बृंदा करात समेत माकपा के नेताओं को छत्रसाल स्टेडियम ले जाया गया, जहां से वे आठ घंटे से ज्यादा समय बाद छूटे। योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, दीपंकर भट्टाचार्य और आइसा अध्यक्ष नेहा बोरा दिल्ली हाट के पास हिरासत में लिए गए। एसएफआई ने अपने 400 से ज्यादा सदस्यों के हिरासत में लिए जाने का दावा किया। सुप्रीम कोर्ट के पास से 50 से 150 वकीलों को यमुना स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स ले जाया गया। मुख्य न्यायाधीश के हस्तक्षेप के बाद उन्हें छोड़ा गया।

दिल्ली के बाहर भी आंच पहुंची। मुंबई में अगस्त क्रांति मैदान की ओर जा रहे तुषार गांधी को बांद्रा में रोका गया और उनके और अभिनेता इमरान खान समेत कुछ लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हुई। मुंबई पुलिस ने करीब 600 लोगों को हिरासत में लेने की बात कही। चंडीगढ़ में पंजाब के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के दफ्तर के बाहर प्रदर्शन कर रहे मनीष सिसोदिया और पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा भी हिरासत में लिए गए।

पत्रकार भी इस घेराबंदी में आए। स्क्रॉल, न्यूजलॉन्ड्री और कुछ अख़बारों समेत कई संस्थानों के पत्रकार सीआर पार्क, आईटीओ और छत्रसाल स्टेडियम के आसपास हिरासत में लिए गए। न्यूजलॉन्ड्री ने अपने कर्मचारियों के फोन जब्त होने का आरोप लगाया। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया समेत चार पत्रकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय संस्था सीपीजे ने इसकी निंदा की।

विमान से अदालत तक
विमान का घटनाक्रम दोनों पक्षों के लिए प्रतीक बन गया। दिपके ने कहा कि वे गिरफ्तार होने ही आए हैं और विमान के अगले हिस्से से इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगे। एएनआई के वीडियो में एक अधिकारी उनसे सहयोग करने को कहता सुनाई देता है और कहता है कि यह गिरफ्तारी नहीं है। कई सहयात्री भड़क गए। एक महिला यात्री ने नेताओं से "शेम ऑन यू" कहा और एक सहयात्री ने एएनआई से शिकायत की कि ऐसे कुछ लोगों की वजह से जनता को परेशानी झेलनी पड़ती है। विमान में मौजूद आजतक के संवाददाता के मुताबिक प्रतिक्रिया मिली जुली थी।

रविवार सुबह तीनों नेताओं को दिल्ली छावनी में कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। पुलिस ने उन्हें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 126 और 170 के तहत एहतियातन गिरफ्तार किया था और कहा कि सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन हुआ। रिहाई के बाद दिपके ने कहा कि वे दादी के निधन के कारण परिवार के पास गांव जा रहे हैं। एक्स पर उन्होंने लिखा कि पार्टी न पीछे हटेगी और न डरेगी। इस बीच पार्टी की कानूनी प्रमुख रत्ना सिंह को अदालत से राहत नहीं मिली। गलत तरीके से बंधक बनाने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज कराने की उनकी अर्जी खारिज हो गई।

सुप्रीम कोर्ट: न पूरी छूट, न पूरी रोक
रविवार को न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की विशेष पीठ ने अवमानना याचिका पर सुनवाई की। कपिल सिब्बल, मेनका गुरुस्वामी और के के वेणुगोपाल ने याचिकाकर्ताओं की ओर से दलीलें दीं। अदालत ने अंतरिम निर्देश दिए कि मेट्रो और रेल सामान्य रूप से चलें, जब तक कि सार्वजनिक व्यवस्था के लिए नियमन जरूरी न हो। इंटरनेट कानून के मुताबिक बाधित न हो, बैरिकेड की तुरंत समीक्षा हो और कानूनी प्रक्रिया के बिना कोई हिरासत न हो। प्रदर्शन के अधिकार पर अदालत ने संतुलन रखा। जब सिब्बल ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बेरोकटोक अधिकार की दलील दी, तो न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन है।

सरकार ने अपना बचाव आंकड़ों से किया। सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि 303 में से सिर्फ 45 मेट्रो स्टेशनों पर आवाजाही नियंत्रित की गई, जो पूरे नेटवर्क का करीब 15 प्रतिशत है। उनके मुताबिक 10 अक्तूबर को 4,157 फेरे पूरे चले और इंटरनेट बहाल हो चुका है। अदालत ने अधिकारियों से मंगलवार तक हलफनामा और अनुपालन रिपोर्ट मांगी है।

जिनेवा में आमने-सामने
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय के प्रवक्ता थमीन अल खीतान ने बड़े पैमाने पर हिरासत पर चिंता जताई और मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए लोगों की तत्काल रिहाई और बातचीत की मांग की। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने पाबंदियों को लॉकडाउन जैसा बताया। भारत ने इसका तुरंत जवाब दिया। जिनेवा में भारत के स्थायी मिशन ने कहा कि ये चिंताएं गलत हैं और देश के अंदरूनी मामलों में अनुचित दखल हैं। मिशन ने कहा कि शांतिपूर्ण सभा का अधिकार संविधान देता है, पर वह सार्वजनिक व्यवस्था की सीमाओं के अधीन है, देश में स्वतंत्र न्यायपालिका है और अदालतों के दरवाजे सबके लिए खुले हैं। मिशन ने संयुक्त राष्ट्र कार्यालय को दूसरे देशों के बड़े प्रदर्शनों पर भी उतना ही ध्यान देने की सलाह दी। रविवार की सुनवाई ने भारत के इस तर्क को मजबूती दी कि देश की संस्थाएं इस मामले को खुद देख रही हैं।

सीमा पार से समर्थन भी इसी बहस का हिस्सा बना। बांग्लादेश में शेख हसीना को सत्ता से हटाने वाले छात्र आंदोलन के चेहरे नाहिद इस्लाम ने ढाका से बयान जारी कर दिल्ली के प्रदर्शन को बांग्लादेश के जुलाई 2024 से जोड़ा। उसने हिंदुत्व बहुसंख्यकवाद का जिक्र किया और सीमा पर हत्याओं और पानी के बंटवारे जैसे द्विपक्षीय विवादों को भी इस आंदोलन से जोड़ दिया। यह वही नेशनल सिटिजन पार्टी है जिसके नेता हसनत अब्दुल्ला ने दिसंबर 2025 में पूर्वोत्तर के सात राज्यों को अलग करने में मदद की धमकी दी थी। सवाल यह है कि मतदाता सूची पर भारत के युवाओं का आंदोलन पड़ोस में सत्ता बदलने वालों को अपना "जुलाई" क्यों नजर आ रहा है।

सोशल मीडिया: ताकत भी, कसौटी भी
सड़क पर जो भीड़ नहीं दिखी, वह सोशल मीडिया पर दिखी। सोशल मीडिया निगरानी के आंकड़ों के मुताबिक इस पूरे प्रकरण में सबसे ज्यादा देखी गई पोस्ट राहुल गांधी की थी। "प्रदर्शन करते रहो, हमें आप पर गर्व है" लिखी इस पोस्ट को 40 लाख से ज्यादा बार देखा गया और करीब 88,000 लाइक मिले। यह दिलचस्प है, क्योंकि कांग्रेस संगठन के तौर पर शनिवार के प्रदर्शन से दूर रही थी और राहुल उस दिन चेन्नई में थे। यानी जमीन पर आप, तृणमूल और वाम दल उतरे, पर ऑनलाइन सबसे बड़ी आवाज कांग्रेस की रही।

ध्रुव राठी को गुरुग्राम के घर से करीब 50 पुलिसकर्मियों की कार्रवाई में उठाए जाने और रात करीब तीन बजे छोड़े जाने की खबर है। उनके "मुझे अगवा किया गया" वाले वीडियो को 30 लाख से ज्यादा बार देखा गया। पुलिस ने इसे हिरासत बताया और कहा कि उन पर कोई आरोप नहीं है। सीजेपी के आधिकारिक खाते पर विमान वाला वीडियो 23 लाख से ज्यादा बार देखा गया और अजिंक्य शिंदे की "चलो जंतर मंतर" वाली अपील 8 लाख से ज्यादा बार। शशि थरूर ने इसे "अघोषित इमर जेन जी" कहा।

दूसरी तरफ सरकार समर्थक खातों ने हिरासत और पाबंदियों का बचाव किया। भाजपा ने विपक्ष और सीजेपी पर विदेशी समर्थन से अराजकता फैलाने का आरोप लगाया। भाजपा के नितिन नबीन ने राहुल गांधी, केजरीवाल और सीजेपी पर विदेशी मदद से देश को अस्थिर करने की कोशिश का आरोप लगाया। रविशंकर प्रसाद ने कहा कि देश संसद से चलेगा, सड़क से नहीं। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने सीजेपी को विपक्ष की बी टीम बताया। केंद्रीय मंत्री सुकांत मजूमदार ने फंडिंग पर सवाल उठाया, पर कोई सबूत सामने नहीं रखा। सीजेपी विदेशी फंडिंग से इनकार करती है।

पर यहां एक कसौटी जरूरी है। लाखों व्यू और लाइक जमीनी भागीदारी का पैमाना नहीं हैं। जुलाई में आम अभिभावक और शिक्षक अपने आप जंतर मंतर पहुंचे थे। इस बार सड़क पर सबसे संगठित मौजूदगी वाम छात्र संगठनों और विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं की रही। माकपा ने अकेले अपने 500 से ज्यादा कार्यकर्ताओं के हिरासत में होने का दावा किया।

जिनका प्रदर्शन से कोई लेना देना नहीं था
घेराबंदी की कीमत उन लोगों ने भी चुकाई जो प्रदर्शन में शामिल नहीं थे। ज्यां द्रेज ने आरोप लगाया कि केरल हाउस के पास 30 से 35 मजदूर और अल्पसंख्यक पुरुष भी हिरासत में लिए गए, जिनका प्रदर्शन से कोई संबंध नहीं था। शाहिद हुसैन, गुलफाम और सौरभ नाम के लोगों ने कहा कि वे खाना लेने या गुरुद्वारे जाने निकले थे, पर उन्हें पकड़ लिया गया और उनके फोन ले लिए गए। कई दिहाड़ी मजदूरों को पहचान पत्र न होने पर रास्ते से लौटा दिया गया। 75 वर्षीय वकील परवीन सिंघल ने कहा कि 50 साल से वोट डालने के बावजूद हाल में उनका नाम मतदाता सूची से गायब हो गया। ऐसी कहानियां आंदोलन के मूल सवाल को जिंदा रखती हैं।

गुरुद्वारा बंगला साहिब में प्रदर्शनकारियों के शरण लेने पर दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष हरमीत सिंह कालका ने आम आदमी पार्टी पर धार्मिक स्थल का सियासी इस्तेमाल करने का आरोप लगाया। रविवार को कनॉट प्लेस में पुलिस के समर्थन में खड़े कुछ लोगों द्वारा प्रदर्शनकारियों को दौड़ाने और पीटने के आरोप भी आप और कांग्रेस के खातों से उठे। इसकी पुष्टि अभी नहीं हुई है।

विपक्ष: एक मुद्दा, कई मंच
मतदाता सूची और "वोट चोरी" का मुद्दा कांग्रेस ने खड़ा किया, पर इसे सड़क पर सीजेपी, आम आदमी पार्टी, तृणमूल और वाम दल ले गए। केजरीवाल ने इसे आपातकाल से भी बदतर बताया और कहा कि पूरा देश जंतर मंतर बन जाए। ममता बनर्जी ने इसे "सुपर इमरजेंसी" कहा। मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि सरकार ने लोकतंत्र की जननी को "मजबूर लोकतंत्र" बना दिया है। कांग्रेस अब सोमवार 12 अक्तूबर को अलग प्रदर्शन और मुख्य न्यायाधीश को ज्ञापन देने की तैयारी में है। माकपा सांसद ए ए रहीम ने नांगलोई स्टेडियम में अनशन का ऐलान किया। सोनम वांगचुक ने अघोषित आपातकाल का आरोप लगाकर रिहाई न होने पर अनशन या पदयात्रा की चेतावनी दी थी। रविवार सुबह नेताओं की रिहाई के बाद उनकी समय सीमा का दबाव कम हुआ है।

किसने क्या खोया, क्या पाया
सरकार के खाते में यह है कि दो दिन तक जंतर मंतर पर कोई बड़ी भीड़ नहीं जुटी, जुलाई जैसी हिंसा नहीं हुई और नेतृत्व को बिना बल प्रयोग के अलग कर दिया गया। जिनेवा में भारत ने संप्रभुता का तर्क मजबूती से रखा और सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि प्रदर्शन का अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन है।

आंदोलन के खाते में यह है कि हजारों हिरासतों ने उसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया। सुप्रीम कोर्ट को मेट्रो, इंटरनेट और हिरासत पर निर्देश देने पड़े और अधिकारियों से मंगलवार तक जवाब मांगा गया। विपक्ष, जो अलग अलग मंचों पर था, एक मुद्दे पर नजर आया।


असली सवाल अभी अनसुलझा है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण में गड़बड़ी के आरोपों पर चुनाव आयोग इनकार कर रहा है और विपक्ष सबूत की बात कर रहा है। जब तक इस पर पारदर्शी जवाब नहीं आता, जंतर मंतर के बैरिकेड बहस को नहीं रोक पाएंगे। अब नजर तीन तारीखों पर है- सोमवार को विपक्ष का प्रदर्शन, मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में अनुपालन रिपोर्ट, और सीजेपी का अगला कदम।
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