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देव की डायरी: डायन का 'स्टार्टअप', श्राप की भी होम डिलीवरी
समय सचमुच बहुत आगे निकल आया है। अमेरिका में टिकटॉक पर ‘विच टॉक’ चल रहा है। यह तकनीक और तंत्र का ऐसा अद्भुत संगम है, जहां भक्ति और अंधविश्वास क्रेडिट कार्ड के स्वाइप पर उपलब्ध हैं। हमारे यहां, जो डायनें झाडू पर बैठकर उडती थीं, वे अमेरिका में ‘वर्क फ्रॉम होम’ कर रही हैं। तमाम तरह की तरक्की के बीच विज्ञान ने अंधविश्वास को खत्म नहीं किया। उसने उसे इंटरनेट कनेक्शन दे दिया है ...और आदमी को इससे ज्यादा क्या चाहिए? अब प्रेम भी ऑनलाइन और श्राप भी ऑनलाइन।
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डायन का 'स्टार्टअप'
- फोटो : Amarujala.com/AI
विस्तार
इंसान की बुनियादी जरूरतें कभी नहीं बदलतीं। बहुत पहले आदमी चाहता था कि पड़ोसी की दुकान का भट्टा बैठ जाए या मनपसंद स्त्री उसकी तरफ देख भर ले। आज अटलांटिक पार बैठा अमेरिकी भी यही चाहता है। अंतर बस इतना है कि अब उसके पास हाई स्पीड वाई फाई और क्रेडिट कार्ड है और वह सोशल मीडिया पर टोने-टोटके खरीद रहा है।
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विज्ञान की तरक्की के बाद कंप्यूटर आया, तो लगा कि भूत प्रेत बैकस्पेस दबाकर डिलीट कर दिए जाएंगे। इंटरनेट आया, तो उम्मीद थी कि तंत्र-मंत्र का सर्वर डाउन हो जाएगा। लेकिन इंसानी दिमाग वह जमीन है, जहां आप चाहे कितना भी 'एआई' उगा लें, 'झाड़ -फूंक' की झाड़ियों के लिए हमेशा थोड़ा खाद-पानी बची रहती है।
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टिकटॉक पर ‘विच टॉक’
अमेरिका में टिकटॉक पर ‘विच टॉक’ चल रहा है। कोई प्रेम का टोटका बेच रहा है, कोई समृद्धि का। कोई श्राप देने की सेवा उपलब्ध करा रहा है तो कोई किसी को अपने वश में करने की विधि बता रहा है। खबर सुनने के बाद सबसे पहले मुझे अपने गांव के गुजरी गुरु याद आए। अपनी सूझ-बूझ और मेहनत से उन्होंने मात्र 11 साल की उम्र में लाजवंती की जड से ‘वशीकरण का अर्क’ बनाने की विधि का न सिर्फ आविष्कार कर लिया था, बल्कि गांव में अपने से दोगुने उम्र के लड़कों को ‘तैयार माल’ सप्लाई भी करने लगे थे। पहले छिप-छिपाकर यह काम होता था, लेकिन हाथ में हुनर हो तो ख्याति को कौन रोक सकता है?
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धीरे-धीरे वे सबके स्वीकार्य ‘वशीकरण गुरु’ हो गए। फिर कोई परदा न रहा। इसके बाद गांव में लाजवंती का एक भी पौधा नहीं रहा।
अब भी उनके पास वशीकरण के कई अस्त्र और शस्त्र हैं और गाहे-बगाहे अपने से बेहद कम उम्र के लड़कों को मुफ्त में गुरु ज्ञान देते रहते हैं। लेकिन अमेरिका की खबर पर जब उनसे फोन पर चर्चा हुई तो बोले, “दुनिया में दो ही चीजें ऐसी हैं, जो बिना किसी गारंटी के सबसे ज्यादा बिकती हैं। एक तो हमारा सलाह देना और दूसरा किसी के लिए टोटका करना। लेकिन जादू -टोना बेचकर अमेरिका के लोग भले ही पैसा कमा लें, वह भारत के सामने टिक नहीं पाएगा।”
ऐसा क्यों, मेरे इस सवाल को सुनने के बाद गुजरी गुरु का गला भर आया। बोले, “जो विद्या सिर्फ भरोसे और भाव पर चलती हो, उसे ऑनलाइन कैसे बेचोगे? अमेरिका वाले वशीकरण को लैब-टेस्टेड फॉर्मूला समझते हैं। चार केमिकल मिलाए, चमकदार लेबल लगा दिया और हो गया काम!
उन्हें क्या पता कि लाजवंती की जड़ उखाड़ने का भी मुहूर्त होता है, हवा का रुख देखना पड़ता है और मन में क्या चल रहा है, यह भी। अमेरिका नहीं कर पाएगा। यह विद्या भारत की है और भारत की ही रहेगी।” ऐसा कहकर उन्होंने गला साफ किया। गला देश भक्ति के कारण नहीं, खांसी के चलते भर आया था।
टोटका वही, लेबल नया
सच है कि हम भारतीय इस मामले में बेहद आगे रहे हैं। प्रेम में सफलता चाहिए तो टोटका हाजिर है। किसी दुश्मन को श्राप देना है तो उसकी भी व्यवस्था है। पैसा चाहिए तो समृद्धि वाला जादू अलग से उपलब्ध है। आपकी जितनी इच्छाएं हैं, उतने टोटके हमारे पास पहले से हैं। लेकिन हमने हमेशा माना कि अमेरिका जो भी करता है, सोच समझकर करता है। हमने दरवाजे पर नींबू- मिर्च टांगा, तो उसे पिछडापन कहा गया।
अब अमेरिकी उपनगर में घर के बाहर नीली बोतलें और बैंगनी दरवाजे दिखे तो उसे ‘एंटी एंग्जाइटी डेकोरेशन’ कहा जा रहा है। हम पूर्णिमा को व्रत रखें तो अंधविश्वास और कोई हॉलीवुड अभिनेत्री पूर्णिमा के चांद से पानी को ‘चार्ज’ करे तो वह ‘वेलनेस रूटीन’।
नींबू का ‘सब्सक्रिप्शन मॉडल’
सोचिए, एक अमेरिकी नागरिक सुबह नौ बजे जूम मीटिंग करता है, दोपहर में शेयर सूचकांक देखता है और शाम को टिकटॉक पर 15 डॉलर का डिस्काउंट कूपन लगाकर अपने बॉस के लिए ‘बुरी नजर’ का टोटका आर्डर करता है। यह तकनीक और तंत्र का ऐसा अद्भुत संगम है, जहां भक्ति और अंधविश्वास क्रेडिट कार्ड के स्वाइप पर उपलब्ध हैं। हमारे यहां, जो डायनें झाडू पर बैठकर उडती थीं, वे अमेरिका में ‘वर्क फ्रॉम होम’ कर रही हैं।
कॉर्पोरेट की नौकरी छोडकर 10 लाख फालोअर्स वाली ‘विच इन्फ्लुएंसर’ बनना यह साबित करता है कि पीपीटी बनाने से ज्यादा तनावमुक्त काम किसी के लिए श्राप लिखना है। कम से कम यहां क्लाइंट की ओर से 'रिवाइज्ड ड्राफ्ट' का झंझट तो नहीं है।
बहुत पहले अपने देश में आदमी नौकरी छोडकर साधु बनते थे। फिर योग गुरु बनने लगे। अब कोई दुकान खोल लेता है या कविताएं लिखने लगता है। इन दोनों ही कामों में नुकसान तय है। लेकिन अमेरिका की उस चतुर लड़की ने सीधे जादू-टोने का स्टार्टअप चालू कर दिया। अब उसे दफ्तर के बॉस से टार्गेट नहीं लेना पडता, बल्कि बॉस के खिलाफ लोगों को टोटके बेचती है। अब डायन बनकर भी करियर बनाया जा सकता है।
लेकिन यह बात गुजरी गुरु को बर्दाश्त नहीं हो रही कि इस मामले में कोई हमसे आगे निकल जाए। अब उन्हें कौन समझाए कि आदमी का दिमाग जब आधुनिक दुनिया की जटिलताओं और अनिश्चितताओं से थक जाता है, तो उसे कोई न कोई ऐसी चीज चाहिए होती है, जिसका कोई लॉजिक न हो। क्योंकि लॉजिक का हिसाब देना पडता है, टोटके का नहीं। अमेरिका ने हमें बहुत कुछ एक्सपोर्ट किया है। कोका कोला, जींस, हॉलीवुड और फिर डिप्रेशन।
अब ऐसा लगता है कि वे अपने डिप्रेशन का इलाज ढूंढने के लिए हमारी पुरानी अलमारियों में झांक रहे हैं। हमारे यहां तांत्रिक नींबू काटता रहा, अमेरिका नींबू का ‘सब्सक्रिप्शन मॉडल’ बेच रहा है।
‘कस्टम मेड श्राप’ और ‘डिस्काउंटेड टोटके’
समय सचमुच बहुत आगे निकल आया है। स्थिति ऐसी है, मानो अमेरिका में आधुनिकता की सबसे ऊंची इमारत के ऊपर एक कौआ बैठकर तंत्र का मंत्र पढ़ रहा हो। अमेरिका ने मानव जाति को सिखाया कि दुनिया में हर समस्या का समाधान तीन चीजों में है- डॉलर, वाई फाई और पिल्स। अब उसी अमेरिका में नया समाधान आया है-‘कस्टम मेड श्राप’ और ‘डिस्काउंटेड टोटके’।
संभव है कल कोई ‘एक श्राप खरीदिए, दूसरा आधी कीमत में’ जैसी योजना भी आ जाए। बाजार जब किसी चीज को स्वीकार कर लेता है तो फिर उसमें रहस्य कम और ऑफर ज्यादा रह जाते हैं।
और अब अगर आपका प्रेम सफल नहीं हो रहा, नौकरी नहीं लग रही या पड़ोसी आपसे नाराज है तो परेशान मत होइए। हो सकता है समस्या आपके सितारों में न हो। हो सकता है, आपने अभी तक सही ‘हैशटैग’ नहीं खोजा हो। जादू की असली ताकत शायद जादू में नहीं, आदमी के भरोसे में है। आदमी जब बहुत परेशान होता है तो उसे समाधान नहीं, आश्वासन चाहिए। विज्ञान समाधान देने में समय लगाता है। जादू तुरंत कह देता है, "चिंता मत करो, पूर्णिमा की रात सब ठीक हो जाएगा।"
और आदमी को इससे ज्यादा क्या चाहिए? अब प्रेम भी ऑनलाइन और श्राप भी ऑनलाइन । आदमी को अंधविश्वासी होने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं। लेकिन गुजरी गुरु के इस दर्द को कौन समझे! हम भारतीय तो इस मामले में सदियों से आत्मनिर्भर रहे। हमारे यहां चौराहे पर नींबू मिर्च टांगना या नीली बोतल रखना कोई नई बात नहीं है। हम पिछडे रह गए, क्योंकि हमने इसे व्यापार नहीं बनाया।
हम इसे अंधविश्वास मानकर छोडते चले गए, जबकि अमेरिकियों ने इसमें भी ‘स्टार्टअप पोटेंशियल’ ढूंढ लिया। वह कहते हैं, "याद रखो,अमेरिका हमसे आगे नहीं निकला है। उसने सिर्फ हमारी पुरानी विद्या पर ऐप बना दिया है।"
अगर इसे तरक्की कहें तो तमाम तरक्की के बीच दुनिया से अंधविश्वास खत्म नहीं हुआ। उसने सिर्फ अपना पता बदल लिया है। विज्ञान ने जादू-टोने को खत्म नहीं किया। उसने उसे इंटरनेट कनेक्शन दे दिया है।
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