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एफिल टॉवर विवाद: बिना जांच बीएपीएस को कटघरे में रखना उचित नहीं
बीएपीएस से जुड़े करीब 100 लोगों के प्रतिनिधिमंडल के निजी दौरे के दौरान आरोप लगा कि महिला कर्मचारियों को कुछ स्थानों से हटाया गया। उनके साथ प्रतिनिधिमंडल का संपर्क सीमित किया गया। इसके बाद एफिल टॉवर के कर्मचारियों में नाराजगी हुई, विरोध हुआ।
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एफिल टावर
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
फ्रांस की राजधानी पेरिस में नवनिर्मित स्वामीनारायण हिंदू मंदिर मात्र पत्थरों से खड़ा हुआ धार्मिक परिसर नहीं है। यह उस भारत की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है, जो अपनी हजारों वर्ष पुरानी परंपराओं, स्थापत्य कला, आध्यात्मिक विचार और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना के साथ दुनिया के सामने खड़ा है।
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पेरिस में बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था (बीएपीएस) स्वामीनारायण हिंदू मंदिर का उद्घाटन इसी दृष्टि से एक महत्वपूर्ण घटना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी वीडियो संदेश के माध्यम से मंदिर के उद्घाटन समारोह में इसे भारत-फ्रांस के सांस्कृतिक संबंधों में नया पड़ाव बताया और कहा कि यह मंदिर फ्रांस की विविधता को समृद्ध करेगा, लेकिन इस ऐतिहासिक अवसर के ठीक बाद एफिल टॉवर से जुड़ा विवाद सामने आ गया।
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दरअसल, बीएपीएस से जुड़े करीब 100 लोगों के प्रतिनिधिमंडल के निजी दौरे के दौरान आरोप लगा कि महिला कर्मचारियों को कुछ स्थानों से हटाया गया। उनके साथ प्रतिनिधिमंडल का संपर्क सीमित किया गया। इसके बाद एफिल टॉवर के कर्मचारियों में नाराजगी हुई, विरोध हुआ। 7 सितंबर को टॉवर का संचालन भी प्रभावित हुआ।
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पेरिस प्रशासन ने इन आरोपों की जांच शुरू कर दी। मामला गंभीर है, लेकिन इससे भी गंभीर है, आरोप और प्रमाण के बीच की दूरी को खत्म कर देना। आज इस घटना को लेकर जिस तरह की सुर्खियां बन रही हैं, उनमें एक हिंदू धार्मिक संगठन का नाम, हिंदू धर्म और भारत की पहचान कई जगह एक-दूसरे के साथ जोड़कर प्रस्तुत की जा रही है।
बीएपीएस पर लगे किसी भी आरोप की जांच होनी चाहिए, यदि गलती हुई है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए, लेकिन किसी एक संस्था से जुड़े विवाद को पूरे हिंदू समाज या पूरे भारत के चरित्र का प्रमाण बना देना न न्यायसंगत है और न तथ्यपरक।
एफिल टॉवर का संचालन करने वाली संस्था सोसिएटे डी'एक्सप्लोइटेशन डे ला टूर एफिल (एसईटीई) का दावा है कि बीएपीएस प्रतिनिधिमंडल की ओर से दौरे को इस तरह व्यवस्थित करने का अनुरोध किया गया था कि महिलाओं के साथ बातचीत या संपर्क सीमित रहे।
एसईटीई ने यह भी कहा कि ऐसी शर्त स्वीकार नहीं की जानी चाहिए थी, लेकिन गंभीर सवाल यह है कि एसईटीई ने क्या बीएपीएस का वह मूल लिखित अनुरोध सार्वजनिक किया है? अब तक उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों में ऐसा कोई मूल ई-मेल, पत्र, हस्ताक्षरित अनुरोध या अन्य प्राथमिक दस्तावेज सामने नहीं आया है।
विडंबना यह है कि आज सोशल मीडिया के दौर में आरोप कुछ घंटों में फैसला बन जाता है। किसी संगठन को दोषी ठहराना आसान है, लेकिन तथ्य तक पहुंचना कठिन है। यही इस घटना के साथ हो रहा है।
बीएपीएस ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि प्रतिनिधिमंडल की संख्या बड़ी होने के कारण एफिल टॉवर की टीम के साथ समन्वय करके यात्रा सामान्य खुलने के समय की शुरुआत में रखी गई थी, ताकि दूसरे पर्यटकों को कम से कम असुविधा हो। उसकी जानकारी में किसी को भी एफिल टॉवर में प्रवेश करने से नहीं रोका गया।
हालांकि, बीएपीएस ने स्थिति से किसी को हुई पीड़ा या असुविधा के लिए माफी मांगी और आपसी सम्मान व दूसरों की सेवा के मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। हालांकि, केवल एकतरफा आरोप लगाने के बजाय बीएपीएस को उसी गंभीरता से सुना जाना चाहिए, जिस गंभीरता से आरोपों को सुना जा रहा है।
बड़ा सवाल यह भी है कि यदि कोई ऐसा अनुरोध किया गया था तो उसे स्वीकार किसने किया? एसईटीई स्वयं कह रहा है कि ऐसी शर्त स्वीकार नहीं की जानी चाहिए थी। इसका अर्थ है कि एफिल टॉवर प्रबंधन की भूमिका भी सवालों से बाहर नहीं है।
किसी सार्वजनिक स्थल पर कर्मचारियों की नियुक्ति और उनके साथ समान व्यवहार सुनिश्चित करना प्रबंधन की जिम्मेदारी है। यदि प्रबंधन ने किसी धार्मिक प्रतिनिधिमंडल की सुविधा के लिए अपने महिला कर्मचारियों को उनके कार्यस्थल से हटाया तो यह केवल प्रतिनिधिमंडल का सवाल नहीं रह जाता।
यह प्रबंधन की प्रशासनिक जिम्मेदारी का सवाल बनता है। इसलिए पूरे विवाद का निष्पक्ष निष्कर्ष तभी निकलेगा, जब यह पता चले कि अनुरोध किसने किया, किस रूप में किया, किसने उसे स्वीकार किया और उसे लागू करने का निर्णय किस स्तर पर हुआ।
बीएपीएस कोई स्थानीय या छोटा धार्मिक समूह नहीं है। दुनिया में उसके 1,300 से अधिक मंदिर और 5,025 केंद्र हैं। संगठन भारत के अलावा यूरोप, ब्रिटेन, अमेरिका, अफ्रीका, मध्य-पूर्व और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सक्रिय है। इन मंदिरों में धार्मिक गतिविधियों के साथ शिक्षा, सामाजिक सेवा, सांस्कृतिक कार्यक्रम और स्वयंसेवी कार्य होते हैं।
बीएपीएस के 55 हजार पुरुष और महिला स्वयंसेवक विभिन्न गतिविधियों में योगदान करते हैं। इसलिए बीएपीएस में पुरुषों और महिलाओं की सभी भूमिकाएं एक जैसी हैं। ऐसे में एफिल टॉवर में महिला कर्मचारियों को हटाने के आरोप गले नहीं उतरते हैं।
फ्रांस में लैंगिक समानता को लेकर संवेदनशीलता स्वाभाविक है। इसलिए वहां राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज हुई। पेरिस के मेयर ने जांच की घोषणा की और फ्रांसीसी नेताओं ने सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की समान भागीदारी पर जोर दिया।
फ्रांस को अपने मूल्यों की रक्षा करने का पूरा अधिकार है, लेकिन उसी के साथ यह भी जरूरी है कि किसी धार्मिक समुदाय के विषय में धारणा आरोपों और जांच के परिणाम के आधार पर बने, पूर्वाग्रह के आधार पर नहीं। यदि बीएपीएस से गलती हुई है तो उसकी आलोचना होनी चाहिए। यदि एफिल टॉवर प्रबंधन ने गलती की है तो उसकी भी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।