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कुंभ बनाम शिक्षा का सवाल: क्या आस्था और विकास को आमने-सामने खड़ा करना उचित है?

Tue, 25 Aug 2026 01:17 PM IST
Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Tue, 25 Aug 2026 01:17 PM IST
सार
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अब प्रयागराज महाकुंभ-2025 को लें। इस आयोजन के लिए करीब 7,000 करोड़ रुपए उत्तर प्रदेश व केंद्र सरकार ने विकास और आयोजन संबंधी कार्यों पर खर्च किए, लेकिन महाकुंभ ने आस्था के साथ अर्थव्यवस्था को भी बड़ा बूस्ट दिया। एक अनुमान के अनुसार इससे करीब 2 लाख करोड़ रुपए की आर्थिक गतिविधि हुईं।

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Kumbh vs Education: Is it appropriate to pit faith and development against each other
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की एक टिप्पणी ने कुंभ और शिक्षा को लेकर बहस छेड़ दी है। नासिक में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने मराठी माध्यम के स्कूलों की खराब होती स्थिति पर चिंता जताई और कहा कि नासिक कुंभ के लिए निर्धारित करीब 32 हजार करोड़ रुपए में से केवल 0.1 प्रतिशत राशि भी खर्च की जाती तो 100 से अधिक मराठी स्कूलों को बचाया जा सकता है।

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शिक्षा की स्थिति को लेकर न्यायमूर्ति वराले की चिंता अपनी जगह बिल्कुल जायज है। स्कूलों की हालत खराब हो, बच्चे सुविधाओं से वंचित हों और शिक्षक तथा संसाधनों की कमी हो तो सरकार से सवाल पूछा ही जाना चाहिए। 
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आखिर शिक्षा किसी भी समाज के भविष्य का आधार है, लेकिन इसी के साथ एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या शिक्षा की समस्या का समाधान कुंभ के बजट में ही तलाशना चाहिए? क्या एक धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन पर होने वाला खर्च स्वाभाविक रूप से शिक्षा के लिए संभावित नुकसान है?
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अगर किसी राज्य के स्कूलों को तत्काल धन की जरूरत है तो क्या उसके लिए सरकार के पास कुंभ के अलावा कोई दूसरा बजट नहीं है? यहीं से इस बहस को थोड़ा व्यापक बनाने की जरूरत महसूस होती है।

अब प्रयागराज महाकुंभ-2025 को लें। इस आयोजन के लिए करीब 7,000 करोड़ रुपए उत्तर प्रदेश व केंद्र सरकार ने विकास और आयोजन संबंधी कार्यों पर खर्च किए, लेकिन महाकुंभ ने आस्था के साथ अर्थव्यवस्था को भी बड़ा बूस्ट दिया। एक अनुमान के अनुसार इससे करीब 2 लाख करोड़ रुपए की आर्थिक गतिविधि हुईं।

व्यापारिक संगठनों के आकलन 3.25 लाख करोड़ तक का है। महाकुंभ ने पर्यटन, परिवहन, होटल, व्यापार और सेवा क्षेत्र को गति दी। लाखों लोगों की आजीविका को सहारा मिला। हालांकि, कुंभ भारत की कोई नई बनाई गई परंपरा नहीं है।

कुंभ को केवल एक सरकारी कार्यक्रम की तरह देखना शायद उचित नहीं होगा। सरकार आयोजन की व्यवस्था करती है, लेकिन कुंभ की असली ताकत करोड़ों श्रद्धालुओं की भागीदारी है।

बड़ा सवाल यह है कि क्या आस्था और शिक्षा एक-दूसरे के विरोधी हैं? यह शायद इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। भारत में मंदिर और धार्मिक संस्थाएं केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रही हैं। अनेक मंदिर और धार्मिक ट्रस्ट शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में भी काम करते हैं। तिरुमला तिरुपति देवस्थानम इसका बड़ा उदाहरण है।

वह स्कूलों, कॉलेजों, संस्कृत एवं प्राच्य शिक्षा संस्थानों, अन्य शैक्षणिक संस्थाओं के संचालन और सहयोग से जुड़ा है। देश के अलग-अलग हिस्सों में मंदिरों, मठों और धार्मिक संस्थाओं द्वारा गुरुकुल, छात्रावास, विद्यालय, संस्कृत पाठशालाएं और आधुनिक शिक्षण संस्थान चलाए जाते हैं।

फिर सवाल यह क्यों न हो कि धार्मिक संस्थाओं को शिक्षा व स्वास्थ्य में और अधिक योगदान के लिए कैसे प्रेरित किया जाए? अगर मंदिर शिक्षा में पैसा लगाता है तो उसका स्वागत होना चाहिए। अगर कोई धार्मिक संस्था अस्पताल बनाती है तो उसका स्वागत होना चाहिए। 

उसी तरह सरकार यदि किसी बड़े धार्मिक आयोजन के दौरान सड़क, पुल, सीवेज, अस्पताल और सार्वजनिक सुविधाओं का निर्माण करती है तो उसका भी मूल्यांकन उसके परिणामों के आधार पर होना चाहिए। 

स्कूलों की हालत खराब है तो जिम्मेदारी किसकी है? यह सवाल सरकार से पूछा जाना चाहिए। अगर किसी जिले में स्कूल जर्जर हैं तो उनके लिए शिक्षा विभाग का बजट क्या कर रहा है? अगर शिक्षक नहीं हैं तो नियुक्तियां क्यों नहीं हो रही हैं?

अगर भवन की जरूरत है तो निर्माण के लिए धन क्यों नहीं है? अगर बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं मिल रही तो उसकी जवाबदेही किसकी है? क्या इन समस्याओं का समाधान केवल कुंभ का बजट घटाकर किया जा सकता है? उत्तर होगा- बिल्कुल नहीं। कुंभ का बजट एक विशेष आयोजन और उससे जुड़े बुनियादी ढांचे के लिए है।

शिक्षा का बजट अलग है। केंद्र और राज्य सरकारों के पास शिक्षा के लिए अलग-अलग योजनाएं और नियमित बजट हैं। इसलिए यह तर्क कि कुंभ पर खर्च हुआ पैसा सीधे स्कूलों में लगा दिया जाता तो शिक्षा की समस्या हल हो जाती, अपने आप में बहुत सरल निष्कर्ष होगा।

जरा, नासिक कुंभ के लिए निर्धारित 32,000 करोड़ रुपए का उदाहरण लें। यदि इसका 0.1 प्रतिशत निकाला जाए तो राशि 32 करोड़ रुपए होती है। सवाल यह है कि यदि 32 करोड़ से 100 स्कूलों की समस्या हल हो सकती है तो क्या सरकार के पास शिक्षा के लिए 32 करोड़ रुपए उपलब्ध नहीं होने चाहिए? अगर नहीं हैं तो समस्या कुंभ नहीं, बजट प्राथमिकताओं और प्रशासनिक व्यवस्था की है।

एक और सवाल यह भी उठता है। क्या भारत में धार्मिक आयोजनों को देखने का हमारा नजरिया समान है? कुंभ हिंदू आस्था का बड़ा आयोजन है। इसलिए उसके खर्च पर सवाल उठना स्वाभाविक रूप से गलत नहीं है।

सार्वजनिक धन है तो उसका हिसाब होना चाहिए, लेकिन यही कसौटी हर बड़े धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक आयोजन पर लागू होनी चाहिए। सवाल कुंभ के खिलाफ नहीं होना चाहिए। सवाल सार्वजनिक धन के इस्तेमाल की पारदर्शिता पर होना चाहिए।

कुंभ पर कितना खर्च हुआ? किस मद में हुआ? उसमें से कितना स्थायी इंफ्रास्ट्रेक्चर बना? उसका उपयोग अगले दस या बीस साल तक स्थानीय लोगों को कैसे मिलेगा? कुंभ से स्थानीय कारोबार को कितना लाभ हुआ? कितने लोगों को रोजगार मिला? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए। यही स्वस्थ लोकतांत्रिक बहस होगी।

भारत को शिक्षा भी चाहिए और संस्कृति भी। आधुनिक इंफ्रास्ट्रेक्चर भी चाहिए और अपनी सभ्यतागत पहचान भी। इनमें से किसी एक को चुनना जरूरी नहीं है। एक बच्चा अच्छा स्कूल पाए, यह भी जरूरी है। एक तीर्थस्थल पर आने वाले श्रद्धालु को सुरक्षित सड़क और स्वच्छ पानी मिले, यह भी जरूरी है।

किसी गांव के बच्चे को छात्रवृत्ति मिले, यह भी जरूरी है। किसी प्राचीन सांस्कृतिक आयोजन की व्यवस्था आधुनिक बने, यह भी जरूरी है। विकास का अर्थ किसी एक आवश्यकता को दूसरी आवश्यकता के विरुद्ध खड़ा करना नहीं है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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