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दूसरा पहलू: ब्रह्मांड के 'लिटिल रेड डॉट्स' का रहस्य
Thu, 03 Sep 2026 07:14 AM IST
निर्मल कांत
एंड्रयू बैटिस्टी
एंड्रयू बैटिस्टी
Published by: निर्मल कांत
Updated Thu, 03 Sep 2026 07:14 AM IST
लिटिल रेड डॉट्स उस समय के हैं, जब ब्रह्मांड करीब एक अरब साल पुराना था। इनकी रोशनी को पृथ्वी तक पहुंचने में अरबों साल लगे हैं।
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ब्रह्मांड (सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
2023 में जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (जेडब्ल्यूएसटी) ने ब्रह्मांड में कुछ रहस्यमय चमकीले लाल बिंदुओं की खोज की। इन्हें ‘लिटिल रेड डॉट्स’ कहा गया। ये उस समय के हैं, जब ब्रह्मांड करीब एक अरब साल पुराना था। इनकी रोशनी को पृथ्वी तक पहुंचने में अरबों साल लगे हैं। अब नेचर एस्ट्रोनॉमी में प्रकाशित एक नए शोध ने इन रहस्यमयी लाल बिंदुओं की प्रकृति को समझने के लिए अहम सुराग दिए हैं।
हालांकि, इन लाल बिंदुओं की असली प्रकृति अब तक स्पष्ट नहीं है। वैज्ञानिकों के अनुसार, एक प्रमुख संभावना यह है कि इनमें से ज्यादातर युवा सुपरमैसिव ब्लैक होल्स हैं, जो तेजी से पदार्थ को अपनी ओर खींच रहे हैं। इनके आसपास बनने वाला बेहद चमकीला क्षेत्र किसी तारे की सतह जैसा दिखाई दे सकता है। इसी कारण इन्हें ‘ब्लैक होल स्टार्स’ भी कहा जाता है। दूसरी संभावना यह है कि ये ऐसे क्षेत्रों में मौजूद हों, जहां बहुत तेजी से तारों का निर्माण हो रहा हो और विशाल आकाशगंगाएं बन रही हों। इसे समझने के लिए शोधकर्ताओं ने कॉसमॉस-वेब क्षेत्र की जेडब्ल्यूएसटी तस्वीरों का अध्ययन किया। नतीजों से पता चला कि आकाशगंगाएं इन रेड डॉट्स की कुल लाल रोशनी का केवल करीब 10 प्रतिशत हिस्सा ही बनाती हैं और आकार में भी छोटी हैं। वहीं, रेड डॉट्स से जुड़े सुपरमैसिव ब्लैक होल्स का अनुमानित द्रव्यमान सूर्य से करीब एक करोड़ से 100 करोड़ गुना तक हो सकता है। इससे संकेत मिलता है कि ब्लैक होल्स ने अपनी अधिकांश वृद्धि उसी समय कर ली थी, जब उनकी आकाशगंगाओं में बहुत कम तारे बने थे।
अगर यह निष्कर्ष सही साबित होता है, तो लिटिल रेड डॉट्स शुरुआती ब्रह्मांड के विकास की हमारी समझ को बदल सकते हैं। वे यह जानने की अहम कड़ी बन सकते हैं कि सुपरमैसिव ब्लैक होल्स और आकाशगंगाएं आखिर एक-दूसरे के साथ कैसे विकसित हुईं। हालांकि, ये अब भी वैज्ञानिकों के लिए रहस्य बने हुए हैं।
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हालांकि, इन लाल बिंदुओं की असली प्रकृति अब तक स्पष्ट नहीं है। वैज्ञानिकों के अनुसार, एक प्रमुख संभावना यह है कि इनमें से ज्यादातर युवा सुपरमैसिव ब्लैक होल्स हैं, जो तेजी से पदार्थ को अपनी ओर खींच रहे हैं। इनके आसपास बनने वाला बेहद चमकीला क्षेत्र किसी तारे की सतह जैसा दिखाई दे सकता है। इसी कारण इन्हें ‘ब्लैक होल स्टार्स’ भी कहा जाता है। दूसरी संभावना यह है कि ये ऐसे क्षेत्रों में मौजूद हों, जहां बहुत तेजी से तारों का निर्माण हो रहा हो और विशाल आकाशगंगाएं बन रही हों। इसे समझने के लिए शोधकर्ताओं ने कॉसमॉस-वेब क्षेत्र की जेडब्ल्यूएसटी तस्वीरों का अध्ययन किया। नतीजों से पता चला कि आकाशगंगाएं इन रेड डॉट्स की कुल लाल रोशनी का केवल करीब 10 प्रतिशत हिस्सा ही बनाती हैं और आकार में भी छोटी हैं। वहीं, रेड डॉट्स से जुड़े सुपरमैसिव ब्लैक होल्स का अनुमानित द्रव्यमान सूर्य से करीब एक करोड़ से 100 करोड़ गुना तक हो सकता है। इससे संकेत मिलता है कि ब्लैक होल्स ने अपनी अधिकांश वृद्धि उसी समय कर ली थी, जब उनकी आकाशगंगाओं में बहुत कम तारे बने थे।
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अगर यह निष्कर्ष सही साबित होता है, तो लिटिल रेड डॉट्स शुरुआती ब्रह्मांड के विकास की हमारी समझ को बदल सकते हैं। वे यह जानने की अहम कड़ी बन सकते हैं कि सुपरमैसिव ब्लैक होल्स और आकाशगंगाएं आखिर एक-दूसरे के साथ कैसे विकसित हुईं। हालांकि, ये अब भी वैज्ञानिकों के लिए रहस्य बने हुए हैं।
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