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दूसरी पारी: उम्र भले बढ़े, जिंदगी न थमने पाए

Fri, 16 Oct 2026 08:07 AM IST
निर्मल कांत दीपक चोपड़ा, प्रख्यात लेखक
दीपक चोपड़ा, प्रख्यात लेखक Published by: निर्मल कांत Updated Fri, 16 Oct 2026 08:07 AM IST
सार
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उम्र बढ़ना एक जैविक प्रक्रिया है, लेकिन उम्र के साथ खुद को कमजोर मान लेना एक मानसिक धारणा है। दीपक चोपड़ा बताते हैं कि 75 साल की उम्र में भी इन्सान अपनी सोच, आदतों और सक्रियता से नई ऊर्जा जगा सकता है।

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Second Innings: Age May Increase, But Life Must Go On
उम्र बढ़ना एक जैविक प्रक्रिया - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक

विस्तार

अक्सर हम उम्र बढ़ने को शारीरिक कमजोरी, याददाश्त घटने और दूसरों पर निर्भर होने से जोड़कर देखने लगते हैं। हम मान लेते हैं कि अब पहले जैसी चुस्ती नहीं रही, नई चीजें सीखना मुश्किल है और बदलाव की गुंजाइश कम हो गई है। पर, क्या बढ़ती उम्र का अर्थ केवल यही है? क्या उम्र के साथ हमारी संभावनाएं भी खत्म हो जाती हैं? वास्तव में, वृद्धावस्था शरीर में कम, सोच में ज्यादा उतरती है। हम उम्र को किस नजरिये से देखते हैं और अपने शरीर, आदतों व जीवन के प्रति कितने सजग रहते हैं, इनसे ही जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होती है। इसलिए, बढ़ती उम्र को सक्रियता, आत्मविश्वास और नई संभावनाओं के साथ जीने के लिए कुछ जरूरी बातों पर ध्यान देना जरूरी है।
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75 की उम्र में 55 की जवानी : वर्ष 1979 में हार्वर्ड की मनोवैज्ञानिक एलेन लैंगर ने 75 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गों पर एक प्रयोग किया। उन्हें एक सप्ताह ऐसे माहौल में रखा गया, जो 1959 जैसा था। वहां पुरानी पत्रिकाएं थीं और उस दौर का संगीत बज रहा था। उनसे कहा गया कि वे खुद को 55 साल का समझें और अपने काम खुद करें। सात दिनों में उनके व्यवहार और शारीरिक क्षमता में सुधार दिखा। जिन बुजुर्गों को दूसरों के सहारे की आदत पड़ चुकी थी, वे पूरी तरह आत्मनिर्भर दिखने लगे। उनके चेहरों की चमक लौट आई और वे औसतन तीन वर्ष अधिक युवा दिखाई देने लगे। उनके जकड़े हुए जोड़ों में नई लचक आ गई, रीढ़ की हड्डी तन गई, चाल सीधी हो गई और पकड़ मजबूत हो गई। इससे पता चला कि बुजुर्गों को आत्मनिर्भर और सक्रिय रहने के लिए प्रेरित करने से उनके शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर पड़ता है।
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निर्णयों की बागडोर खुद संभालें : आपका जीवन कैसा होगा, यह काफी हद तक आपकी सोच और आदतों पर निर्भर करता है। अगर आप हर समय उम्र, कमजोरी व बीमारी के बारे में सोचेंगे, तो आपका उत्साह कम होने लगेगा। पर, खुद को सक्रिय और उपयोगी बनाए रखने की सोच जीवन में नई ऊर्जा भर सकती है। इसलिए, घर के छोटे-मोटे काम करें, पौधों की देखभाल करें, रोज थोड़ा टहलें और पर्याप्त पानी पिएं। अपने फैसले खुद लेने की कोशिश करें। मन से यह विचार निकाल दें कि ‘मैं बूढ़ा हो चुका हूं।’
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हर कमजोरी वृद्धावस्था की निशानी नहीं : अक्सर बुजुर्गों में लड़खड़ाते कदम, कमजोर याददाश्त और थकान के लक्षण को उम्र का तकाजा मान लिया जाता है, जबकि इनके पीछे पोषण व पानी की कमी, दवाओं के दुष्प्रभाव, अनिद्रा व अवसाद जैसे कारण भी हो सकते हैं। क्योंकि, जब हम शरीर से ध्यान हटा लेते हैं, तो कमजोरी घर करने लगती है। यदि आप थोड़ा सजग हो जाएं, दिनचर्या और दृष्टिकोण को नया रंग दें, तो वृद्धावस्था को जीवंत बनाया जा सकता है।
जीवन का असली आनंद उम्र में नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, सक्रियता और हर दिन नए उत्साह के साथ जीने में है।

      -मंजुल प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक एजलेस बॉडी, टाइमलेस माइंड के अंश

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