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पेरिस के एफिल टॉवर में उस दिन क्या हुआ था?
गहन जांच के बाद यह स्पष्ट हुआ कि एफिल टॉवर संतों की वजह से नहीं, बल्कि फ्रेंच ट्रेड यूनियन (CGT) द्वारा प्रबंधन के खिलाफ पूर्व-नियोजित राजनीतिक हड़ताल के कारण बंद हुआ था। प्रत्येक वैश्विक पर्यटन स्थल के पास आधिकारिक VIP/डेलीगेशन स्लॉट होते हैं।
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एफिल टावर।
- फोटो : Adobe Stock
विस्तार
यह सर्वमान्य सत्य है कि एक स्त्री की भावना और सम्मान की गहरी समझ एक स्त्री को विशेष रूप से होती है। अतः एक नारी होने के नाते, यह मेरा कर्तव्य है कि नारी-सम्मान के नाम पर फैलाई जा रही भ्रामक धारणाओं के सामने अपना अभिप्राय और अनुभव स्पष्ट करूं।
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अभी कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों ने एक नया विवाद खड़ा किया कि 'एफिल टॉवर पर जाते समय BAPS संस्था ने संपूर्ण महिला स्टाफ के स्थान पर पुरुष स्टाफ को बुलवाया और महिलाओं को वहाँ से हटाकर अपमानित किया।' आपको जानकार आश्चर्य होगा कि इस घृणित अफवाह का बीज और मकसद कुछ और ही था।
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हड़ताल का सच:
गहन जांच के बाद यह स्पष्ट हुआ कि एफिल टॉवर संतों की वजह से नहीं, बल्कि फ्रेंच ट्रेड यूनियन (CGT) द्वारा प्रबंधन के खिलाफ पूर्व-नियोजित राजनीतिक हड़ताल के कारण बंद हुआ था। प्रत्येक वैश्विक पर्यटन स्थल के पास आधिकारिक VIP/डेलीगेशन स्लॉट होते हैं।
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किसी यात्रा की अनुमति देना या न देना शत-प्रतिशत प्रबंधन कंपनी (SETE) का वैधानिक अधिकार है। जब अनुमति प्रबंधन ने दी थी, तो फिर अतिथि संतों पर दोष मढ़ना सर्वथा निराधार है। 'कसूर किसी और का, और सजा किसी और को!'
कोई मांग नहीं की गई:
संतों ने महिला स्टाफ को हटाने की कोई भी माँग नहीं की थी। BAPS के लिखित निवेदन से भी यह बात स्पष्ट होती है।
पूर्व-निर्धारित व्यवस्था:
संतों का यह दौरा सुबह 8:00 से 9:00 बजे के बीच एक निजी स्लॉट में निर्धारित था; जबकि आम पर्यटकों के लिए टॉवर खुलने का समय ही सुबह 9:15 बजे था। यानी मांग तो केवल सुबह जल्दी दौरा कराए जाने की थी ताकि अन्य टूरिस्ट आए उनसे पहले ही संतों का दौरा समाप्त हो जाए। यह भी प्रबंधन कंपनी के सामने रखी विनती थी, जिसे मानना, न मानना पूरी तरह उनका मसला था। फिर भला व्यर्थ का बतंगड़ क्यों बनाया गया?
टीवी स्क्रीन पर भ्रामक उपदेश:
कुछ प्रसिद्ध मीडिया और सोश्यल मीडिया के एंकर्स ने बड़े ही अभद्र भाषा में संतों को उलाहना दिया और बेबुनियाद गंभीर आरोप लगाए।
हँसी तो तब आती है, जब दसवीं फ़ैल यूट्यूबर्स संतों को जाहिल कह रहे थे। शायद वे लोग नहीं जानते होंगे कि BAPS के संत अत्यंत उच्च शिक्षित होते हैं।
इनमें बड़ी संख्या में डॉक्टर, इंजिनियर, एमबीए, सीए, प्रोफेसर, वैज्ञानिक, पायलट एवं अन्य विद्या शाखाओं में स्नातक हैं।
दूसरे विस्मय की बात तो यह है कि कुछ एंकर्स कह रहे थे कि फ़्रांस और अन्य विकसित देशों में तुम्हारा यह गँवारपन नहीं चलेगा। ये संत देश का नाम ख़राब कर रहे हैं।
उन सभी से मैं यह कहती हूँ कि आप जिन्हें समता, बंधुता का उपदेश दे रहे हैं, उनका जन्म और पढ़ाई इन्हीं विकसित देशों में हुई है। जी हाँ, BAPS के अनेक संतों का जन्म स्थान ही अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया हैं। अनेक वर्षों पूर्व उनके माता पिता भारतीय संस्कृति और संस्कार लेकर यहाँ बस चुके थे।
उन्होंने अपने बच्चों को सनातन के संस्कार तो दिए ही साथ ही हार्वर्ड, पेन्सिल्वेनिया, न्यू यॉर्क, बर्कली, जॉन होपकिंस, ऑक्सफोर्ड, केम्ब्रिज जैसी यूनिवर्सिटी में पढ़ाया और सहर्ष समाज और अध्यात्म की सेवा में अर्पित किए। सच तो यह है कि सेवा और सदुपदेश से ये संत देश का नाम रोशन कर रहे हैं।
वस्तुत: संस्था के गुरु या अन्य संतों ने कभी भी महिलाओं का अपमान नहीं किया। केन्या की पूर्व द्वितीय महिला (Second Lady of Kenya) और पूर्व उप-राष्ट्रपति रिगाथी गचागुआ (Rigathi Gachagua) की धर्मपत्नी 'पास्टर डॉ. डोरकस रिगाथी' (Pastor Dr. Dorcas Rigathi), जो एक पास्टर (ईसाई धर्मगुरु), शिक्षाविद् और समाजसेविका के रूप में विख्यात हैं; उन्होंने कहा था कि, “Pramukh Swami Maharaj is a champion of women’s development.” अर्थात् ‘प्रमुख स्वामी महाराज ने स्त्री जीवन को सदैव आगे बढ़ाया है।’ तो उसी संस्था के संत स्त्रियों को कैसे पीछे धकेल सकते हैं?
सर जॉन मैल्कम (तत्कालीन बॉम्बे के गवर्नर - 1830) कह कर गए थे कि “स्वामिनारायण ने कन्या भ्रूण/शिशु हत्या और सतीप्रथा जैसे क्रूर रिवाजों को बंद करवाकर लाखों स्त्रियों का जीवन बचाया और समाज में नैतिक क्रांति का सूत्रपात किया।”
न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी (New York University, USA) में मानवविज्ञानी (Anthropologist) प्रोफेसर हाना किम (Hana Kim) ने अपने शोध और प्रबंध में BAPS संप्रदाय में महिला सशक्तिकरण और नारी-गरिमा की मुक्तकंठ से सराहना की है।
उन्होंने कहा, “मैं दृढ़ता से अनुभव करती हूँ कि BAPS की अग्रिम पंक्ति में महिलाएं और युवतियां हैं।”
इन सभी प्रमाणों द्वारा यह तो स्वतः सिद्ध हो जाता है कि पेरिस में किसी भी प्रकार से नारी के अपमान की बात ही नहीं थी। BAPS संस्था के वर्तमान प्रमुख पूज्य महंत स्वामी महाराज ने अपने हस्तलिखित ग्रंथ 'सत्संग दीक्षा' में स्पष्ट उद्घोष किया है: 'कल्याण में स्त्री और पुरुष का कोई भेद नहीं है, भगवान की भक्ति और मोक्ष में सभी का समान अधिकार है।' जो संस्था और संत आत्यंतिक मोक्ष के शिखर पर भी स्त्रियों को पुरुषों के समान परम अधिकार और आदर देते हैं, वे उनके लौकिक अधिकारों का हनन कैसे कर सकते हैं?
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।