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सुरक्षा और चिंताएं: बैंक खाते तक पहुंच रहे एआई एजेंट, सुविधा के साथ बढ़ा खतरा; पैसे कटे तो जिम्मेदार कौन होगा?

Thu, 29 Oct 2026 06:58 AM IST
शिवम गर्ग प्रवीण कौशल
प्रवीण कौशल Published by: शिवम गर्ग Updated Thu, 29 Oct 2026 06:58 AM IST
सार
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भारत सहित दुनियाभर की बैंकिंग प्रणाली में एआई एजेंट्स का बढ़ता चलन बेशक सुविधाजनक हो, पर यही सुरक्षा के लिए नई चुनौती भी बन रहे हैं।

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AI Agent in Banking: Digital Payment Convenience Raises Cybersecurity and Privacy Concerns
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ANI

विस्तार

मान लीजिए कि आप अपने बिलों का भुगतान करने में मदद के लिए किसी व्यक्ति को काम पर रखते हैं और अपनी नेट बैंकिंग का पासवर्ड उसे सुपुर्द कर देते हैं। अब सोचिए कि क्या आपके बैंक के पास यह पहचानने का कोई तरीका है कि खाते का इस्तेमाल आप कर रहे हैं या आपका मददगार वह व्यक्ति? हाल ही में, अमेरिका के कई बड़े बैंकों ने लगभग इसी तरह की समस्या की ओर इशारा किया।
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एक्सिओस की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका के कई मशहूर बैंकों को ग्राहकों के खातों में एआई एजेंट मिले हैं। ये वे एआई एजेंट नहीं हैं, जिन्हें बैंकों ने बनाया है या इस्तेमाल करने की मंजूरी दी है। बल्कि, ये वे एजेंट हैं, जिन्हें ग्राहकों ने खुद अपने खातों तक पहुंच दी है। ये एजेंट ऐसे काम करते हुए भी दिखाई दिए, जिनके लिए ग्राहकों ने उन्हें निर्देश नहीं दिए थे। हालांकि, अभी तक ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं आई है कि किसी एजेंट ने अपने आप पैसे इधर-उधर किए हों। पर, समस्या गंभीर है और इसकी वजह कुछ अजीब।
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दरअसल, इन एआई एजेंटों ने बैंक खातों में अपने आप सेंध नहीं लगाई, बल्कि लोगों ने खुद उन्हें अपने खातों तक पहुंच बनाने दी। मसलन, आप कोई एआई सहायक इस्तेमाल करते हैं और उससे कोई बिल भरने के लिए कहते हैं। इसके लिए वह आपसे बैंक का लॉगिन विवरण मांगता है। आप उसे सारी जानकारी दे देते हैं। उस पल से, जब भी वह लॉगिन करता है, बैंक को लगता है कि आप ही लॉगिन कर रहे हैं। बैंक के पास यह पहचानने का कोई आसान तरीका नहीं है कि लॉगिन आप कर रहे हैं या वह एआई एजेंट। बैंक आमतौर पर ऐसी सुरक्षा प्रणालियों का इस्तेमाल करते हैं, जो किसी अनजान व्यक्ति के असामान्य समय या जगह से खाते में लॉगिन करने पर सतर्क हो जाती हैं। पर, यह पूरी व्यवस्था इस धारणा पर टिकी है कि बैंक आपके और किसी दूसरे व्यक्ति के बीच अंतर कर सकता है। एआई एजेंटों के मामले में यही बुनियादी धारणा कमजोर पड़ गई है।
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इसके पीछे एक और समस्या भी है। बैंक के लॉगिन में ऐसा कोई विकल्प नहीं होता कि एजेंट खाते में जमा रकम और लेनदेन का ब्योरा तो देख सके, पर पैसे निकाल या ट्रांसफर न कर सके। यानी, वह जिस पासवर्ड से आपका बैंक स्टेटमेंट पढ़ सकता है, उसी से पैसे ट्रांसफर कर सकता है या कोई अन्य काम भी कर सकता है। ऐसे में, गंभीर सवाल यही है कि नुकसान होने पर भरपाई कौन करेगा? अमेरिकी बैंकों के रुख से संकेत मिलता है कि अगर कोई व्यक्ति अपने बैंक का लॉगिन किसी सॉफ्टवेयर को देता है और वह उसकी मर्जी के खिलाफ कोई काम कर देता है, तो इसकी जिम्मेदारी खाताधारक पर आ सकती है।

भारत में भी बैंकों की साइबर सुरक्षा और ग्राहकों की निजी जानकारी की गोपनीयता को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। हाल ही में, भारतीय स्टेट बैंक ने अपने करीब चार हजार ग्राहकों की व्यक्तिगत जानकारी डार्क वेब पर लीक होने की पुष्टि की है। दूसरी ओर, भारत में एआई के जरिये डिजिटल भुगतान की दिशा में तेजी से कदम भी बढ़ाए जा रहे हैं। भुगतान सेवा प्रदाता रेजरपे ने एनपीसीआई के साथ मिलकर ‘एजेंटिक यूपीआई’ की सुविधा शुरू की है। इसके जरिये एआई टूल्स की मदद से लोग चैट के दौरान ही ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर सामान ऑर्डर और भुगतान कर सकते हैं। बार-बार पिन डालने की भी जरूरत नहीं पड़ती। बेशक यह सुविधाजनक है, पर यही वह व्यवस्था भी है, जिससे अमेरिकी बैंक अब दूरी बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि अगर कोई एजेंट ऐसा काम कर दे, जो ग्राहक ने नहीं चाहा था, तो क्या होगा? क्या भारत में भी ऐसी गलती की जिम्मेदारी खाताधारक पर डाल दी जाएगी? इसका जवाब सामने आना बाकी है। बेहतर होगा कि इस बारे में स्पष्ट नियम बनाए जाएं। यह काम पायलट परियोजनाओं के इस्तेमाल में आने से पहले होना चाहिए, न कि तब, जब किसी का बैंक खाता खाली हो जाए।


भारत में पैसों से जुड़े कामों के लिए एआई एजेंट्स का इस्तेमाल शायद दूसरे देशों की तुलना में तेजी से बढ़ेगा। चिंताजनक यह है कि एक बार फिर सुविधा पहले आ गई और जरूरी सुरक्षात्मक इंतजाम पीछे छूट गए। -लेखक तकनीकी एवं सामाजिक उद्यमी, सार्वजनिक नीति टिप्पणीकार व स्तंभकार हैं।


 
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