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ब्रिक्स टिका रहा, अब उसे नतीजे देने होंगे: विस्तार से अधिक प्रतिनिधित्व वाला मंच बना, क्या वास्तविक बदलाव आएगा
ब्रिक्स के विस्तार ने इसे अधिक प्रतिनिधित्व वाला मंच बना दिया है। लेकिन, यह विस्तार साझा सहमति बनाने में भी काफी मुश्किलें पैदा करता है। यही इसका केंद्रीय विरोधाभास है। ऐसे में, सबसे बड़ा सवाल है कि क्या नई दिल्ली सम्मेलन भी केवल बयानों तक सीमित रहेगा या वास्तविक बदलाव लाएगा?
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ब्रिक्स का एजेंडा और चुनौतियां?
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
वर्ष 2001 में न्यूयॉर्क के एक निवेश बैंक के अर्थशास्त्री को चार बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए ऐसा नाम चाहिए था, जिस पर दुनिया का ध्यान जाए। उन्होंने लिखा ब्रिक (बीआरआईसी)। यह महज एक मार्केटिंग शब्द था। तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह नाम आगे चलकर एक कूटनीतिक पहचान बन जाएगा। लेकिन 25 साल बाद, 12 व 13 सितंबर को जब 11 देशों और 10 साझेदार देशों के नेता भारत मंडपम में जुटेंगे, तब फंड मैनेजरों की सुविधा के लिए गढ़ा गया यह शब्द दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाले लोकतंत्र की राजधानी में शिखर सम्मेलन की पृष्ठभूमि में नजर आएगा।
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इस सफर को ही इसकी सबसे बड़ी सफलता मानना चाहिए और शिकायतों पर बात करने से पहले कुछ बिंदुओं पर ठहरकर विचार करना चाहिए। जब ब्रिक बना था, तब सबसे स्पष्ट आपत्ति यही थी कि इसके सदस्यों में साझा कुछ भी नहीं है। ब्राजील, रूस, भारत और चीन का न धर्म एक था, न भूगोल, न राजनीतिक व्यवस्था और न शासन का कोई साझा सिद्धांत। 2010 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने से भी इस सवाल का जवाब नहीं मिला, बल्कि वह और बड़ा हो गया। इसके बावजूद, यह समूह उस दौर के खत्म होने के बाद भी कायम रहा, जिसमें इसका जन्म हुआ था। दरअसल, जब नियम कमजोर होते हैं, तो देश अपने बचाव के रास्ते तलाशते हैं। ब्रिक्स ऐसा ही एक विकल्प है।
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यह समझना भी जरूरी है कि ब्रिक्स आखिर किन देशों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करता है। यह शब्द समान अक्षांश के बजाय साझा इतिहास को दर्शाता है-उपनिवेशवाद, संसाधनों का दोहन, देर से हुआ औद्योगीकरण और बाद में वैश्विक नियम बनाने वाली संस्थाओं में कम प्रतिनिधित्व। ब्राजील इसे सबसे सरल तरीके से समझाता है-न पश्चिम, न पूर्व, बल्कि दक्षिण। कठिन सवाल यह है कि इस दक्षिण की आवाज कौन बने और ईमानदार जवाब है कि कोई नहीं। चीन की आर्थिक ताकत बेजोड़ है और वह विकासशील देशों के लिए बड़ी हिस्सेदारी चाहता है। रूस ब्रिक्स को इस बात के प्रमाण के रूप में देखता है कि पश्चिमी देशों का कूटनीतिक दबाव और दुनिया से अलग-थलग होना एक ही बात नहीं है। ब्राजील बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार पर जोर देता है, जबकि दक्षिण अफ्रीका अफ्रीकी आवाज को मजबूत करना चाहता है। भारत वैश्विक शासन में सुधार का समर्थन करता है, पर साथ ही अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखना चाहता है। वह न तो चीन के नेतृत्व वाले गुट की ओर झुकना चाहता है और न ही किसी स्पष्ट पश्चिम-विरोधी समूह का हिस्सा बनना चाहता है।
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नए सदस्य इस तस्वीर को और उलझाते हैं। ईरान प्रतिबंधों के विरोध की आवाज लेकर आता है। संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब पश्चिम को पूरी तरह खारिज करने के बजाय रणनीतिक संतुलन बनाए रखना चाहते हैं। मिस्र स्वेज नहर और अरब राजनीति का मुद्दा साथ लाता है।
इथियोपिया जोर देता है कि गरीब अर्थव्यवस्थाओं की चिंताएं बड़ी उभरती ताकतों से अलग हैं। वहीं, इंडोनेशिया अपने बड़े बाजार के साथ गुटनिरपेक्षता की लंबी परंपरा भी लेकर आता है। विस्तार ने ब्रिक्स को ज्यादा प्रतिनिधित्व वाला मंच बना दिया है। लेकिन, यही विस्तार साझा सहमति बनाने में भी काफी मुश्किलें पैदा करता है। यही इसका केंद्रीय विरोधाभास है। इसी कारण दिल्ली समिट के मुख्य सत्र से ज्यादा महत्वपूर्ण उसके साथ होने वाली दूसरी बैठकें साबित हो सकती हैं। पहली आईब्रिक्स समिट में 500 से अधिक निवेशक, वित्त मंत्री और कारोबारी नेता एक साथ जुटेंगे। इसका एजेंडा बेहद व्यावहारिक है-21 सदस्य व सहयोगी देशों के बीच इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा और डिजिटल क्षमता में सीमा पार निवेश बढ़ाना; डॉलर के बिना लेनदेन को बढ़ावा देना; और यूपीआई तथा ब्राजील के पिक्स जैसे तेज भुगतान वाले राष्ट्रीय सिस्टम को आपस में जोड़ना। साथ ही, केंद्रीय बैंकों की डिजिटल मुद्राओं के बीच बेहतर तालमेल बनाने पर भी जोर होगा।
यह कवायद ऐसे समय में हो रही है, जब ये अर्थव्यवस्थाएं टैरिफ के दबाव से जूझ रही हैं और डॉलर के जरिये भुगतान निपटाने की भारी कीमत चुका रही हैं। इनमें से कोई भी पहल उस ब्रिक्स करेंसी जैसी नहीं है, जिसकी चर्चा ने वाशिंगटन में इतनी हलचल पैदा कर दी है। भारत का रुख हमेशा स्पष्ट और संतुलित ही रहा है। हमारे आईटी निर्यात, पूंजी बाजार और विदेश में बसे भारतीय, सभी यही संकेत देते हैं कि रिश्ते तोड़ने के बजाय विकल्पों में विविधता लाना ज्यादा बेहतर है।
न्यू डेवलपमेंट बैंक ब्रिक्स की सबसे ठोस उपलब्धि है। इसकी वजह यह है कि इसने इस समूह को केवल बयानों और घोषणाओं तक सीमित रखने के बजाय वास्तविक वित्तीय लेनदेन और बैलेंस शीट तक पहुंचाया है। मतभेद वास्तविक हैं और अकेले दिल्ली उन्हें खत्म नहीं कर सकती। भारत और चीन, दोनों बहुध्रुवीय दुनिया चाहते हैं, पर कोई भी नहीं चाहता कि दूसरा अपनी शर्तें उन पर थोपे। कुछ सदस्य मौजूदा वैश्विक संस्थाओं में सुधार चाहते हैं, जबकि कुछ की इच्छा है कि ब्रिक्स खुलकर पश्चिमी देशों के विरोध वाले गुट में बदल जाए। पिछले दो वर्षों के सबसे विवादित मुद्दों पर कई सदस्य ऐसे पक्षों के करीब रहे हैं, जो इन संघर्षों में शामिल हैं। यही वजह है कि ब्रिक्स की घोषणाओं की भाषा इतनी नरम और सावधान रखी जाती है कि कई बार उसका कोई ठोस अर्थ ही नहीं बचता।
अपेक्षाएं संतुलित होनी चाहिए। भारत मंडपम से कोई क्रांतिकारी फैसला निकलने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। भारत की अध्यक्षता का आकलन भी अंतिम बयान से नहीं, बल्कि तय समय-सीमा वाले ठोस नतीजों से होना चाहिए। मसलन, भुगतान व्यवस्था का ऐसा पायलट प्रोजेक्ट, जो वास्तव में लेनदेन पूरा कर सके, एनडीबी में स्थानीय मुद्रा में कर्ज देने के स्पष्ट लक्ष्य या ऐसी तकनीक और जलवायु परियोजना, जिसका इस्तेमाल कोई छोटा सदस्य देश भी कर सके। भारत ने इस वर्ष 25 से ज्यादा शहरों में 350 से ज्यादा बैठकें की हैं। इसकी अहमियत इससे आंकी जाएगी कि समिट के बाद क्या नतीजा निकलता है, न कि इससे कि समिट में क्या कहा गया।
एक निवेश बैंक के लिए गढ़े गए छोटे-से नाम से लेकर 21 देशों के समूह तक, ब्रिक्स ने लंबा सफर तय किया है। आज यह ‘वैश्विक दक्षिण’ की एक मजबूत आवाज और पश्चिमी प्रभाव के सामने एक वास्तविक विकल्प के रूप में उभर रहा है। पर, इसकी आवाज कितनी दूर तक पहुंचेगी, यह इस बात से तय नहीं होगा कि पश्चिम के बारे में इसमें क्या कहा जाता है। असली कसौटी यह होगी कि क्या समूह के प्रमुख देश आपस में बहुध्रुवीय बने रह सकते हैं और साथ ही दुनिया में अपना प्रभाव बढ़ा सकते हैं। साथ ही, क्या वे उन देशों की ओर से बोलने के आकर्षण से बच सकते हैं, जिन्होंने उनसे कभी ऐसा करने के लिए कहा ही नहीं।
-लेखक टेक, सोशल आंत्रप्रेन्योर और डब्ल्यूजीएफ के प्रोग्राम डायरेक्टर (पूर्वी भारत) हैं।