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आल्प्स, हिमालय के संकट अलग नहीं: जलवायु परिवर्तन के दो चरम विरोधाभासी परिदृश्य, लिख रहे भावी विभीषिका की कहानी

Wed, 02 Sep 2026 10:02 AM IST
Vir Singh वीर सिंह
Updated Wed, 02 Sep 2026 10:02 AM IST
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सार
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एक ओर आल्प्स पर्वत पर बरसती आग, तो दूसरी ओर हिमालय में प्रलय! आज हमारे ग्रह के ये दो चरम विरोधाभासी परिदृश्य जलवायु परिवर्तन की भावी विभीषिका की कहानी लिख रहे हैं।
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crises In Alps and Himalayas not distinct diametrically opposite climate change scenario scripting catastrophe
जलवायु परिवर्तन की मार झेल रही पूरी धरती - फोटो : अमर उजाला प्रिंट- ग्राफिक्स

विस्तार

एक ओर वर्षाओं से सराबोर और प्रचंड बाढ़ों से जूझता दक्षिण एशिया तथा दूसरी ओर अभूतपूर्व अग्निकांडों से धधकता यूरोप। एक ओर आल्प्स पर्वत पर बरसती आग, तो दूसरी ओर हिमालय में प्रलय! आज हमारे ग्रह के ये दो चरम विरोधाभासी परिदृश्य जलवायु परिवर्तन की भावी विभीषिका की कहानी लिख रहे हैं। वैसे तो गर्मियों में जंगलों में आग लगती ही थी, पर इस वर्ष गर्मी के चरम पर पहुंचने से दो सप्ताह पूर्व ही भयावह अग्नि ने यूरोप के जंगलों में अपना डेरा जमा लिया। नतीजतन, मध्य अगस्त तक पिछले वर्षों की अपेक्षा 2.5 गुना अधिक जंगल स्वाहा हो गए और यूरोप तपती भट्टी बन गया। यूरोप में जंगलों की आग ने इतना भयावह रूप ले लिया कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इसे ‘दूसरे विश्वयुद्ध के बाद देश के लिए सबसे गंभीर स्थिति’ बताया।



आग व पानी का जलवायविक संबंध है। ग्रह के एक भाग में आग बरसती है, तो दूसरे पर अनंत वर्षा का कहर टूटता है। आल्प्स व हिमालय की अभूतपूर्व त्रासदी भी अग्नि-जल अंतर्संबंधों से पैदा जलवायु परिवर्तन की एक ‘पटकथा’ है। वैसे तो वन युगों से अग्नि के शिकार होते रहे हैं, पर वर्तमान के अनियंत्रित अग्निकांड मानव-जनित हैं। जब से दुनिया जीवाश्म ईंधन पर निर्भर हुई है, मानव को पृथ्वी के हर आखिरी संसाधन का दोहन करने की लत लग गई है। जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता जा रहा है, जलवायु परिवर्तन और भी गंभीर होता जा रहा है।


विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की वैश्विक जलवायु स्थिति 2025 रिपोर्ट के अनुसार, 2015-2025 अब तक के सबसे गर्म 11 वर्ष रहे हैं और यह भी कि पृथ्वी की जलवायु पहले से कहीं अधिक असंतुलित है। बढ़ता कार्बन उत्सर्जन जलवायु परिवर्तन की बड़ी वजह बन गया है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की उत्सर्जन अंतराल रिपोर्ट 2025 के अनुसार, राष्ट्र वैश्विक तापन को पेरिस समझौते के 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य तक सीमित रखने के मार्ग से बुरी तरह भटक रहे हैं। ग्रह का तापमान पूर्व-औद्योगिक काल के तापक्रम की तुलना में आज 1.34 डिग्री सेल्सियस से 1.41 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी रिकॉर्ड कर चुका है। संयुक्त राष्ट्र संघ के जलवायु परिवर्तन संबंधी निर्णयों में तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस से आगे न बढ़ने देने का लक्ष्य तय किया गया है। बढ़ोतरी का यह रिकॉर्ड 2024 में टूट गया था, जब वैश्विक तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से लगभग 1.55 डिग्री सेल्सियस पहुंच गया था। 2024 पृथ्वी के इतिहास में अब तक का सबसे गर्म और 21वीं शताब्दी का ऐसा प्रथम वर्ष था, जिसमें मानव द्वारा निर्धारित तापक्रम लक्ष्य का उल्लंघन हुआ था।

यद्यपि किसी एक वर्ष में तापक्रम 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंचने का अर्थ यह नहीं कि तापक्रम निर्धारित लक्ष्य के ऊपर रुका रहेगा। यह सीमा दो या तीन दशकों के आधार पर आंकी जाती है, न कि एक वर्ष के औसत आंकड़ों के आधार पर। अतः आधिकारिक तौर पर अभी हम यह नहीं कह सकते कि हमने 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार कर ली है। लेकिन, इसका अर्थ यह अवश्य है कि हम तेजी से गंभीर खतरे की ओर बढ़ रहे हैं और अनुमानतः 2030 और 2035 के बीच 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर के ताप में झुलसने के लिए अभिशप्त होंगे।  

पृथ्वी पर जलवायु विनियमन की सबसे अधिक क्षमता महासागरों में होती है। वैश्विक उत्सर्जन से उत्पन्न ऊष्मा का 91 प्रतिशत से अधिक भाग महासागरों द्वारा अवशोषित कर लिया गया है, जिससे उनकी जलवायु विनियमन क्षमता काफी क्षीण हो गई है। अंटार्कटिका, आर्कटिक महासागर और ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघल रहे हैं। विश्व स्तर पर अत्यधिक घातक घटनाओं का कारण बनते सुपर अल-नीनो जैसे कारकों का संयोग बन रहा है और साथ में समुद्री ताप परिसंचरण को नियंत्रित करने वाला अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (एएमओसी) मंद पड़ चुका है। विगत जून पश्चिमी यूरोप के लिए कहर बनकर आया, जब समुद्री सतह का तापमान ग्रह के इतिहास में सबसे उच्चतम हो गया। यूरोप में करीब 10,000 मौतें हुईं, जिनमें 9,000 तो 65 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्ति थे। बढ़ती गर्मी से उत्पन्न सूखा फ्रांस और स्पेन में भयंकर अग्निकांडों का कारण बना। इन अप्रत्याशित अग्निकांडों ने अभूतपूर्व स्थितियां पैदा कर दीं, जिनमें सम्मिलित हैं पायरोकुमुलोनिंबस बादल, अर्थात ‘अग्नि बादल’, जो अपनी हवा और बिजली बनाते हैं। यूरोपीय गर्माहट पूरे ग्रह की गर्माहट का एक आंशिक उदाहरण है। सारे स्पेन और फ्रांस में लगभग 3,75,000 लोगों को अपने घर खाली करने के लिए विवश होना पड़ा। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि यूरोप की यह आग नवंबर के प्रारंभ तक जलती रहेगी।

जलवायु केवल मौसम और पर्यावरण विज्ञान संबंधी मुद्दा नहीं रह गया है। यह एक वैश्विक राजनीति का मुद्दा भी बन गया है। आज की जलवायु राजनीति हमारे आने वाले कल की कहानी लिख रही है, और यह कहानी सुखांत नहीं, दुखांत प्रकार की होने वाली है। जीवाश्म ईंधन हमारे ग्रह का सबसे बड़ा दैत्य है। हमारा उद्योग जगत और अर्थव्यवस्थाएं जीवाश्म ईंधनों पर टिकी हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद दुनिया के देशों के लिए जीवाश्म ईंधन एक ‘शैतानी सौदा’ हो गया है। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सारे युद्धों के केंद्र में यही ‘शैतान का सौदा’ होता है। ऊर्जा का यही स्रोत विश्व राजनीति की धुरी बन गया है। गहराई से देखा जाए, तो जलवायु परिवर्तन भी इसी तेल की धार से निकला जिन्न है।

आल्प्स और हिमालय के संकट भिन्न नहीं हैं। जलवायु पूरे जैवमंडल को एक सूत्र में बांधती है। संयुक्त राष्ट्र के जलवायु प्रमुख साइमन स्टील कहते हैं, ‘जलवायु परिवर्तन का अलार्म हर दिशा में बज रहा है।’ एक भू-भाग का जलवायु संकट दूसरे भू-भाग का जलवायु संकट अवश्य बनता है। आल्प्स की ज्वालाएं हिमालय में हिमस्खलन, भूस्खलन और प्रचंड बाढ़ों का रूप लेकर जीवन लील रही हैं। पर्यावरण न्याय फाउंडेशन के मुख्य कार्यकारी और संस्थापक स्टीव ट्रेंट कहते हैं, ‘जिस रास्ते पर हम स्वयं को पाते हैं, वह एक हिंसा, भुखमरी, असंख्य लोगों के जबरन प्रवासन, युद्ध और मौत का रास्ता है।’ वह यह भी मानते हैं कि एक अच्छा भविष्य अभी हमारी पहुंच में है, अब भी बहुत देर नहीं हुई है और यह कि अर्थव्यवस्था हमारे पक्ष में तेजी से तर्क दे रही है।

जीवाश्म ईंधन के विकल्प के रूप में नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोतों पर पूर्ण निर्भरता ही हमारे लिए जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं, आशाओं और प्रफुल्लताओं से सराबोर भविष्य का रास्ता है।

पूर्व प्रो. एमेरिटस, जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय

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