फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   dashcam-gurugram-road-accidents-evidence-hit-and-run-road-safety

बीमा जेब के लिए, कैमरा सच के लिए: हेलमेट-सीटबेल्ट के बाद अब डैशकैम की बारी?

Thu, 17 Sep 2026 06:39 AM IST
देवेश त्रिपाठी संकेत उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार
संकेत उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार Published by: देवेश त्रिपाठी Updated Thu, 17 Sep 2026 06:39 AM IST
विज्ञापन
सार
Register For Event
गुरुग्राम वाला युवक इसलिए चिह्नित हुआ, क्योंकि बाइक वाली महिला ने कैमरा लगाया हुआ था। भारत की सड़कों पर अब तीन चीजें साथ चलनी चाहिए-हेलमेट और सीट बेल्ट शरीर के लिए, बीमा जेब के लिए तथा कैमरा सच के लिए। कैमरे ही फिलहाल इस देश की सड़क के सबसे ईमानदार सिपाही भी हैं। 
loader
dashcam-gurugram-road-accidents-evidence-hit-and-run-road-safety
डैशकैम फुटेज - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

गुरुग्राम की गोल्फ कोर्स रोड। एक महिला बाइक चला रही थी। ग्रुप के साथ। पीछे एक सफेद कार में बैठे एक व्यक्ति ने कुछ इशारे किए। पीछा किया। फिर साइड से टक्कर मारी। महिला सड़क पर गिरी। बाइक कई मीटर तक घिसटती रही, चिंगारियां उड़ीं। कार चालक ने गाड़ी भगा ली। यह दृश्य कल्पना नहीं है। यह 13 सितंबर, 2026 की घटना है। और, यह सब देश ने इसलिए देखा, क्योंकि बाइक पर कैमरा लगा था। सोचिए जरा, रिकॉर्डिंग न होती तो?


भारत की सड़क पर इन्सानियत नहीं चलती, कानून अक्सर देर से आता है। बचता क्या है? सबूत। और, सबूत जुटाने में आज कैमरा सबसे बड़ा साथी है। यह अकेला मामला नहीं है। पिछले महीने की ही बात है। बंगलूरू के एचएसआर लेआउट में एक महिला को कार ने टक्कर मारी। ड्राइवर उसे अस्पताल भी ले गया। अच्छा आदमी बन गया। परिवार को लगा, मददगार मिल गया। एक दूसरी गाड़ी के डैश कैम से नंबर निकला। वही मददगार आरोपी निकला। यह केस अखबारों में छपा। बिना कैमरे के वह शख्स ‘गुड समैरिटन’ बनकर निकल जाता। दरअसल, गुड समैरिटन वह मददगार इन्सान होता है, जो सड़क दुर्घटना या आपात स्थिति में फंसे या घायल व्यक्ति की नि:स्वार्थ भाव से मदद करता है। दूसरी घटना। मार्च 2026, धारवाड़। सड़क पर एक महिला की मौत। पहले हिट-एंड-रन का केस दर्ज हुआ। फिर, केएसआरटीसी बस के डैश कैम की फुटेज आई। पुलिस ने कहा कि यह एक्सीडेंट नहीं, योजनाबद्ध हमला था। पति और साथियों पर केस बना। बस के कैमरे ने पूरा कृत रिकॉर्ड किया था। साफ हुआ कि यह जानबूझकर किया गया है। सोचिए बस में कैमरा न होता, तो परिवार आज भी ‘किस्मत’ को कोस रहा होता।


अगस्त 2025, हैदराबाद, मियापुर। स्कूल बस ने टू-व्हीलर को टक्कर मारी, सवार की मौत हो गई। गुजरती हुई एक प्राइवेट गाड़ी के डैश कैम ने घटना को कैद किया। पुलिस ने कहा कि डैश कैम जांच में स्पष्टता देता है, और नए कानून में ऑडियो-विजुअल सबूत का वजन ज्यादा है। एक अजनबी की गाड़ी का कैमरा एक परिवार को जवाब दे गया। दिल्ली का भी पुराना, लेकिन साफ उदाहरण है। जनवरी 2021, राजौरी गार्डन फ्लाईओवर। स्कूटी सवार सचिन को अज्ञात कार ने टक्कर मारी। चश्मदीद की कार में डैशबोर्ड कैमरा था। समय, गाड़ी का रंग और मॉडल निकला। फिर, बीस सीसीटीवी खंगाले गए। आरोपी गिरफ्तार हुआ। एक नागरिक का कैमरा पुलिस की आंख बन गया। राजधानी दिल्ली का ही एक और किस्सा जानिए। नांगलोई। सालभर पुराना रोड रेज केस। पीड़ित प्रवीण जांगड़ा की गाड़ी के डैश कैम में हमलावरों के चेहरे दिखेे। तीन दिन में गिरफ्तारी। दिल्ली पुलिस के हवाले से अखबारों में छपे लेख यह बता रहे थे कि यदि डैश कैम न होता, तो जांच शायद सही दिशा में न जा पाती। पैटर्न एक है। जहां कैमरा है, लीड है। जहां कैमरा नहीं, कहानी दो संस्करणों में उलझ जाती है-पीड़ित की और भागने वाले की। आंकड़ा भी कमजोर नहीं है। सरकार के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि 2022 में हिट-एंड-रन केस देश के सड़क हादसों का करीब 14.6 प्रतिशत था, लेकिन मौतों में हिस्सा 18.1 प्रतिशत। यानी भागने वाला अक्सर जानलेवा होता है। सजा सबूत के अभाव में अटकती है। पेंडेंसी बहुत ऊंची। ऐसे में सबूत ही असली हथियार है।

अब सवाल कि डैश कैम आराम है या जरूरत? शहरों में जवाब बदल चुका है। मई 2025 में पार्क प्लस रिसर्च लैब्स ने दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, बंगलूरू के तीन हजार कार मालिकों का सर्वे किया। ऑटोकार प्रोफेशनल में छपे इस सर्वेक्षण के मुताबिक, 48 प्रतिशत ने कहा कि नई गाड़ियों में आगे-पीछे डैश कैम अनिवार्य होना चाहिए। एयरबैग और डिस्क ब्रेक से ऊपर यह डिमांड आई। लोग समझ गए हैं-लोहे का पिंजरा आपको टक्कर से बचाएगा, कैमरा आपको झूठ से बचाएगा। क्या वाहन निर्माताओं को यह सुविधा देनी चाहिए? मैं कहता हूं, हां!

डैश कैम को आफ्टरमार्केट पर न छोड़ा जाए। भारत में गर्मी, बारिश, टूटी सड़क, अचानक ब्रेक खराब हो जाने जैसी तमाम वजहें। कैमरा तभी काम का है जब गाड़ी के साथ आए, फिटनेस से जुड़ा हो, और पुलिस व बीमा कंपनियां, दोनों उसे सबूत मानें। यह बात सरकार के कान में पड़ी है। संसद में मोटर वाहन संशोधन के मसौदे में निर्माता द्वारा डैशबोर्ड कैमरा लगाने और उसे रजिस्ट्रेशन-फिटनेस से जोड़ने का प्रस्ताव भी दर्ज हुआ है। वह कानून बने या न बने, दिशा साफ है। स्कूल बस, टैक्सी, ट्रक पर तो यह और भी जरूरी है। तेलंगाना सरकार ने रोडवेज बस और स्कूल वाहनों पर डैश कैम का आदेश दिया है। यह देशभर में होना चाहिए। लेकिन, अभी तक बात चार पहिए वाले वाहन की हो रही है। दो पहिया वाहनों का क्या? गुरुग्राम की सिया तो बाइक से गिर पड़ी। चोट भी आई। शुक्र है, उनके पास कैमरा था। इससे उनके लिए न्याय का दरवाजा खुला। भारत में सड़क हादसों में होने वाली मौतों में दोपहिया वाहनों की बड़ी हिस्सेदारी है। ऐसे में सिर्फ कार पर कैमरा लगाना काफी नहीं। बाइक पर एक्शन कैम या हेलमेट कैम अब शौक नहीं, बीमा पॉलिसी जैसा होना चाहिए।

एक दलील आएगी-प्राइवेसी, यानी निजता। ठीक है, नियम बने। ऐसे वीडियो पब्लिक रोड का सबूत हैं, किसी के बेडरूम का नहीं। ऑडियो रिकॉर्डिंग की सीमा तय हो जानी चाहिए। स्टोरेज कितने दिन रखनी है, यह भी तय हो। लेकिन, कारण निजता बताकर कैमरा लगाने से इन्कार इसलिए मत करिए, क्योंकि यह न्याय की लड़ाई में आपकी ही मदद करेगा। आखिर सड़क पर कैमरा होता है न? जांच में पुलिस को डैश कैम और अपने कैमरे से क्रॉस वेरीफाई करने में आसानी होगी। कैमरा डर पैदा करता है, क्योंकि वह बहस नहीं करता। वह कहता नहीं कि तुम फलां व्यक्ति हो, महिला हो या मर्द, 140 की रफ्तार थी या नहीं। वह सिर्फ दिखाता है कि क्या हुआ। आरोपी आज जो कुछ भी बोल रहा है, उसे उसी फुटेज से तौलना पड़ेगा। यही उसकी असली कीमत है।
भारत की सड़कों पर अब तीन चीजें साथ चलनी चाहिए-हेलमेट और सीट बेल्ट शरीर के लिए, बीमा जेब के लिए तथा कैमरा सच के लिए। जब तक निर्माता इसे मानक नहीं बनाते, हर सवार को इसे खुद लगाना चाहिए। सस्ता हो या महंगा, एक बार का खर्च उस रात से सस्ता है, जब आपके ऊपर झूठा केस हो या आपके बच्चे की चोट का गवाह कोई न हो।

गुरुग्राम वाला युवक इसलिए चिह्नित हुआ, क्योंकि बाइक वाली महिला ने कैमरा लगाया था। बाकी हजारों हादसों में चिह्नित होने वाला कोई होता ही नहीं। सवाल सरकार से है, कंपनी से है, और हमसे भी है कि हम सबूत के बिना इन्साफ मांगते रहेंगे, या गाड़ी खरीदते वक्त कैमरा भी मांगेंगे?

मनचले कानून से नहीं डरते, इन्सानियत से नहीं डरते। कम से कम कैमरे से तो डरें। यही फिलहाल इस देश की सड़क के सबसे ईमानदार सिपाही भी हैं।     
edit@amarujala.com
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed